Homeमध्यप्रदेश1857 की क्रांति में बागी सैनिकों ने घेरा राजमहल:वेतन-भत्तों के भुगतान को...

1857 की क्रांति में बागी सैनिकों ने घेरा राजमहल:वेतन-भत्तों के भुगतान को लेकर सत्ता को मिली सीधी चुनौती; बेगम को आना पड़ा सामने

सच्ची बात, बेधड़क। दैनिक भास्कर भोपाल संस्करण के 68 वर्ष पूरे होने पर हम 11 दिन तक हर सुबह भोपाल की नई कहानी, अनदेखे पहलू की एक विशेष श्रृंखला लेकर आए हैं। हम आपको भोपाल के सबसे बड़े बदलावों, शहर को जीवन देने वाली धरोहरों पर विशेषज्ञों के मंथन, पुराने दस्तावेजों और दुर्लभ अभिलेखों की पड़ताल से निकले अनकहे सच, तथ्यों पर आधारित एक्सक्लूसिव खुलासों और दुर्लभ तस्वीरों के संग्रह से रूबरू कराएंगे। पढ़िए आज की कहानी… भोपाल की सबसे ताकतवर महिला शासक सिकंदर बेगम उस दिन अपने ही महल में घिर गई थीं। बाहर कोई दुश्मन सेना नहीं थी, बल्कि भोपाल रियासत के अपने सैनिक हथियार लेकर खड़े थे। मध्य दिसंबर 1857 में बागी फौजियों ने मोती महल (वर्तमान सदर मंजिल परिसर) को चारों ओर से घेर लिया। यह पहला अवसर था, जब रियासत की अपनी सेना ने सीधे सत्ता को चुनौती दी। सैनिकों ने बना ली सिपाही बहादुर सरकार 1857 की क्रांति की लपटें तब मध्य भारत तक पहुंच चुकी थीं। सीहोर में विद्रोही सैनिकों ने ‘सिपाही बहादुर सरकार’ बना ली थी और उसका असर भोपाल की सेना पर भी साफ दिखने लगा था। इसी माहौल में सैनिकों ने मोती महल के मुख्य द्वारों पर पहरा बैठा दिया और भीतर-बाहर आने-जाने पर रोक लगा दी। सैनिकों का गुस्सा सिर्फ अंग्रेज समर्थक नीति को लेकर नहीं था। महीनों से उनका वेतन और दैनिक भत्ता बकाया था। उस समय हवलदार को 2 आना, सिपाही को डेढ़ आना और खलासी को 1 आना प्रतिदिन भत्ता मिलता था। यह नाराजगी पहले ही खुलकर सामने आ चुकी थी। रिसालदार जुम्मन खान के नेतृत्व वाली टुकड़ी ने गढ़ी अंबापानी अभियान पर जाने से साफ इनकार कर दिया था। सैनिकों ने दो टूक कहा कि जब तक वेतन और दैनिक भत्तों का पूरा भुगतान नहीं होगा, वे कोई सैन्य सेवा नहीं देंगे। यही असंतोष कुछ दिनों बाद मोती महल की घेराबंदी में बदल गया। जब बेगम को खिड़की पर आना पड़ा
महल चारों ओर से घिर चुका था। टकराव कभी भी हिंसक रूप ले सकता था। ऐसे में सिकंदर बेगम ने बल प्रयोग के बजाय बातचीत का रास्ता चुना। वे महल की खिड़की पर आईं और बागी सैनिकों से सीधे संवाद किया। उन्होंने भरोसा दिलाया कि उनकी मांगों पर तुरंत फैसला होगा। अगले ही दिन रियासत ने सैनिकों को ‘दो माहे’ यानी दो महीने का बकाया वेतन और अन्य देय राशि का भुगतान कर दिया। (स्रोत : शाहनवाज खान लिखित पुस्तक ‘सिपाही बहादुर’। इसे मप्र सरकार के स्वराज संस्थान संचालनालय ने प्रकाशित किया है।) ———— कल पार्ट-4 में पढ़िए एक नई कहानी

Stay Connected
16,985FansLike
2,458FollowersFollow
61,453SubscribersSubscribe
Must Read
Related News

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here