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बशीर बोले-मैं शोमैन, अपनी शर्तों पर एग्जिट करूंगा:भारत-पाक रिश्तों में भाषा बने बद्र के शेर; मेरठ दंगों में घर जला तो भोपाल को अपनाया

ईद के दिन अब्बा ने दुनिया को अलविदा कह दिया। दुनिया उन्हें डॉ. बशीर बद्र के नाम से जानती थी, लेकिन मेरे लिए वे सिर्फ अब्बा थे। एक शायर, एक शोमैन और ऐसे इंसान, जिनकी फितरत बीमारी भी नहीं बदल सकी। ये बता कहते हुए मशहूर शायर बशीर बद्र के बेटे तैयब बद्र की आंखें डबडबा गईं। उन्हें खुद को संभालते हुए कहा- पिछले 10-12 वर्षों से अब्बा डिमेंशिया से जूझ रहे थे। धीरे-धीरे उनकी याददाश्त कमजोर होती गई। बॉडी फंक्शंस सामान्य नहीं रहे। चलना-फिरना, सुनना और देखना सब कम होता गया। लेकिन इसके बावजूद उनके चेहरे की मुस्कान कभी पूरी तरह गायब नहीं हुई। वे मजाक करते थे, लोगों से अपनापन रखते थे। हालांकि पिछले एक सप्ताह से उनकी हालत ज्यादा खराब हो गई थी। आज सुबह उन्होंने ठीक से नाश्ता किया था। दोपहर करीब 12 बजे लगा कि उनका ब्लड प्रेशर लो हो रहा है। करीब 15 मिनट के भीतर उनकी पकड़ कमजोर पड़ने लगी। अब्बा अक्सर कहा करते थे, “मेरी मुशायरों पर बहुत मजबूत ग्रिप होती है।” आज वही ग्रिप छूट गई और उनकी धड़कन थम गई। याददाश्त कमजोर हुई, लेकिन शेर नहीं भूले डिमेंशिया को मैंने बहुत करीब से समझा। यह इंसान की याददाश्त मिटा देता है, लेकिन उसका किरदार और फितरत नहीं बदलता। कई बार वे मेरा नाम भूल जाते थे, यह भी भूल जाते थे कि वे कहां हैं। लेकिन अगर कोई उनके सामने कह देता—
“उजाले अपनी यादों के…”
तो वे तुरंत अगला मिसरा पढ़ देते—
“न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए…” यह सब उनके भीतर जैसे एक इंस्टिंक्ट की तरह था। कई बार एक मिसरा सुनकर पूरा शेर मुकम्मल कर देते थे। हालांकि पिछले एक-दो सालों में यह भी धीरे-धीरे कम हो गया था, क्योंकि उनकी शब्दावली कमजोर होती जा रही थी। उन्होंने पिछले 10-12 सालों से लिखना लगभग बंद कर दिया था और करीब 12-15 सालों से मुशायरों में जाना भी छोड़ दिया था। मैं शोमैन हूं, एग्जिट भी अपनी शर्तों पर करूंगा मुशायरों से दूर होना उनका सोच-समझकर लिया गया फैसला था। वे अक्सर कहते थे, “मैं शोमैन हूं। मुशायरों में मेरी एक इमेज है और मैं एग्जिट भी अपनी शर्तों पर लेना चाहता हूं।” सच कहूं तो उन्होंने वैसा ही किया। अपने अंदाज में, अपनी शर्तों पर। बीमारी के दिनों में मैं कभी-कभी घर में छोटे-छोटे मुशायरों जैसा माहौल बना देता था। उन्हें थोड़ा उकसाने की कोशिश करता था ताकि वे कुछ पढ़ें या सुनाएं। लेकिन बशीर साहब से बात हमेशा उनकी शर्तों पर ही होती थी। अगर वे बात करना चाहते थे तो खुलकर करते थे, नहीं तो बिल्कुल चुप रहते थे। 1987 के मेरठ दंगे उनकी जिंदगी का बड़ा जख्म थे अब्बा की जिंदगी में 1987 के मेरठ दंगे एक गहरा जख्म छोड़ गए थे। उस दौरान उनका घर जला दिया गया था। एक मैगजीन में उनकी तस्वीर छपी थी, हाथ में सूटकेस और झोला लिए वे सड़क पर खड़े मुस्कुरा रहे थे। उस लेख में लिखा था… “आप घर तोड़ सकते हैं, हौसला नहीं।” असल जिंदगी में भी उनका यही मिजाज था। घर जल सकता था, लेकिन उनका हौसला नहीं टूटता था। उनकी शायरी मोहब्बत की शायरी थी, उम्मीद की शायरी थी, लोगों को जोड़ने वाली शायरी थी। अब्बा आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज, उनके शेर और उनका अंदाज हमेशा जिंदा रहेगा। मुझे लगता है कि वे अब भी कहीं मुस्कुरा रहे होंगे, ठीक वैसे ही, जैसे जले हुए घर के बाहर सूटकेस लेकर मुस्कुराए थे। और शायद आज भी वही शेर दोहरा रहे होंगे “उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए…” भारत-पाक रिश्तों की भाषा बन गए बशीर बद्र के शेर पुलिस विभाग में लेखाकार रहे पिता के निधन के बाद 1950 के दशक में बशीर बद्र के कंधों पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी आ गई थी। हाई स्कूल के बाद मजबूरी में उन्हें 85 रुपए महीने की नौकरी कांस्टेबल के रूप में करनी पड़ी। दिनभर ड्यूटी का दबाव रहता, लेकिन रात होते ही उनकी रूह शायरी में खो जाती थी। आखिरकार 1967 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी। मेरठ दंगों में जला घर, फिर भोपाल बना ठिकाना 1987 के मेरठ दंगे बशीर बद्र की जिंदगी का सबसे बड़ा जख्म बनकर सामने आए। दंगों में उनका घर जला दिया गया था। सिर्फ मकान ही नहीं, उनकी यादें, किताबें, कागज और जीवनभर की जमा पूंजी भी राख हो गई थी। इस घटना ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया था। वे लंबे समय तक अवसाद में रहे और उस सदमे से उबरने में काफी वक्त लगा। इसके बाद उन्होंने भोपाल को अपना ठिकाना बना लिया। जब वे मुशायरों में अपना मशहूर शेर पढ़ते— “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।” तो श्रोता सिर्फ एक शेर नहीं सुनते थे, बल्कि उसके पीछे एक शायर का उजड़ा हुआ घर महसूस करते थे। विशाल भारद्वाज ने याददाश्त से लौटाईं जली हुई गजलें बशीर बद्र के भतीजे अमीन बताते हैं कि मेरठ दंगों में उनके घर के साथ कई अप्रकाशित गजलें और कागज भी जल गए थे। इनमें करीब 4 से 5 हजार अशआर शामिल थे, जो बद्र साहब को जुबानी याद थे। फिल्मकार विशाल भारद्वाज मेरठ कॉलेज में उनके छात्र रह चुके थे और उन्हें पिता समान मानते थे। विशाल ने जश्न-ए-रेख्ता में बताया था कि बद्र साहब अक्सर उन्हें अपनी नई गजलें सुनाया करते थे। दंगों के बाद जब बशीर बद्र टूट गए थे, तब विशाल भारद्वाज ने अपनी याददाश्त के सहारे उनकी कई गजलें दोबारा लिखकर उन्हें लौटाईं। बाद में विशाल उन्हें हज यात्रा पर भी ले गए। वे अक्सर भोपाल आकर उनसे मुलाकात किया करते थे। जब प्रोफेसर ने उन्हीं के शेर का मतलब समझाया बशीर बद्र जब 10वीं में थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया। आर्थिक हालात के कारण उन्हें पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी। उन्होंने नौकरी की, छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी संभाली और साथ-साथ अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। बाद में उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से उर्दू में एमए किया। इसी दौरान उनकी शायरी यूनिवर्सिटी के सिलेबस में पढ़ाई जाने लगी थी। एक बार एक प्रोफेसर ने उनका मशहूर शेर पढ़ा… “अब मिले हम तो कई लोग बिछड़ जाएंगे,
इंतजार और करो अगले जनम तक मेरा।” फिर प्रोफेसर ने खुद बशीर बद्र से ही इस शेर का अर्थ पूछा। बशीर बद्र ने अपनी तरफ से जवाब दिया, लेकिन प्रोफेसर उससे संतुष्ट नहीं हुए और अपनी अलग व्याख्या की। 48 साल बाद मिली पीएचडी की डिग्री बशीर बद्र ने 1973 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में अपनी पीएचडी थीसिस जमा की थी, लेकिन अध्यापन और मुशायरों की व्यस्तता के चलते वे डिग्री लेना भूल गए। आखिरकार 2021 में, पूरे 48 साल बाद उनकी पीएचडी की डिग्री उनके घर पहुंची। परिवार के मुताबिक, डिग्री को सीने से लगाते वक्त वे किसी बच्चे की तरह खुश हो गए थे। उनकी थीसिस में उनके अपने 87 शेर शामिल थे। राजनीति और कूटनीति में भी गूंजते रहे उनके अशआर बशीर बद्र के शेर सिर्फ मुशायरों तक सीमित नहीं रहे। राजनीति, कूटनीति और भारत-पाक रिश्तों में भी उनके अशआर बार-बार उद्धृत किए जाते रहे। उनका मशहूर शेर… “कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिजाज का शहर है, जरा फ़ासले से मिला करो।” 2 जुलाई 1972 को शिमला समझौते के बाद जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो की हाथ मिलाते हुए तस्वीरें अखबारों में छपीं, तब बशीर बद्र का यह शेर खूब चर्चित हुआ “दुश्मनी जम के करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।” 1999 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की ‘लाहौर बस यात्रा’ के दौरान बस के पीछे उनका यह शेर लिखा गया था “दुश्मनी का सफर एक कदम दो कदम,
तुम भी थक जाओगे, हम भी थक जाएंगे।” इस यात्रा में बशीर बद्र खुद भी शामिल थे। लेकिन कुछ समय बाद ही कारगिल युद्ध हो गया। बाद में जब पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ दिल्ली आए और अटल बिहारी वाजपेयी से केवल हाथ मिलाकर आगे बढ़ गए, तो उसी शाम एक मुशायरे में बशीर बद्र ने यह शेर पढ़ा… “मुहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला,
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला।” अटल बिहारी वाजपेयी को मानते थे अदबी पिता बशीर बद्र पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को अदब की दुनिया में अपना पिता मानते थे। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, “हमारी और अटल बिहारी वाजपेयी की कोशिश यही है कि हिंदू और मुसलमान के बीच कोई झगड़ा न हो। मेरा दूसरा नाम अटल बिहारी वाजपेयी है और अटल का दूसरा नाम भारत है।” जब उनसे अटल जी की कविताओं के बारे में पूछा गया तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “एक बेटा अपने बाप के बारे में जैसी राय रखता है, वही राय मेरी अपने अदबी बाप के बारे में है।” मशहूर गजल गायक तलत अजीज बोले- “बशीर बद्र सिर्फ उर्दू के नहीं, पूरे मुल्क की रूह के शायर थे” आज दोपहर डॉक्टर राहत बद्र का फोन आया। उनकी आवाज सुनते ही दिल बैठ गया। कुछ खबरें ऐसी होती हैं, जिन्हें इंसान सुनने से पहले ही पहचान लेता है। उन्होंने धीमी आवाज में कहा, “तलत साहब, डॉक्टर साहब नहीं रहे…” कुछ पल तक मैं कुछ बोल ही नहीं पाया। बशीर बद्र साहब… उनका नाम लेते ही मेरे सामने एक पूरा दौर खड़ा हो जाता है। वो दौर, जब खतों में खुशबू होती थी, ग़ज़लें किताबों से निकलकर लोगों की धड़कनों में बसती थीं और रिश्तों में इतनी गर्माहट होती थी कि लोग होटल छोड़कर सिर्फ अपनापन पाने के लिए आपके घर आ जाते थे। मैं उन्हें आज से नहीं, 1985 से जानता हूं। तब वे मेरठ में रहते थे। जब भी मैं वहां जाता, उनसे जरूर मुलाकात होती। और जब भी वे कोई नई ग़ज़ल लिखते, तो इनलैंड लेटर में अपने खूबसूरत हाथों से पूरी ग़ज़ल लिखकर मुझे भेजते थे। मेरे वालिद उन खतों को मेरी डायरी में संभालकर चिपका देते थे। जब भी वे बंबई आते, सीधे हमारे घर चले आते। मेरी वालिदा को अपनी बहन मानते थे। कहते “बहन, होटल में मुझे डर लगता है।” और अम्मी हंसकर कहतीं “जब भाई कह दिया तो पूछने की क्या बात है?” आज सोचता हूं, वो सिर्फ जुमले नहीं थे। उस दौर में रिश्ते बनाए नहीं जाते थे, निभाए जाते थे। मैंने जिंदगी में बड़े-बड़े शायर देखे, लेकिन बशीर साहब जैसी सादगी बहुत कम लोगों में देखी। अल्जाइमर में भी गजल पहचान लेते थे दो-तीन साल पहले मैं भोपाल गया था। तब उनकी अल्जाइमर की बीमारी काफी बढ़ चुकी थी। लेकिन जब मैंने उनकी ग़ज़ल गुनगुनाई, तो उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया। उस पकड़ में पहचान थी, अपनापन था। 2023 में मैंने भोपाल के चिरायु ऑडिटोरियम में उनकी शान में एक कार्यक्रम किया। मैंने उनकी ग़ज़लों को फिर रिकॉर्ड किया और एक एल्बम तैयार करवाया। डॉक्टर गोविंद गोयल और हमारे दोस्त विवेक तन्खा ने भी पूरा साथ दिया। मैं सिर्फ लोगों को यह याद दिलाना चाहता था कि बशीर बद्र जैसा शायर सिर्फ उर्दू का नहीं, पूरे मुल्क की रूह का हिस्सा है। उन्होंने ग़ज़ल को मुश्किल फारसी लफ्जों से निकालकर आम आदमी की जिंदगी तक पहुंचाया। मैंने उनकी कई ग़ज़लें रिकॉर्ड कीं। लोग अक्सर पूछते थे कि इतने बड़े शायर बॉलीवुड में क्यों नहीं आए। मैं हमेशा कहता हूं, “ऐसी हस्तियों को बॉलीवुड नहीं बुलाता, बॉलीवुड को उनके पास जाना चाहिए।” लोग ग़ज़ल नहीं, भरोसा भेजते थे उस कार्यक्रम में आने के लिए मैंने गुलजार साहब से भी गुजारिश की थी। वे खुद नहीं आ पाए, लेकिन उनकी बेगम आई थीं। हर किसी के भीतर बशीर साहब के लिए एक अलग तरह की मोहब्बत थी। मैं यहां डॉक्टर राहत बद्र का जिक्र जरूर करना चाहूंगा। मैंने अपनी आंखों से देखा है कि उन्होंने किस तरह बशीर साहब की देखभाल की। उनके बेटे भी उनका बहुत ख्याल रखते थे। 1985 में दूरदर्शन के नए साल के कार्यक्रम के लिए मुझे एक नई ग़ज़ल चाहिए थी। मैंने उन्हें फोन किया। उन्होंने कहा “रुको, मैं तुम्हें एक ग़ज़ल भेजता हूं।” कुछ दिनों बाद खत आया। उसमें लिखा था “आपको मुबारक हो यूं नई शहनाई,
जैसे इक दुल्हन की पहली-पहली अंगड़ाई…” मैंने उसे कंपोज किया, गाया और वह बहुत मकबूल हुई। आज सोचता हूं उस दौर में लोग ग़ज़लें नहीं भेजते थे, अपना भरोसा भेजते थे। बच्चों और बेटियों पर उनके मशहूर अशआर “उड़ने दो परिंदों को अभी शोख हवा में,
फिर लौट के बचपन के जमाने नहीं आते।” “वो शाख है न फूल, अगर तितलियाँ न हों, वो घर भी कोई घर है जहां बच्चियां न हों। ये खबरें भी पढ़ें… बशीर बद्र ने गजल को आम आदमी की जुबान बनाया उर्दू शायरी को आम लोगों की जुबान तक पहुंचाने वाले मशहूर शायर बशीर बद्र का गुरुवार दोपहर 12 बजकर 35 मिनट पर भोपाल स्थित घर पर निधन हो गया। 91 वर्षीय बशीर लंबे समय से बीमार थे और याददाश्त भी खो चुके थे। शाम को बड़ा बाग कब्रिस्तान में उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया। पढ़ें पूरी खबर… शायर बशीर बद्र का 91 साल की उम्र में निधन उर्दू ग़ज़ल के शहंशाह डॉ. बशीर बद्र (91) नहीं रहे। उन्होंने गुरुवार दोपहर 12:15 बजे भोपाल में फानी दुनिया को अलविदा कहा। उर्दू अदब की रूह में समाए बशीर बद्र तक़रीबन 14 बरस डिमेंशिया की गिरफ़्त में रहे, जिससे उनकी याददाश्त कमजोर होती चली गई, मगर उनके शेर आज भी दिलों में धड़कते हैं। उनको शाम 7:30 बजे भोपाल टॉकीज के पास कब्रिस्तान में सुपुर्दे खाक किया गया। पढ़ें पूरी खबर… हमें चूल्हा जलाना नहीं आता, आप बनाओ चाय आधुनिक उर्दू गजल के बेमिसाल शायर के इंतकाल के बाद शोक की लहर है। उनके जाने के साथ न सिर्फ एक शायर ही नहीं गया, बल्कि एक ऐसा इंसान भी चला गया, जिसने अपनी शायरी से आम आदमी को सोचने पर मजबूर किया। पढ़ें पूरी खबर…

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