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’10 साल से इंतजार…कभी नहीं आया वह गुरुवार’:भोपाल में अपनों के ठुकराए बुजुर्गों का दर्द; पूर्व फिशरीज डायरेक्टर की पत्नी बोलीं- आश्रम ही सबकुछ

मोतियाबिंद की समस्या थी। तब एक मिठाई वाले ने मंदिर के सामने से आश्रम लाकर छोड़ दिया। मैं अकेली थी और सुरक्षित ठिकाना जरूरी था। तब से यही हूं। एक बार बेटा आया था और बोला- अगले गुरुवार को आऊंगा। वह फिर कभी नहीं आया। 80 बुजुर्ग की बुजुर्ग अंजली श्रीवास्तव ये बातें कह रही थीं, तब उनकी आंखों में बेटे के लौट आने की उम्मीद उभर आती हैं। 10 साल से इंतजार में दिन काट रही बुजुर्ग से पूछा गया कि क्या उन्हें अब भी उम्मीद है कि बेटा कभी आएगा? जवाब मिला- जबसे आई हूं, कोई दिन नहीं आया, जब उसका इंतजार नहीं किया हो। दरअसल, भोपाल में संचालित ‘अपना घर’ वृद्धाश्रम में 4 अगस्त 2026 को एक 70 साल के बुजुर्ग की मौत हो गई थी। घटना के दो दिन बाद तक शव इस उम्मीद में रखा रहा कि शायद उनका कोई अपना आएगा। लेकिन, 2 बेटों और 2 बेटियों के होने के बाद भी कोई नहीं आया। आखिरकार पुलिस की मदद से आश्रम के लोगों ने ही अंतिम संस्कार कर दिया। इस झकझोर देने वाली घटना के बाद दैनिक भास्कर की टीम ‘अपना घर’ आश्रम पहुंची। वहां रह रहे बुजुर्गों से बात की। इस दौरान उन्होंने अपनों की बेरुखी का दर्द बयां किया। किसी के पास परिवार है, लेकिन साथ नहीं है। किसी ने परिवार से दूरी बना ली है और किसी की आखिरी उम्मीद अब आश्रम ही है। इन बुजुर्गों की बातों में सबसे ज्यादा दर्द उस इंतजार का है, जो खत्म ही नहीं हो रहा। कोई 10 साल से बेटे के आने का इंतजार कर रही है तो कोई मान चुका है कि अंतिम समय में भी परिवार नहीं आएगा। पढ़िए, यह रिपोर्ट… अंजली श्रीवास्तव बोलीं- अब किसी के आने की उम्मीद नहीं भोपाल की रहने वाली अंजली श्रीवास्तव को करीब 10 साल पहले परिवारजनों से विवाद के बाद उन्हें घर से निकाल दिया गया था। किसी मंदिर के सामने बेसहारा बैठीं अंजली श्रीवास्तव को मिठाई की दुकान संचालित करने वाला कोई व्यक्ति ‘अपना घर’ आश्रम पहुंचा गया था। अब 80 साल की हो चुकीं अंजली बतातीं हैं कि उन्हें आज भी अपने बेटे के उस वादे के पूरा होने का इंतजार है, जो उसने तब किया था। वह हर इंतजार करती हैं कि शायद उनका बेटा उन्हें लेने आ जाए। हाल ही में साथ रहने वाले बुजुर्ग घनश्याम की मौत को लेकर जब उनसे पूछा गया कि क्या परिवार से कोई आएगा? इसके जवाब में अंजली कहती हैं कि उन्हें अब किसी के आने की उम्मीद नहीं है। रंगमंच से पहचान बनाई, अब आश्रम ही अपना परिवार आश्रम में रह रहीं रानी चंद्र सक्सेना की जिंदगी की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। वह भारत भवन की रंगकर्मी और थिएटर आर्टिस्ट रही हैं। उन्होंने वर्ष 1980 में भारत भवन जॉइन किया था। उस दौर में प्रसिद्ध रंग निर्देशक बाबा कारंत के निर्देशन में उन्होंने कई नाटकों में अभिनय किया और देश के अलग-अलग हिस्सों में थिएटर प्रस्तुतियों के लिए यात्रा की। रानी चंद्र बताती हैं कि उन्हें नाटकों के लिए सम्मान भी मिले। ‘स्कंदगुप्त’ नाटक के मंचन के दौरान उन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह से पुरस्कार मिला था। उन्होंने कन्याकुमारी तक जाकर प्रस्तुतियां दीं और लंबे समय तक रंगमंच से जुड़ी रहीं। वर्ष 1995 के आसपास बाबा कारंत के निधन के बाद परिस्थितियां बदलीं और संस्था से उनका जुड़ाव भी खत्म हो गया। इसके बाद उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो में ऑडिशन दिया और चयनित हुईं। करीब पांच साल तक वहां काम किया। इसके बाद दूरदर्शन के प्रादेशिक समाचार में करीब एक साल तक समाचार वाचन भी किया। रानी कहती हैं कि जिंदगी में उन्होंने बहुत कुछ किया, लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें धीरे-धीरे आश्रम तक पहुंचा दिया। पति फिशरीज विभाग में डायरेक्टर थे, बेटा विदेश में रानी चंद्र के पति देवेंद्र सक्सेना फिशरीज विभाग में डायरेक्टर थे। उनका एक बेटा है, जो विदेश में रहता है। बेटियां नहीं हैं। रानी बताती हैं कि परिवार के साथ रहने के दौरान परिस्थितियां ठीक नहीं रहीं। व्यवहार अच्छा नहीं था, इसलिए उन्होंने परिवार से अलग होकर आश्रम में रहना स्वीकार किया। वह कहती हैं, “मैंने सब कुछ छोड़ दिया और यहां आ गई। मुझे यहां किसी चीज की कमी नहीं है। मैं बहुत खुश हूं। 15 साल से आश्रम में रह रहीं रानी अब आश्रम को ही अपना परिवार मानती हैं। हाल की घटना के बारे में उनसे पूछा गया कि अगर उनकी मौत हो जाए तो अंतिम संस्कार कौन करेगा? रानी का जवाब बिल्कुल स्पष्ट था- “माधुरी मिश्रा जी करेंगी। किसी को बुलाने की जरूरत नहीं है। मेरा बेटा विदेश से यहां आएगा, यह संभव नहीं है। मुझे यहीं मरना है और इन्हीं के हाथों मुझे जाना है। जो कुछ है, अब यही मेरा है। ‘परिवार से कोई नहीं आता, फिर भी मैं खुश हूं’ रानी कहती हैं कि उन्होंने जिंदगी में बहुत काम किया। भारत भवन में थिएटर किया, देशभर में मंचन किए, आकाशवाणी और दूरदर्शन में काम किया। लेकिन आज उनका सबसे बड़ा सहारा आश्रम है। वह कहती हैं, यहां मुझे 15 साल हो गए। बहुत लोगों को यहां से जाते देखा है। किसी के परिवार वाले आते हैं, किसी के नहीं आते। मेरे लिए तो यही लोग हैं। उनकी बात में शिकायत कम और स्वीकार्यता ज्यादा है। वह कहती हैं कि अब उन्हें परिवार से कोई उम्मीद नहीं है। सुधीर बोले- ‘ऐसी घटनाएं देखते-देखते अब चिंता होने लगी है’ आश्रम में रहने वाले सुधीर भी लंबे समय से यहां हैं। उन्होंने बताया कि वह अपनी मां-पिता और दो बहनों के साथ रहते थे। पारिवारिक परिस्थितियों के कारण उन्हें आश्रम आना पड़ा। उनके पिता गैस एंड पावर प्लांट में सुपरवाइजर थे। सुधीर बताते हैं कि उनके साथ भी ऐसी परिस्थितियां बनीं कि आखिरकार उन्हें यहां आना पड़ा। हाल की घटना के बारे में उनका कहना है कि आश्रम में बुजुर्गों के आने-जाने और उनके परिवारों के नहीं पहुंचने की घटनाएं वे लंबे समय से देख रहे हैं। आए दिन ऐसी घटना घटती रहती है। फिर हम लोगों को भी चिंता होने लगती है कि हमारा क्या होगा? किस-किस की टेंशन लेकर बैठें? हम जहां हैं, खुश हैं। कोई मां-बाप अपनी मर्जी से घर नहीं छोड़ता’ ‘अपना घर’ वृद्धाश्रम की संचालिका माधुरी मिश्रा पिछले करीब 30 वर्षों से बुजुर्गों की सेवा कर रही हैं। उनके मुताबिक आश्रम में आने वाला कोई भी माता-पिता अपनी इच्छा से घर छोड़कर नहीं आता। जब मां-बाप घर की दहलीज लांघते हैं तो वे एक जिंदा लाश की तरह जीवन जीते हैं। कौन अपनी चारदीवारी छोड़ना चाहता है? हमारा प्रयास रहता है कि आश्रम में आने वाले बुजुर्ग उन्हें परिवार का हिस्सा मानें। किसी बुजुर्ग की मौत के बाद जब परिवार नहीं आता तो उसका असर सिर्फ उस बुजुर्ग की मौत तक सीमित नहीं रहता। आश्रम में रह रहे बाकी बुजुर्ग भी डर जाते हैं। वे देखते हैं कि मैं परेशान हूं, फोन कर रही हूं, लोगों को बुला रही हूं। उनके मन में सवाल आता है कि क्या हमारा भी ऐसा होगा? हम भी अकेले पड़ जाएंगे? विदेश तो छोड़ो, लोकल वाले भी नहीं आते माधुरी मिश्रा बतातीं हैं कि यह समस्या केवल उन परिवारों तक सीमित नहीं है जो दूसरे शहर या विदेश में रहते हैं। कई बार स्थानीय परिजन भी अंतिम समय में नहीं आते हैं। कई बार लोकल के रहने वाले परिजन भी ऐन मौके पर नहीं पहुंच पाते हैं। जबकि उन्हें ले जाने की व्यवस्था हो जाती है। आज जो परिस्थितियां हैं, वे बहुत दुखद हैं। एक बुजुर्ग का घर से चले जाना पूरे परिवार के लिए भावनात्मक घटना होनी चाहिए, लेकिन कई परिवारों में बुजुर्गों को ही बोझ समझ लिया जाता है। यह खबर भी पढ़ें… कारोबारी की मौत पर चेहरा देखने तक नहीं आए बेटे-बेटियां एक पिता ने जिंदगी भर मेहनत कर अपने चार बच्चों को पाला। जो कुछ कमाया, उनके बीच बांट दिया। जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर उसी पिता को अपनों से दूर वृद्धाश्रम में रहना पड़ा। मौत के बाद बच्चे उनका चेहरा देखने तक नहीं पहुंचे। पूरी खबर यहां पढ़ें… बेटों ने छोड़ा, बहुओं ने ठुकराया मां…सिर्फ एक शब्द नहीं, पूरा संसार है। मां जीवन का आधार है, लेकिन वक्त का सबसे दर्दनाक सच यह है कि जिस मां ने बच्चों को उंगली पकड़कर चलना सिखाया, आज वही मां उम्र के आखिरी पड़ाव पर सहारे की मोहताज है। बेटों ने घर से निकाल दिया, बहुओं ने साथ छोड़ दिया। फिर भी इन माताओं की जुबान पर शिकायत नहीं, सिर्फ बच्चों के लिए दुआ है। पढ़ें पूरी खबर…

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