मध्य प्रदेश के आधे हिस्से में सूखे जैसे हालात हैं। 55 में से 30 जिलों में सामान्य बारिश का कोटा पूरा नहीं हुआ है। इनमें भी 11 जिले ऐसे हैं, जहां 80% से कम पानी गिरा। आलीराजपुर में तो आधी बारिश भी नहीं हुई। पश्चिमी हिस्से, यानी इंदौर, उज्जैन, नर्मदापुरम, ग्वालियर-चंबल संभाग में 12% तक कम पानी गिरा। पूर्वी हिस्से जबलपुर, रीवा, सागर और शहडोल संभाग में 4% ज्यादा बारिश हुई। प्रदेश में दक्षिण-पश्चिम मानसून की सामान्य बारिश औसत 37.3 इंच है। इस बार 35.6 इंच पानी ही गिरा, जो ओवर-ऑल 4% कम है। मौसम विशेषज्ञ की मानें तो अनियमित बारिश से फसल, पेयजल और उद्योग पर असर पड़ेगा। दैनिक भास्कर ने इकोनॉमी एक्सपर्ट डॉ. देवेंद्र विश्वकर्मा और मौसम एक्सपर्ट शैलेंद्र कुमार नायक से बात कर समझा कि इस बारिश का खेती, बड़े शहरों में पेयजल, सिंचाई पर क्या असर पड़ेगा? पहले जानते हैं एमपी के जिलों में बारिश का स्टेटस। ग्राफिक्स से जानिए, कहां कोटा फुल हुआ 5 साल में सबसे कम बारिश प्रदेश में इस बार 5 साल की तुलना में सबसे कम बारिश रिकॉर्ड की गई है। साल 2022 में सबसे ज्यादा 46 इंच पानी गिरा था। 2023 में 37.2 इंच, 2024 में 40.2 इंच और 2025 में 45.2 इंच बारिश हुई थी। वहीं इस बार 35.8 इंच पानी ही गिरा है। बता दें कि इस बार मानसून 9 दिन देरी से 24 जून को पहुंचा था और अगले 9 दिन में पूरे प्रदेश को कवर कर लिया। देरी की वजह से प्रदेश में जून में 30 प्रतिशत बारिश कम हुई थी, लेकिन जुलाई के पहले सप्ताह में ये आंकड़ा प्लस में 8 प्रतिशत पर आ गया। अगस्त के दूसरे सप्ताह में भारी बारिश का दौर शुरू हो गया, जो आखिरी तक तक जारी रहा। सितंबर के पहले सप्ताह में भारी बारिश का दौर बना रहा। तीसरे सप्ताह पश्चिमी हिस्से में अच्छी बारिश हुई। आखिरी सप्ताह प्रदेशभर में कहीं तेज तो कहीं हल्की बारिश हुई। जुलाई, अगस्त और सितंबर में कोटे से ज्यादा बारिश जुलाई, अगस्त और सितंबर में कोटे से ज्यादा पानी गिरा, लेकिन वह जून की भरपाई नहीं कर सका। लिहाजा, प्रदेश में सामान्य से कम बारिश रिकॉर्ड की गई। मानसूनी पीरियड 30 सितंबर तक 904 मिमी, यानी 35.6 इंच (95.4 प्रतिशत) रिकॉर्ड की गई, जो ‘सामान्य बारिश’ की कैटेगिरी से नीचे है। IMD (मौसम केंद्र) के मुताबिक, 96 से 104 प्रतिशत बारिश ही ‘सामान्य बारिश’ की कैटेगिरी में शामिल हैं। यदि 0.6% पानी और गिर जाता तो प्रदेश इस कैटेगिरी में पहुंच जाता, यानी इस बार प्रदेश में ‘सामान्य से कम’ बारिश दर्ज हुई है। एक्सपर्ट बोले- इस बार बारिश का लंबा दौर नहीं रहा मौसम विशेषज्ञ शैलेंद्र कुमार नायक कहते हैं- इस बार प्रदेश में बारिश का ट्रेंड बदला हुआ देखने को मिला। कई जिलों में इतनी अतिवृष्टि हुई कि जनजीवन प्रभावित रहा। कई में अनियमित बारिश भी हुई। जैसे कभी तेज बारिश तो कभी लंबा ब्रेक। इस वजह से हालात ठीक नहीं है। पहले 8 से 10 दिन लगातार बारिश होती थी, लेकिन इस बार अधिकतम दो दिन तक ही लगातार पानी गिरा। पहले बंगाल की खाड़ी से डिप्रेशन, लो प्रेशर एरिया (निम्न दाब क्षेत्र) से एक्टिव होते थे और सागर क्षेत्र से होते हुए प्रदेश के कई हिस्सों में गुजरते थे। इससे अति भारी या भारी बारिश होती थी। इस बार सिस्टम इतने मजबूत नहीं रहे। मानसूनी सीजन में भी प्रदेश के पश्चिमी हिस्से में दिन में गर्म रहे। बारिश के अंतराल की वजह से जमीन सूखने लगी। इस वजह से पानी जमीन के अंदर नहीं उतरा। वर्तमान में तेज धूप है और जमीन सूख रही है। इससे कुछ दिनों के बाद ही भू-जल स्तर नीचे जाने लगेगा। माइक्रो लेवल पर काम करने की जरूरत विशेषज्ञ नायक कहते हैं कि जिन जिलों में 20 प्रतिशत या इससे कम पानी गिरा है, वहां पर सरकार को माइक्रो लेवल पर काम करने की जरूरत है। जब किसी इलाके में 26 प्रतिशत या उससे कम बारिश होती है तो वह इलाका सूखा घोषित होता है। इस बार सूखे के दायरे में आने वाले कई जिले हैं। यहां पर सरकार सर्वे कराकर पेयजल की स्थिति का आकलन लगाए। अब जानिए, कम बारिश के 3 बड़े असर के बारे में.… 1. खेती पर असर : सोयाबीन, गेहूं की कम पैदावार के आसार प्रदेश में सोयाबीन का सबसे ज्यादा उत्पादन मालवा, यानी उज्जैन संभाग में होता है। इसके अलावा इंदौर, भोपाल, नर्मदापुरम संभाग में भी खेती की जाती है। इस बार 52 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सोयाबीन की बोवनी की गई है। खरीफ फसलों की बोवनी का कुल रकबा 134.31 लाख हेक्टेयर है। इस बार उज्जैन, इंदौर और नर्मदापुरम संभाग में कम बारिश हुई है। ऐसे में सोयाबीन के उत्पादन में असर पड़ने की संभावना है। मप्र-छत्तीसगढ़ आर्थिक परिषद के सचिव डॉ. देवेंद्र विश्वकर्मा कहते हैं कि पश्चिमी हिस्से में कम पानी गिरने का असर सीधे तौर पर फसलों पर भी पड़ेगा। सोयाबीन का उत्पादन 2 से 3 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हो सकता है। वहीं पानी की कमी से गेहूं-चने की फसलें भी प्रभावित होंगी। फसलों का प्रभावित होना, यानी सीधे तौर पर मार्केट पर असर पड़ना तय है। फसलें प्रभावित होंगी तो किसानों के पास पैसा नहीं आएगा। पैसा नहीं होगा तो अर्थव्यवस्था गड़बड़ाएगी। उद्योगों को भी पानी नहीं मिलेगा। यहां भी उत्पादन प्रभावित रहेगा। भारतीय किसान संघ के प्रांत प्रचार प्रमुख राहुल धूत ने बताया कि सबसे ज्यादा गेहूं-चने की फसलों में पानी की किल्लत सामने आएगी। ज्यादातर किसान भू-जल से सिंचाई करते हैं। चूंकि, अनियमित बारिश की वजह से भू-जल स्तर नहीं बढ़ा है। इस वजह से रबी फसलें प्रभावित होंगी। 2. जलसंकट : 19 डैम में 10 से 90% पानी भरा प्रदेश में कुल 54 बड़े डैम हैं। इनमें से 35 डैम ऐसे हैं, जो 90% या इससे ज्यादा भरे। 9 डैम में 75 से 90% प्रतिशत, 5 में 50 से 75%, 4 में 25 से 50% और एक डैम में 10 से 25% ही जलभराव हुआ है। ये डैम सिंचाई और पेयजल दोनों के लिए काम आते हैं। इस वजह से प्रदेश के बड़े हिस्से में पेयजल संकट भी खड़ा हो सकता है। इसलिए जलसंसाधन मंत्री तुलसीराम सिलावट ने 90 प्रतिशत से अधिक जलभराव वाले 35 डैमों की विशेष निगरानी करने को कहा है। भोपाल में 41 इंच से ज्यादा बारिश हो चुकी है, जो सामान्य से 9% ज्यादा है। इस वजह से भोपाल की लाइफ लाइन बड़ा तालाब, भदभदा और कलियासोत डैम फुल हो चुके हैं। भदभदा और कलियासोत डैम के तीन बार गेट खोले गए। केरवा और कोलार में पानी की कमी है। राजधानी में 30 फीसदी पेयजल की आपूर्ति बड़ा तालाब से की जाती है। वहीं, कोलार, केरवा और नर्मदा से 70 फीसदी आपूर्ति होती है। कलियासोत का पानी सिंचाई के लिए उपयोग होता है। इंदौर में करीब साढ़े 9 इंच पानी कम गिरा है, जो सामान्य से 27 प्रतिशत कम है। शहर में पानी की सप्लाई नर्मदा नदी, यशवंत सागर डैम और बिलावली तालाब से होती है। नर्मदा से 450 एमएलडी पानी सप्लाई होता है तो यशवंत सागर और बिलावली डैम से 30 एमएलडी पानी की आपूर्ति होती है। उज्जैन में गंभीर डैम से पेयजल सप्लाई होता है। इस मानसून में गंभीर डैम नहीं भर सका। जबलपुर और ग्वालियर के डैम की स्थिति ठीक है। 3. बिजली पर असर: उत्पादन प्रभावित होने की संभावना खंडवा, मंदसौर, अशोकनगर, शिवपुरी में पांच बड़े हाइड्रो पावर प्लांट्स हैं। इनमें गांधीसागर, ओंकारेश्वर, इंदिरा सागर, राजघाट, मणिखेड़ा जल विद्युत गृह शामिल हैं। कम बारिश की वजह से बिजली उत्पादन में असर पड़ेगा। विशेषज्ञ डॉ. विश्वकर्मा ने बताया- पूर्वी हिस्से में पानी की उपलब्धता होने से बिजली उत्पादन को लेकर राहत मिल सकती है।
