Homeमध्यप्रदेशPSC की तैयारी करते-करते बन गई 'वेफल वाली':मां बोली- दूसरों के गेहूं...

PSC की तैयारी करते-करते बन गई ‘वेफल वाली’:मां बोली- दूसरों के गेहूं काटे, प्याज उखाड़ी; बेटियों के बिजनेस करने पर लोगों ने मारे ताने

खेतों में गेहूं काटे। 100 रुपए रोज दिहाड़ी में प्याज उखाड़ी। पांच बेटियां को भर पेट खाना मिले, वो पढ़ सकें इसलिए दिनभर जद्दोजहद भी की। परेशानियाें से निकलकर बेटियों ने बिजनेस का सोचा। जब ठेले पर वेफल बेचने की बात आई, तो ताने मिले कि पढ़ी-लिखी लड़कियाें से क्या अब ठेला चलवाएगी। मैंने सिर्फ मन की बात सुनी, बेटियों पर भरोसा किया। यहां कहना है गुना में रहने वाली अजब बाई का। उनकी पांच बेटियां हैं, जिन्होंने बेल्जियम के कॉन्सेप्ट पर ‘वेफल वाली’ नाम से स्वीट डिश का बिजनेश शुरू किया है। मदर्स डे पर पढ़िए, एक मां के संघर्ष की कहानी… पति गए तो पांच बेटियों व बेटे को अकेले पाला
मूलरूप से राजगढ़ जिले की रहने वाली अजब बाई बताती हैं कि वह 2022 में गुना आकर शिफ्ट हो हुईं। उनका ससुराल राजगढ़ के एक छोटे से गांव बेरिया खेड़ी में है। वह अपने किसान पति गुलाब सिंह के साथ वे गांव में ही रहती थीं। उनके जीवन में पांच बेटियां पूजा, माला, सोनी, सरगम और नंदिनी के बाद एक बेटा कृष्णा आया। बच्चों की पढ़ाई से लेकर सबकुछ अच्छे से चल रहा था। साल 2016 में बीमारी के कारण पति का देहांत हो गया। जैसे सबकुछ बिखर सा गया। जब यह हुआ तब बड़ी बेटी की उम्र मात्र 13 साल थी। वह बताती हैं कि घर की पूरी जिम्मेदारी मुझ पर आ गई। पति थे, तो घर के बाहर जाने का कभी मौका नहीं मिला था। अजब बाई ने बताया कि उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में हार नहीं मानी और पहली बार परिवार के लिए दहलीज पार किया। खेतों में फसल काटी, प्याज उखाड़ी
अजब बाई बताती हैं कि बच्चे छोटे ही थे। परिवार चलाने के लिए रुपयों की जरूरत थी। भरण-पोषण करने के लिए लोगों के खेतों में गेहूं काटे। प्याज के सीजन पर प्याज उखाड़ी। दिनभर काम के बदले 100 रुपए मिलते थे। इन्हीं रुपयों से बच्चों की परवरिश शुरू की। उन्होंने बताया कि बच्चे थोड़े संभले तो दूसरों के खेत को ठेके पर लेना शुरू किया। बच्चे स्कूल से आकर फसल काटने के साथ ही दूसरे कामों में हाथ बंटाने लगे। एक बेटी रोटी बनाती और भाई बहनों को संभालती
अजब बाई बताती हैं कि खेतों में काम करने के लिए बड़ी बेटी को अपने साथ ले जाती थी। छोटी बेटी माला घर संभालती थी। वही दोनों समय का खाना बनाती। बाकी बच्चों को भी वही संभालती थी। बहुत मुश्किल में वो समय गुजरा। एक दिन सोचा गांव में क्या रखा है, बच्चों को अच्छी शिक्षा देनी है तो शहर जाना होगा। बेटियों को लिया और गुना आ गई। बड़ी बेटी पढ़ाई कर रही थी, तो उसे तैयारी के लिए इंदौर भेजा। जब घर में कोई बीमार हो जाता, तो उसे बार-बार इंदौर से गुना आना पड़ता। इंदौर से लौटी बेटी, बिजनेस का सुन लोगों ने ताने मारे
पढ़ाई के बाद 2025 में बेटी पूजा वापस गुना आ गई। वह इंदौर से ही कुछ सीखकर आई थी। बोली- वेफल का ठेला लगाएंगे। उसने कहा- मम्मी यहीं कुछ बिजनेस शुरू करेंगे। जब यह बात आस पड़ोस के लोगों को पता चली, तो उन्होंने ताने मारने शुरू किए। अब जानिए, उस लड़की की कहानी, जिसे आज वेफल वाली के नाम से जाना जाता है…
शहर के आंबेडकर चौराहे पर रोजाना शाम 6 से रात 11 बजे तक स्वीट डिश का एक ठेला लगता है। इसका नाम है ‘वेफल वाली।’ ठेले पर काले कलर की कैप लगाए और एप्रेन पहने पांच लड़कियां स्वीट डिश बनाती और ग्राहकों को सर्व करती नजर आती हैं। इन्हीं में सबसे बड़ी है पूजा (23)। वही यह कॉन्सेप्ट गुना में लेकर आई है। पूजा बताती हैं कि 2016 में अचानक मेरे पिता का देहांत हो गया। मैं घर की सबसे बड़ी बेटी थी, मां पर बहुत जिम्मेदारियां थीं। मैंने पढ़ाई के साथ मां के काम में हाथ बंटाना शुरू कर दिया। सुबह स्कूल जाती, दोपहर में आकर मां के कामों में हाथ बांटती। अपनी खेती का काम भी मैं ही देखती थी। ब्यावरा से ही कंप्यूटर साइंस में BSc किया। पूजा ने बताया कि मेरे मन में था कि पढ़ लिखकर अधिकारी बनूं, इसलिए PSC की तैयारी के लिए इंदौर चली गई। वहां पढ़ाई चल ही रही थी, लेकिन घर का काम भी देखना होता था। कोई बीमार होता, तो घर आना पड़ता था। फिर भी पढ़ाई जारी रखी। MPPSC का एग्जाम भी दिया, लेकिन उसमें सफलता नहीं मिली। घर में मां अकेली परेशान होती थी, तो सोचा कि घर चलते हैं, वहीं पर कुछ करेंगे। इंदौर में ही वेफल का कॉन्सेप्ट देखा था। कई बार खाने गए थे, तो यह अच्छा लगा। गुना लौटी तो बिजनेस का प्लान बना
पूजा ने बताया 2025 में मैं इंदौर से वापस गुना लौट आई। यहां घर में ही एक ब्यूटी पार्लर शुरू किया। मकानों में लगने वाली सेंटिंग का बिजनेस भी किया। घर में हम छह भाई बहन हैं, गुजारा नहीं हो पा रहा था। मन में कुछ अच्छा करने का विचार था। ऐसे में वेफल के काम को आगे बढ़ाने का सोचा। मैंने इसके बारे में मां को बताया। उन्होंने जब और लोगों को बताया तो लोगों ने ताने मारे और कहा कि लड़कियों से ये काम करवाएगी। हालांकि, हमने हार नहीं मानी। इंदौर जाकर इसे बनाने का तरीका सीखा। सामान कहां से और कैसे आएगा, इसकी जानकारी ली। बेल्जियम के इस कॉन्सेप्ट को पूरी तरह समझा। सुबह से शुरू हो जाती है प्रक्रिया
शाम 6 से रात 11 बजे तक वेफल की बिक्री होती है। हालांकि इसके लिए तैयारी सुबह से ही करनी पड़ती है। घर में ही वेफल तैयार करते हैं। क्रीम और चॉकलेट तैयार करना होता है। इसमें भी पूरा परिवार मेहनत करता है। दोपहर 2 बजे तक सामग्री तैयार करते हैं। शाम 5 बजे सामान आंबेडकर चौराहे पर पहुंच जाता है। घर लौटने में रात के 1 बज जाते हैं। जानिए क्या होता है वेफल
वेफल एक व्यंजन है जो आमतौर पर खमीर वाले घोल या आटे से बनाया जाता है और दो पैटर्न वाली प्लेटों के बीच पकाया जाता है। इससे इसे एक विशिष्ट आकार, आकृति और सतह मिलती है। इस्तेमाल किए जाने वाले वेफल आयरन के प्रकार और रेसिपी के आधार पर इसमें कई विविधताएं होती हैं। यह पूरी दुनिया में खाए जाते हैं, खासकर बेल्जियम में, जहां इसकी एक दर्जन से अधिक क्षेत्रीय किस्में हैं। वेफल ताजा बनाए जा सकते हैं या व्यावसायिक रूप से बेक किए गए और पैक किए गए वेफल को ताजा या जमे हुए रूप में गर्म किया जा सकता है। इसके ऊपर चॉकलेट, मिल्क क्रीम के घोल डालकर ग्राहकों को सर्व किया जाता है।

Stay Connected
16,985FansLike
2,458FollowersFollow
61,453SubscribersSubscribe
Must Read
Related News

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here