केरल हाईकोर्ट ने कहा है कि जज कानून के सवालों पर अलग राय रख सकते हैं, लेकिन उनके रिश्ते में आपसी सम्मान और संयम जरूरी है। न्यायाधीशों के मत अलग हो सकते हैं, लेकिन कोई भी दूसरे से ऊपर नहीं है। जस्टिस देवन रामचंद्रन और जस्टिस बसंत बालाजी की डिवीजन बेंच ने कहा कि हाईकोर्ट के सभी जज समान दर्जे के होते हैं। किसी भी बेंच को दूसरी बेंच पर संस्थागत श्रेष्ठता का दावा नहीं करना चाहिए। कोच्चि में 26 अक्टूबर को जारी कोर्ट की प्रेस रिलीज के अनुसार, बेंच ने यह टिप्पणी तिरुवनंतपुरम सर्विस को-ऑपरेटिव बैंक के एक कर्मचारी की अपील पर 15 अक्टूबर के फैसले में की। कोर्ट ने लेबर कोर्ट को अनुशासनात्मक कार्रवाई की समय-सीमा बढ़ाने के आवेदन पर दो महीने में फिर से विचार करने का निर्देश दिया। ‘पीयर रेस्ट्रेंट’ को न्यायिक अनुशासन का आधार बताया डिवीजन बेंच ने ‘पीयर रेस्ट्रेंट’ को न्यायिक अनुशासन का बुनियादी हिस्सा बताया। कोर्ट ने कहा कि सभी जजों का दर्जा समान है और कोई बेंच दूसरी बेंच से संस्थागत रूप से बड़ी नहीं है। कोर्ट ने कहा कि पीयर रेस्ट्रेंट केवल बाध्यकारी नजीरों के सिद्धांत तक सीमित नहीं है। इसमें बेंचों के बीच न्यायिक शिष्टाचार, आपसी सम्मान और सामंजस्य भी शामिल हैं। कोर्ट के अनुसार, न्यायिक फैसलों में एकरूपता और भरोसा बनाए रखने के लिए ये सिद्धांत जरूरी हैं। अपील में फैसला बदलना, श्रेष्ठता का अधिकार नहीं कोर्ट ने कहा कि अपीलीय डिवीजन बेंच किसी सिंगल जज के फैसले से असहमत हो सकती है। वजह सही हो तो, वह फैसले को रद्द कर सकती है, उसमें बदलाव भी कर सकती है। हालांकि, किसी न्यायिक फैसले को सुधारने की शक्ति से उस जज पर श्रेष्ठता हासिल नहीं होती, जिसने फैसला दिया था। जजों ने समझाया कि सिंगल जज और डिवीजन बेंच, दोनों संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उसी हाईकोर्ट का अधिकार क्षेत्र इस्तेमाल करते हैं। इंट्रा-कोर्ट अपील फैसले की अतिरिक्त न्यायिक जांच का मौका देती है। इससे सिंगल जज अपीलीय बेंच के अधीनस्थ नहीं हो जाता। कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि चीफ जस्टिस का पद भी ‘प्राइमस इंटर पेरेस’ यानी बराबर लोगों में पहला का होता है। मामला को-ऑपरेटिव बैंक के कर्मचारी से जुड़ा तिरुवनंतपुरम सर्विस को-ऑपरेटिव बैंक के एक कर्मचारी पर अनुशासन की कार्रवाई (जैसे सस्पेंशन/जांच) चल रही थी। लेबर कोर्ट ने बैंक को कहा – “ठीक है, तुम्हें कार्रवाई पूरी करने के लिए और ज्यादा समय दे देते हैं। कर्मचारी को ये लगा गलत है, वो हाई कोर्ट चला गया – बोला लेबर कोर्ट ऐसे टाइम कैसे बढ़ा सकता है। मामला पहले सिंगल जज ने सुना, फिर डिवीजन बेंच (2 जज) में गया। पिछली सुनवाई में डिवीजन बेंच ने कहा था – “एक मुद्दे पर दोबारा सोचने के लिए केस वापस सिंगल जज को भेजते हैं।” तब सिंगल जज ने थोड़ा ऐतराज जताया था – “आमतौर पर डिवीजन बेंच ऐसे वापस नहीं भेजती।” लेबर कोर्ट के आदेश पर दोबारा विचार का निर्देश मूल विवाद पर डिवीजन बेंच ने कोर्ट ने माना कि लेबर कोर्ट के पास पावर है कि वो बैंक को टाइम बढ़ाकर दे सकता है। पर इस केस में लेबर कोर्ट ने जल्दबाजी कर दी। उसने देखा ही नहीं कि बैंक ने देरी क्यों की और कर्मचारी ने जो आपत्ति जताई थी उसका क्या हुआ। इसलिए हाई कोर्ट ने लेबर कोर्ट का वो टाइम बढ़ाने वाला आदेश रद्द कर दिया और बोला – “2 महीने के अंदर फिर से ठीक से सुनकर, दोनों पक्षों की बात सुनकर नया आदेश लिखो।”
