मां…सिर्फ एक शब्द नहीं, पूरा संसार है। मां जीवन का आधार है, लेकिन वक्त का सबसे दर्दनाक सच यह है कि जिस मां ने बच्चों को उंगली पकड़कर चलना सिखाया, आज वही मां उम्र के आखिरी पड़ाव पर सहारे की मोहताज है। हैरानी की बात यह है कि बेटों ने घर से निकाल दिया, बहुओं ने साथ छोड़ दिया, महीनों मिलने नहीं आए… फिर भी इन माताओं की जुबां पर शिकायत नहीं, सिर्फ बच्चों के लिए दुआ है। दैनिक भास्कर ने मदर डे से पहले भोपाल के वृद्धाश्रमों में रह रहीं कई माताओं से बातचीत की। हर चेहरे पर दर्द था, आंखों में इंतजार था, लेकिन जब बच्चों का जिक्र आया तो हर मां ने एक ही बात कही, बच्चे बहुत बिजी हैं… बेटा ऑफिस जाता है… बहू पर काम ज्यादा है, इसलिए मिलने नहीं आ पाते
जबलपुर की सुधा राठी बिस्तर पर हैं। पेशाब के लिए नली लगी है। आंखें धंस चुकी हैं और उम्र से कई साल ज्यादा थकी हुई दिखती हैं। पिछले एक साल से वृद्धाश्रम में हैं। बेटे के बारे में पूछने पर चेहरे पर हल्की मुस्कान आ जाती है। कहती हैं, “बेटा बहुत बिजी रहता है… ऑफिस भी जाना होता है। बहू पर भी घर और बच्चों की जिम्मेदारी है… इसलिए मिलने नहीं आ पाते।” आंखों में इंतजार साफ दिखता है, लेकिन शिकायत का एक शब्द नहीं। बच्चे बिजी हैं… इसलिए नहीं आ पाते भोपाल की अनीता भटनागर की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। वह भी बच्चों के बारे में पूछने पर सिर्फ इतना कहती हैं, “बच्चे अपने काम में बिजी हैं… इसलिए मिलने नहीं आ पाते।” खुद बेसहारा थीं… फिर भी बेटे को अपने साथ रखा नागपुर की 80 साल से ज्यादा उम्र की सैला पिछले 2013 से वृद्धाश्रम में हैं। वॉकर के सहारे चलती हैं, लेकिन आज भी बेटे की चिंता नहीं छोड़ी। वृद्धाश्रम संचालिका बताती हैं हमें सूचना मिली कि दो बुजुर्ग सड़क किनारे बेसहारा बैठे हैं। जब हम पहुंचे तो पता चला कि उनके ही बड़े बेटे ने उन्हें घर से निकाल दिया था। दोनों को आश्रम लाया गया। कई दिन तक वे रोते रहे, खाना नहीं खाया। मां सिर्फ एक ही बात कहती थीं। मेरा दूसरा बेटा कहां होगा, क्या खाता होगा। मैं कैसे खाना खा लूं?’ हमने उस बेटे को भी ढूंढकर उनके साथ रखा। बाद में उसका एक्सीडेंट हो गया, पैर की हड्डी टूट गई। तब भी मां खुद लाचार थीं, लेकिन सबसे ज्यादा चिंता बेटे की ही कर रही थीं। गुरुवार को लेने आउंगा, 15 साल हो गए, गुरुवार नहीं आया’ अंजली श्रीवास्तव पिछले 15 साल से वृद्धाश्रम में हैं। अपने बच्चे नहीं थे, इसलिए सौतेले बच्चों को पालने के लिए मजदूरी की। स्कूलों में काम किया, गाड़ियां धोईं, बच्चों को पढ़ाया, उनकी शादी कराई। पति की मौत के बाद बच्चों ने घर भी बेच दिया और उन्हें वृद्धाश्रम छोड़ते वक्त कहा कि गुरुवार को लेने आएंगे। अंजली आज भी मुस्कुराकर कहती हैं, “15 साल हो गए… गुरुवार नहीं आया।” अपने दौर की कलाकारा, लेकिन बच्चों के व्यवहार से टूटकर वृद्धाश्रम चुना भोपाल की चंद्ररानी सक्सेना कभी मंच और रेडियो की पहचान थीं। 15 साल अभिनय किया, 5 साल रेडियो में काम किया। शादी के बाद बच्चों और करियर दोनों को संभाला। वह कहती हैं कि मैंने करियर के साथ बच्चों को संभाला… लेकिन बच्चे मुझे नहीं संभाल पाए। उनके व्यवहार से दुखी होकर मैंने खुद वृद्धाश्रम को अपना घर बना लिया। घर टूट रहे हैं, वृद्धाश्रम बढ़ रहे हैं अपना घर वृद्धाश्रम की संचालिका कहती हैं कि यहां रहने वाली लगभग हर मां की कहानी एक जैसी है। समाज में घर टूट रहे हैं और वृद्धाश्रम बढ़ रहे हैं। नई पीढ़ी स्वतंत्रता चाहती है, लेकिन माता-पिता की आर्थिक, मानसिक और शारीरिक कमजोरियों के साथ तालमेल नहीं बैठा पा रही। आंकड़े भी यही कहानी कह रहे हैं केंद्र सरकार के पुराने रिकॉर्ड (IPOP डेटा) के मुताबिक 2014-15/2015-16 में देश के 25 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 428 सरकार से सहायता प्राप्त वृद्धाश्रम संचालित थे, जहां 10,775 बुजुर्ग रह रहे थे। मध्यप्रदेश में तब 7 वृद्धाश्रम थे, जहां 175 बुजुर्ग रह रहे थे। अब केंद्र सरकार के 2025-26 सीनियर सिटीजन होम्स पोर्टल के मुताबिक देशभर में 696 सरकार से सहायता प्राप्त वृद्धाश्रम दर्ज हैं। यानी करीब एक दशक में 268 वृद्धाश्रम बढ़ गए। मध्यप्रदेश में वृद्धाश्रमों की संख्या 7 से बढ़कर 20 हो गई है। यानी 10 साल में करीब 186% बढ़ोतरी हुई है। देश में सबसे ज्यादा 91 वृद्धाश्रम आंध्र प्रदेश में हैं। मदर डे पर बाजारों में फूल, कार्ड और गिफ्ट जरूर बिक रहे हैं, लेकिन इन माताओं की सबसे बड़ी ख्वाहिश अब भी सिर्फ इतनी है, एक बार बच्चों की आवाज सुन लें… बस वही सबसे बड़ा तोहफा है।
