आधुनिक उर्दू गजल के बेमिसाल शायर के इंतकाल के बाद शोक की लहर है। उनके जाने के साथ न सिर्फ एक शायर ही नहीं गया, बल्कि एक ऐसा इंसान भी चला गया, जिसने अपनी शायरी से आम आदमी को सोचने पर मजबूर किया। व्यवहार से लोगों को अपना बना लिया। भोपाल में उनके साथ मंच साझा करने वाले साहित्यकारों, पत्रकारों और साथियों ने उन्हें याद करते हुए कई भावुक और प्रेरक किस्से साझा किए। शख्सियत में अद्भुत नरमी और इंसानियत थी मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी की निदेशक नुसरत मेहंदी ने उनसे जुड़ी कई भावुक यादें साझा की। उन्होंने कहा कि बशीर बद्र साहब की शख्सियत में अद्भुत नरमी और इंसानियत थी, जो उन्हें एक बड़े शायर से कहीं ऊपर ले जाती थी। उन्होंने एक मुशायरे का जिक्र करते हुए बताया कि जब एक नई शायरा घबराहट में अपनी गजल पढ़ रही थीं। श्रोता हूटिंग करने लगे थे। तभी बशीर बद्र खुद खड़े हो गए। उन्होंने माइक लेकर कहा- ‘अच्छी शायरी को श्रोता तक पहुंचने में थोड़ा वक्त लगता है। आप शायरा और उसकी शायरी के बीच रुकावट बन रहे हैं। शेर रास्ते में मर रहा है।’ इस एक हस्तक्षेप ने माहौल बदल दिया। पूरा हाल खामोश हो गया और वही शायरा अपनी गजल पूरी कर सकी, जिसे बाद में खूब सराहना मिली। सरकारी दफ्तर जैसा नहीं था, अकादमी का माहौल
डॉ. मेहदी के मुताबिक, यह घटना बताती है कि बशीर बद्र सिर्फ अपने शेरों के नहीं, बल्कि नए शायरों के सपनों के भी रखवाले थे। उन्होंने बताया कि जब बशीर बद्र मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी के अध्यक्ष थे, तब अकादमी का माहौल किसी सरकारी दफ्तर जैसा नहीं, बल्कि एक अदबी घर जैसा होता था। उनका कमरा हमेशा खुला रहता, जहां नए-पुराने शायरों की महफ़िल जमी रहती थी। एक दिलचस्प वाकया साझा करते हुए उन्होंने बताया कि जब उन्होंने उनसे फाइलों पर हस्ताक्षर करने का आग्रह किया, तो बशीर बद्र मुस्कुराते हुए बोले “यह तो आपका काम है… आप कहिएगा तो मैं उन पर शेर लिख दूंगा। इस पर पूरा कमरा ठहाकों से गूंज उठा। व्यवहार में कोई औपचारिकता नहीं थी
भोपाल के जाने-माने शायर और एंकर बद्र वास्ती ने उनके साथ बिताए पलों को याद करते हुए कई दिलचस्प किस्से साझा किए। वास्ती ने बताया कि जब बशीर बद्र मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी के चेयरमैन थे, तब भी उनके व्यवहार में किसी तरह की औपचारिकता नहीं थी। मैं उर्दू पढ़ाने जाता था और कभी-कभी उनसे मुलाकात हो जाती थी। वे बड़े आराम से बैठ जाते, बातें करते, हंसी-मजाक करते। कभी अपने शेर सुनाते, कभी मेरे शेर सुनते जैसे कोई दोस्त हो। एक बार वे अपने साथियों के साथ किसी कार्यक्रम में आमंत्रित करने घर पहुंचे। हमने कहा कि भाई घर में कोई नहीं है। हम आपको चाय पिलाना चाहते हैं, लेकिन हमें चूल्हा जलाना नहीं आता। आप में से किसी को आता हो तो बना लो, सब साथ में चाय पीते हैं। वास्ती बताते हैं कि इस पर उन्होंने मजाक में जवाब दिया- साहब, हमें किसी के घर में आग लगाना नहीं आता। यह सुनकर सब ठहाका लगाकर हंस पड़े। उनका यही बेफिक्र और अपनापन भरा अंदाज उन्हें सबसे अलग बनाता था। अरे हमारे छोटे भाई समर जी आ गए सेवानिवृत्त डीएसपी और कवि चौधरी मदन मोहन समर ने बताया कि बशीर बद्र से उनके बेहद आत्मीय संबंध थे। वे मुझे छोटे भाई जैसा मानते थे। उनकी शायरी इतनी सरल और प्रभावी थी कि आम आदमी भी उसे आसानी से समझ सके, लेकिन उसमें इतनी गहराई होती थी कि वह सोचने पर मजबूर कर देती थी। उन्होंने सारणी के एक मुशायरे का ज़िक्र करते हुए कहा कि जब बशीर बद्र कार्यक्रम में पहुंचे तो प्रशंसकों ने उन्हें घेर लिया था। मैं दूर से आ रहा था, उन्होंने मुझे देखा और भीड़ के बीच से आवाज़ लगाई ‘अरे हमारे छोटे भाई समर जी आ गए…’ और फिर गले लगा लिया। यह मेरे लिए अविस्मरणीय पल है। उनकी गजलें उन्हीें के कोर्स का हिस्सा बनीं
वहीं वरिष्ठ पत्रकार मेहताब आलम ने उनके शुरुआती जीवन और उपलब्धियों को याद करते हुए बताया कि बशीर बद्र ने बहुत कम उम्र में शायरी शुरू कर दी थी। स्कूल के दिनों में ही वे लिखने लगे थे और जब वे अलीगढ़ पढ़ने गए, उससे पहले ही उनकी गजलें पाठ्यक्रम का हिस्सा बन चुकी थीं। यह अपने आप में बड़ी बात है कि एक शायर अपनी पढ़ाई से पहले ही पाठ्यक्रम में शामिल हो जाए। इसके बाद पाठ्यक्रम भी चेंज किया गया। वह उर्दू साहित्य में पहले ऐसे शख्स थे, जिनकी गजलें उन्हीं की आने वाली पढ़ाई में सामने आईं। बशीर बद्र उर्दू साहित्य के ऐसे दुर्लभ शायरों में थे, जिनकी रचनाएं उनके छात्र जीवन में ही पढ़ाई जाने लगी थीं। बाद में पाठ्यक्रम में बदलाव भी करना पड़ा। उन्हें राधाकृष्णन अवॉर्ड भी मिला और वे शुरू से ही टॉपर रहे। वहीं साहित्यकारों का मानना है कि बशीर बद्र की सबसे बड़ी ताक़त उनकी सादगी थी। उनकी गजलें न केवल दिल को छूती थीं, बल्कि सीधे आम आदमी की जिंदगी से जुड़ती थीं। उनके इंतकाल से उर्दू अदब को एक बड़ा नुकसान हुआ है, लेकिन उनकी शायरी और उनके साथ जुड़े ऐसे किस्से उन्हें हमेशा जिंदा रखेंगे। मेरे पहले मुशायरे में उन्होंने दाद दी, वह सबसे बड़ा सम्मान भोपाल के जाने-माने लेखक कौसर सिद्दीकी ने कहा कि बशीर बद्र का जाना सिर्फ भोपाल नहीं, बल्कि पूरी उर्दू दुनिया के लिए बड़ा नुकसान है। सिद्दीकी ने बताया कि उनका पहला बड़ा मुशायरा बशीर बद्र के साथ ही हुआ था। 1968 में शाहजहांपुर में ऑल इंडिया मुशायरा था, जिसमें मुझे भी पढ़ने का मौका मिला। उसी मंच पर बशीर बद्र भी मौजूद थे। यह मेरी उनसे पहली मुलाकात थी।उस मुशायरे में बशीर बद्र ने मेरे शेर सुने और दाद भी दी। मेरे लिए यह बहुत बड़ा सम्मान था। एक बड़े शायर का इस तरह सराहना करना मेरे सफर की बड़ी शुरुआत बन गया।”सिद्दीकी ने बताया कि इसके बाद भोपाल आने पर उनसे कई बार मुलाकातें होती रहीं, खासकर तब जब बशीर बद्र मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी के चेयरमैन थे। वे हमेशा बड़े अपनत्व और मोहब्बत से पेश आते थे। उन्होंने मुझे ‘अहमद शाह सैयद ऑल इंडिया अवॉर्ड’ भी अपने हाथों से दिया, जो मेरे लिए गर्व का विषय है।” उन्होंने भावुक होते हुए बताया कि जब बशीर बद्र की याददाश्त कमजोर हो गई थी, तब भी उनसे मिलने गया था। उन्होंने मुझे पहचाना नहीं, लेकिन अपने अंदाज में सलाम जरूर किया। यह मेरे लिए बहुत भावुक पल था। सिद्दीकी ने कहा कि बशीर बद्र का जाना उर्दू अदब के लिए अपूरणीय क्षति है। यह खबर भी पढ़ें… ‘शायर बशीर बद्र का 91 साल की उम्र में निधन उर्दू ग़ज़ल के शहंशाह डॉ. बशीर बद्र (91) नहीं रहे। उन्होंने गुरुवार दोपहर 12:15 बजे भोपाल में फानी दुनिया को अलविदा कहा। उर्दू अदब की रूह में समाए बशीर बद्र तक़रीबन 14 बरस डिमेंशिया की गिरफ़्त में रहे, जिससे उनकी याददाश्त कमजोर होती चली गई, मगर उनके शेर आज भी दिलों में धड़कते हैं। पूरी खबर यहां पढ़ें…
