राजधानी की साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्थाएं पद्मश्री से सम्मानित विख्यात शायर डॉ. बशीर बद्र को सामूहिक रूप से श्रद्धांजलि अर्पित कर रही हैं। श्रद्धांजलि सभा दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय के राज सदन में आयोजित की जा रही है। 28 मई को बशीर बद्र के निधन के बाद शहर के साहित्यिक जगत में शोक की लहर है। इसी क्रम में एक मंच पर आकर उन्हें याद किया जा रहा है। बशीर बद्र को श्रद्धांजलि देने के लिए रंगकर्मी राजीव वर्मा, शायर बद्र वास्ती, हिंदी कवि विजय बहादुर सिंह, मनीष बादल, आलोक त्यागी समेत कई ख्यात कवि, शायर कार्यक्रम में मौजूद हैं। बद्र वास्ती ने कार्यक्रम की शुरुआत की। कार्यक्रम में मौजूद शायर और गजलकारों ने कहा कि बशीर साहब ने शायरी को जन-जन तक पहुंचाने का काम किया है। आलोक त्यागी ने बशीर बद्र से जुड़ी यादें साझा कीं कार्यकम में दुष्यंत कुमार के बेटे साहित्यकार आलोक त्यागी ने बशीर बद्र से जुड़ी यादें साझा करते हुए कहा कि एक बार उनके घर में आग लगने के बाद उन्होंने संडे मेल के लिए बशीर बद्र का इंटरव्यू लिया था। मोती मस्जिद के पास स्थित घर में पहली मुलाकात के दौरान बशीर बद्र ने बेहद आत्मीयता से स्वागत किया और लंबी बातचीत की। आलोक ने कहा कि बशीर बद्र ने उनसे कहा था कि जिस तरह दुष्यंत कुमार ने गजल को ठेठ हिंदी अदब से निकालकर आम आदमी तक पहुंचाया। उसी तरह वे उर्दू अदब से निकालकर गजल को आम लोगों तक ला रहे हैं। उन्होंने बशीर बद्र का एक शेर भी याद किया—
“शोहरत की बुलंदी तो पल भर का तमाशा है,
जिस डाल पर बैठे हो, वो टूट भी सकती है।” आलोक ने कहा कि बशीर बद्र की लोकप्रियता खुदा की देन थी और उनके दर्जनों शेर आज भी लोगों की जुबान पर हैं। सभा में दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय, मध्यप्रदेश लेखक संघ, वनमाली सृजन पीठ, मध्यप्रदेश लेखिका संघ, हिन्दी भवन, अभिनव कला परिषद, प्रभात साहित्य परिषद, कला मंदिर, अखिल भारतीय साहित्य परिषद, वरिष्ठ नागरिक मंच और अंतरराष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच सहित अन्य संस्थाओं की सहभागिता है। राजीव वर्मा बोले- इतनी बड़ी शख्सियत से खुलकर बात करने का साहस कभी नहीं जुटा सका वरिष्ठ रंगकर्मी राजीव वर्मा ने बशीर बद्र को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उनकी शख्सियत हमेशा बेहद आत्मीय और करीब महसूस होती थी। उन्होंने कहा कि कई मुशायरों में बशीर बद्र को सुना, मुलाकात भी हुई, लेकिन इतनी बड़ी शख्सियत से खुलकर बात करने का साहस कभी नहीं जुटा सके। राजीव वर्मा ने बताया कि हाल ही में एक कार्यक्रम में बशीर बद्र की पत्नी से मुलाकात हुई थी। तब पता चला कि वे किसी को पहचान नहीं पा रहे थे और बोल भी नहीं सकते थे। बाद में अखबार में पढ़ा कि अगर उन्हें कोई मिसरा सुनाया जाता तो वे दूसरा मिसरा पूरा कर देते थे। उन्होंने कहा कि यदि यह पहले पता होता तो जरूर उनसे मिलने जाते। उन्होंने कहा कि बशीर बद्र की शायरी की सबसे बड़ी ताकत उसकी पहुंच थी। उनकी ग़ज़लें सिर्फ साहित्यिक मंचों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि छोटे कस्बों और आम लोगों तक भी पहुंचीं। अंत में उन्होंने बशीर बद्र को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए ईश्वर से उन्हें शांति देने की प्रार्थना की। “न जी भर के देखा, न कुछ बात की…” “बड़ी आरजू थी मुलाकात की…” कवि मनीष बादल ने बशीर बद्र से जुड़ी अपनी भावुक स्मृतियां साझा करते हुए कहा कि भोपाल आने के पीछे उनके लिए दो बड़े आकर्षण थे- दुष्यंत कुमार और बशीर बद्र। साहित्य से जुड़ने के बाद उन्हें लगा कि इन दोनों महान शख्सियतों के शहर में आना उनके जीवन का महत्वपूर्ण फैसला था। उन्होंने बताया कि मित्र अकबर की मदद से उन्हें बशीर बद्र के बेटे तैयब बद्र का नंबर मिला। अनुमति मिलने के बाद वे उनके घर पहुंचे, जहां पहली बार बशीर बद्र से मुलाकात हुई। मनीष बादल ने कहा कि तब उन्हें पता चला कि बशीर बद्र डिमेंशिया से जूझ रहे हैं और ठीक से बोल या पहचान नहीं पा रहे थे। उन्होंने बताया कि बातचीत का कोई जवाब नहीं मिलने पर तैयब बद्र ने उनसे बशीर बद्र का कोई शेर पढ़ने को कहा। तब उन्होंने पढ़ा—
“न जी भर के देखा, न कुछ बात की…”
जिस पर बशीर बद्र ने हल्की मुस्कान के साथ दूसरा मिसरा कहा—
“बड़ी आरजू थी मुलाकात की…” मनीष बादल ने कहा कि यह पल उनके लिए बेहद भावुक कर देने वाला था। उन्होंने यह भी कहा कि बशीर बद्र जैसे बड़े शायर के लिए और अधिक प्रयास और सम्मान होने चाहिए थे। हिंदी पाठकों में ज्यादा लोकप्रिय रहे बशीर बद्र: विजय बहादुर सिंह हिंदी कवि विजय बहादुर सिंह ने कहा कि बशीर बद्र की शायरी ने हिंदी और उर्दू के बीच की दूरी कम की। उन्होंने कहा कि उर्दू के कई बड़े शायर हिंदी पाठकों के बीच ज्यादा लोकप्रिय हैं और यह साबित करता है कि भाषा से ज्यादा विवाद लिपि का है। उन्होंने प्रेमचंद, मीर और गालिब का उदाहरण देते हुए कहा कि हिंदी-उर्दू साहित्य को अलग-अलग नहीं, बल्कि “हिंदुस्तानी साहित्य” के रूप में देखने की जरूरत है। विजय बहादुर सिंह ने बशीर बद्र की शायरी की तुलना ‘गुनाहों का देवता’ के गद्य से करते हुए कहा कि उनकी शायरी दिल के पास से गुजरती शीतल हवा जैसी अनुभूति कराती है। उन्होंने आचार्य राजशेखर का उल्लेख करते हुए कहा कि बड़ा शायर वही होता है, जिसकी आवाज गांव के चरवाहे तक पहुंचे, और बशीर बद्र की लोकप्रियता इसी बात का प्रमाण है। बद्र साहब ने खुद अपनी बीमारी के बारे में बताया था: ऋषि श्रृंगारी वरिष्ठ कवि ऋषि श्रृंगारी ने बशीर बद्र से जुड़ी कई भावुक यादें साझा कीं। उन्होंने बताया कि एक बार दोनों ट्रेन से साथ यात्रा कर रहे थे। मंडीदीप के बाद बशीर बद्र अचानक असहज और लगभग बेहोशी जैसी स्थिति में आ गए। इटारसी पहुंचने पर पानी पिलाने और कुछ देर आराम के बाद वे सामान्य हुए। तब उन्होंने खुद अपनी बीमारी के बारे में बताया। ऋषि श्रृंगारी ने कहा कि उसी दौरान स्टेशन पर एक किताब विक्रेता बशीर बद्र को पहचान गया और उनकी किताब पर ऑटोग्राफ लेने पहुंचा। इस पर उन्होंने मुस्कराते हुए कहा— “किताब वैसे भी बिक जाएगी, अब जरूर बिकेगी।” उन्होंने बताया कि बाद में दोनों एक कार्यक्रम और मुशायरे में साथ रहे। बशीर बद्र बेहद विनम्र स्वभाव के थे। एक कार्यक्रम में उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा था— “श्रृंगारी जी, आपके संचालन में पढ़ रहा हूं, हमारा ध्यान रखिए, हम छोटे लोग हैं।” ऋषि श्रृंगारी ने कहा कि इतनी बड़ी शख्सियत होने के बावजूद बशीर बद्र हमेशा आत्मीयता और सादगी से भरे रहे। बशीर बद्र ने केवल शायरी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया: बद्र वास्ती उर्दू शायरी की दुनिया में पद्मश्री बशीर बद्र का नाम एक ऐसे शायर के रूप में लिया जाता है, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी ग़ज़ल को समर्पित कर दी। यह बात साहित्यकार बद्र वास्ती ने एक कार्यक्रम के दौरान कही।
उन्होंने कहा कि बशीर बद्र ने करीब 17 वर्षों तक साहित्य सेवा की और उनकी प्रमुख कृतियों में ‘उर्दू शायरी’, ‘इमेज’, ‘एकाई’ और ‘कुल्लियात-ए-बशीर बद्र’ शामिल हैं। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि बशीर बद्र उन गिने-चुने शायरों में हैं, जिन पर बाद की पीढ़ियों ने सबसे अधिक लिखा।
बद्र वास्ती ने एक रोचक प्रसंग साझा करते हुए बताया कि लंदन की एक प्रतिष्ठित लाइब्रेरी में जहां अंग्रेजी के महान कवि किट्स, शेली और शेक्सपीयर की रचनाएं सुरक्षित हैं, वहीं बशीर बद्र की गजलों को भी विशेष स्थान दिया गया है। यह किसी भारतीय या एशियाई शायर के लिए बड़ी उपलब्धि है।
उन्होंने कहा कि बशीर बद्र की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने कभी भी सस्ती लोकप्रियता के लिए भावनात्मक या धार्मिक उन्माद भड़काने वाली शायरी नहीं की। राजनीति जैसे विषयों को भी उन्होंने बेहद सलीके और संतुलन के साथ अपने अशआर में पिरोया। एक बार सरकार गिरने के बाद बशीर बद्र ने एक शेर सुनाया—
“मौसमों के आने में, मौसमों के जाने में,
और जाम टूटेंगे इस शराबखाने में।”
इस पर मौजूद श्रोताओं ने उनकी शायरी की गहराई और सलीके की सराहना की।
बद्र वास्ती ने अंत में कहा कि बशीर बद्र की शख्सियत और उनकी शायरी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी। दुष्यंत संग्रहालय संचालक करुणा राजुरकर ने बशीर साहब की शायरी पढ़कर उन्हें श्रद्धांजलि दी।
उन्होंने कहा- मुझे मालूम है, उसका ठिकाना फिर कहां होगा… परिंदा आशुमां छूने से जब नाकाम हो जाए… चिरागों की तरह आंखें जले जब शाम हो जाए हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाए। उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो। न जाने किस गले में जिंदगी की शाम हो जाए… देखिए तस्वीरें…
कठिन फारसी-अरबी शब्दों को निकाला उर्दू अकादमी की निदेशक नसरत मेहंदी ने कहा कि बशीर बद्र ने उर्दू शायरी को कठिन फारसी-अरबी शब्दों से निकालकर आम लोगों तक पहुंचाया। उनकी आसान और असरदार शायरी ने नई पीढ़ी के शायरों को हौसला दिया कि साधारण भाषा में भी गंभीर शायरी की जा सकती है। उन्होंने बताया कि शुरुआती दौर में जब उनकी शायरी को मुशायरों में समझा नहीं जा रहा था, तब बशीर बद्र ने खुद खड़े होकर लोगों से ध्यान से सुनने की अपील की थी। नशरत मेहंदी के मुताबिक बशीर बद्र सिर्फ बड़े शायर ही नहीं, बल्कि नए शायरों को आगे बढ़ाने वाले बेहद विनम्र और प्रेरणादायी व्यक्तित्व भी थे। बशीर बद्र ने उर्दू की कठिन जमीन से निकालकर आमफहम भाषा तक पहुंचाया: पटवा वरिष्ठ पत्रकार सुरेश पटवा ने कहा कि बशीर बद्र की असली ताकत उनकी भाषा की सादगी थी। उन्होंने कहा कि बड़ा शायर वही होता है, जो लोगों की जुबान और समाज की आत्मा को समझ सके। सुरेश पटवा ने भारतीय संस्कृति को विभिन्न सभ्यताओं के मेल का परिणाम बताते हुए कहा कि यही मिश्रित संस्कृति हिंदुस्तानी तहजीब की पहचान है। उन्होंने कहा कि मिर्ज़ा गालिब ने शायरी को फारसी के पहाड़ से उर्दू के मैदान तक उतारा था, जबकि बशीर बद्र ने उसे उर्दू की कठिन जमीन से निकालकर आमफहम भाषा तक पहुंचाया। उन्होंने कहा कि बशीर बद्र को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी, जब उर्दू और हिंदी शायरी के बीच का भेद खत्म हो और सिर्फ “हिंदुस्तानी” भाषा और साहित्य जिंदा रहे। अंत में उन्होंने बशीर बद्र को नमन करते हुए कहा कि उन्होंने शायरी को आम आदमी की भाषा बना दिया।
