हम थक गए चिल्ला कर। कोई सुनने को तैयार नहीं है। हमारे भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है। हमारी तबीयत रात से खराब है। दवा खाकर आए हैं। कोई सुन नहीं रहा। थोड़ा तो शर्म करो यार… आंखों में आंसू, गुस्सा और सुनवाई नहीं होने का दर्द… ये पीड़ा उज्जैन की उस छात्रा की है, जो स्कूल की 300 से ज्यादा लड़कियों के साथ स्कूल शिफ्टिंग का विरोध कर रही थी। उज्जैन समेत प्रदेश के अलग-अलग जिलों से कुछ दिनों में ऐसी कई तस्वीरें सामने आईं, जिनमें स्कूली बच्चे, खासकर लड़कियां अपनी मांगों को लेकर मुखर नजर आईं। इसे जेन-अल्फा की मुखर होती आवाज के तौर पर देखा जा रहा है। मोटे तौर पर 2010-12 के बाद जन्मी इस पीढ़ी के बच्चे अब अपनी समस्याओं को लेकर चुप रहने के बजाय सीधे प्रशासन और सरकार के सामने सवाल रख रहे हैं। प्रदेश के छह मामले, जहां सड़कों पर उतरे जेन-अल्फा 1. भोपाल: रीजनल स्कूल के छात्र सड़क पर उतरे 18 अगस्त को भोपाल में रीजनल स्कूल के करीब 300 से 400 छात्र-छात्राएं स्कूल को केंद्रीय विद्यालय संगठन (KVS) में मर्ज किए जाने के प्रस्ताव के विरोध में सड़क पर उतर आए। बच्चों के हाथों में ‘सेव डीएमएस’ समेत अलग-अलग पोस्टर थे। उन्होंने मांगें नहीं माने जाने पर आंदोलन तेज करने की चेतावनी दी। इन स्कूलों की मूल अवधारणा शिक्षा में नए प्रयोग और नवाचार की रही है। यहां किए गए शैक्षणिक प्रयोगों के आधार पर देश की स्कूली शिक्षा में भी बदलाव किए जाते रहे हैं। 2. धार: आधी रात हॉस्टल से निकलीं 35 छात्राएं धार जिले के कुक्षी में आदिवासी छात्रावास की करीब 35 छात्राएं 16 अगस्त की देर रात खिड़कियों से निकलकर पीछे के रास्ते थाने की ओर पैदल चल पड़ीं। बच्चियों को रात में सड़क पर देख स्थानीय लोग और पुलिस उनके साथ हो लिए। बाद में तहसीलदार, एसडीओपी और थाना प्रभारी भी मौके पर पहुंचे। छात्राओं ने बताया कि 50 बेड वाले हॉस्टल में करीब 140 लड़कियां रह रही हैं। एक-एक बिस्तर साझा करना पड़ता है। मेन्यू के मुताबिक खाना नहीं मिलता और उसकी गुणवत्ता भी खराब है। छात्राओं का आरोप था कि शिकायत करने पर वॉर्डन चुप रहने की धमकी देती हैं। 17 अगस्त को धार के गंधवानी विकासखंड के केसवी स्थित नेताजी सुभाष चंद्र बोस बालिका छात्रावास की छात्राओं ने भी आंदोलन किया। उन्होंने मूलभूत सुविधाओं की कमी, खराब भोजन और अन्य अव्यवस्थाओं के विरोध में एसडीएम कार्यालय का घेराव किया। 3. छतरपुर: मंत्री का काफिला रोका छतरपुर के चंदला विधानसभा क्षेत्र में 14 अगस्त को स्कूली बच्चों ने राज्य मंत्री दिलीप अहिरवार का काफिला रोक दिया। मंत्री का काफिला बसराही गांव से गुजर रहा था। बच्चों के सड़क पर आ जाने के बाद मंत्री गाड़ी से उतरे और उनकी समस्याएं सुनीं। छात्र-छात्राओं ने बताया कि स्कूल पहुंचने के लिए पक्की सड़क नहीं है। आवाजाही में परेशानी होती है। मंत्री ने बताया कि सड़क का काम निजी जमीन के विवाद के कारण रुका था, जिसे अब सुलझा लिया गया है। उन्होंने सड़क सुधार के निर्देश दिए। 4. उज्जैन: 300 से ज्यादा छात्राओं ने घेरा कलेक्टर परिसर उज्जैन के सराफा क्षेत्र के स्कूल को दाऊदखेड़ी शिफ्ट करने के प्रस्ताव के विरोध में 14 अगस्त को 300 से ज्यादा छात्राएं कलेक्टर परिसर पहुंचीं। छात्राओं ने कई घंटे प्रदर्शन किया और प्रशासन पर सुनवाई नहीं करने का आरोप लगाया। विरोध की बड़ी वजह स्कूल का शहर से करीब 12 से 15 किलोमीटर दूर हो जाना है। छात्राओं के मुताबिक इससे सुरक्षा, परिवहन, समय और अतिरिक्त खर्च की समस्या पैदा होगी। प्रदर्शन के दौरान दो छात्राएं बेहोश भी हो गईं। फिलहाल स्कूल शिफ्टिंग का फैसला टाल दिया गया है। 5. सागर: कीचड़ भरे रास्ते पर चक्काजाम 17 अगस्त को सागर जिले के खुरई तहसील के निवारी गांव में हाई स्कूल तक पक्का रास्ता नहीं होने से परेशान छात्र-छात्राओं ने चक्काजाम कर दिया। मुख्य सड़क से स्कूल तक करीब डेढ़ किलोमीटर रास्ता बारिश में कीचड़ और पानी से भर गया है। ग्रामीणों के मुताबिक स्कूल भवन तीन साल पहले बन चुका है, लेकिन वहां तक पहुंचने के लिए सड़क नहीं बनी। मौके पर पहुंचे अधिकारी भी कीचड़ के कारण स्कूल तक नहीं पहुंच सके। प्रशासन ने बारिश तक पंचायत भवन में कक्षाएं लगाने का आश्वासन दिया। 6. विदिशा: छात्राओं ने बसें रोकीं 12 अगस्त को विदिशा के सिरोंज में ग्रामीण क्षेत्रों से स्कूल आने-जाने वाली छात्राओं ने निजी बसों का किराया बढ़ाए जाने के विरोध में प्रदर्शन किया। छात्राओं ने बसें रोक कर नारे लगाए- बच्चों को लूटना बंद करो, हमारा किराया कम करो। उनका कहना था कि पहले 10 से 15 रुपए किराया लगता था, जिसे अचानक बढ़ा दिया गया। गरीब परिवारों की छात्राओं के लिए रोज का अतिरिक्त किराया पढ़ाई पर सीधा असर डाल सकता है। आखिर जेन-अल्फा प्रदर्शन क्यों कर रहा? इन प्रदर्शनों में कोई बड़ी राजनीतिक मांग नहीं है। मुद्दे सीधे बच्चों की रोजमर्रा की जिंदगी और पढ़ाई से जुड़े हैं- जैसे स्कूल तक सड़क, हॉस्टल में जगह, अच्छा भोजन, सुरक्षित परिवहन और सस्ता किराया। कई मामलों में बच्चों के प्रदर्शन के बाद प्रशासन को तुरंत कदम उठाने पड़े। सागर में वैकल्पिक व्यवस्था का आश्वासन मिला। उज्जैन में स्कूल शिफ्टिंग का फैसला टला और छतरपुर में सड़क सुधार के निर्देश दिए गए। वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक दिनेश गुप्ता के मुताबिक, Gen Alpha की बात करें तो यह मुख्य रूप से स्कूल-कॉलेज जाने वाली पीढ़ी है और उनकी समस्याएं भी बेहद बुनियादी हैं। स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय नहीं हैं। पीने के पानी की समस्या है। रोजमर्रा की ऐसी कई दिक्कतें हैं, जिनका समाधान होना चाहिए। पॉलिटिकल कंसलटेंट और कैंपेनर विकास भारद्वाज के मुताबिक, नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ियों की तरह चुपचाप सहने वाली नहीं है। मोबाइल, वीडियो, सोशल मीडिया और तत्काल प्रतिक्रिया की दुनिया में पली यह पीढ़ी लापरवाही और उपेक्षा को जल्दी पहचानती है और उसे सार्वजनिक करने से भी नहीं हिचकती। उनके मुताबिक, जेन-अल्फा की आवाज यह संकेत देती है कि नई पीढ़ी शिक्षा को अधिकार की तरह देख रही है, एहसान की तरह नहीं। विरोध नहीं, लोकतांत्रिक जागरूकता की पहली पाठशाला विशेषज्ञों के मुताबिक, इन प्रदर्शनों को सिर्फ बच्चों का गुस्सा मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। जब स्कूली बच्चे खुद सड़क, सुरक्षा, हॉस्टल, भोजन और परिवहन जैसे सवाल उठाने लगें तो यह व्यवस्था के लिए चेतावनी भी है और उम्मीद भी। इन घटनाओं से एक बात साफ है कि बच्चे अब अपनी समस्याओं के लिए सिर्फ बड़ों के भरोसे नहीं बैठना चाहते। वे सवाल पूछ रहे हैं। अपनी बात रख रहे हैं और जवाब मांग रहे हैं।
