दस साल पहले एक पिता ने अपने जवान बेटे को खो दिया था। घर में सन्नाटा था, आंखों में अथाह पीड़ा… लेकिन उसी पल 65 वर्षीय जवाहर डोसी ने ऐसा निर्णय लिया, जिसने न सिर्फ उनके बेटे को अमर कर दिया, बल्कि समाज को भी नई दिशा दे दी। बेटे विश्वास की ब्रेन डेथ के बाद उन्होंने अंगदान का फैसला लिया। यह निर्णय आसान नहीं था। लेकिन डोसी ने सोचा जब दाह संस्कार के बाद देह राख बन जानी है, तो क्यों न उसके अंग किसी और की सांस बन जाएं? उसी दिन से उन्होंने शोक को सेवा में बदल दिया। दरअसल, 2016 में उनके बेटे विश्वास (42) की ब्रेन डेथ हो गई थी। तब इंदौर में अंग दान, ग्रीन कॉरिडोर, ट्रांसप्लांट की शुरुआत हुई ही थी और चार बार ग्रीन कॉरिडोर बन भी चुके थे। डोसी इससे अच्छी तरह से वाकिफ थे और काफी प्रभावित थे। इस दौरान एक ओर जहां बेटे की ब्रेन डेथ का गम था, वहीं उन्होंने तुरंत उसके अंग दान कराने का निर्णय लिया। उन्होंने तब उसकी दोनों किडनियां, लिवर, त्वचा और आंखें डोनेट कराई। यह इंदौर का पांचवां ग्रीन कॉरिडोर बना था जबकि उज्जैन संभाग का पहला अंग दान था। आज, दस वर्ष बाद भी वे टूटे नहीं हैं बल्कि जब भी किसी अस्पताल में ब्रेन डेड की सूचना मिलती है, वे स्वयं पहुंच जाते हैं। परिजनों के पास बैठते हैं, उनके आंसू पोंछते हैं और समझाते हैं आपका अपना वापस नहीं आएगा, लेकिन उसके अंग किसी और के शरीर में धड़क सकते हैं… मौत अंत नहीं, किसी और के लिए शुरुआत भी हो सकती है। अनुपम के परिवार को दी हिम्मत मंगलवार को इंदौर में अनुपम नालमे (शुजालपुर) की ब्रेन डेथ की खबर मिलते ही जवाहर डोसी महिदपुर से इंदौर पहुंचे। दरअसल उनके एक रिश्तेदार ने अनुपम की ब्रेन डेथ के बारे में बताया। यह भी बताया कि नालमे परिवार को यह हिम्मत आप ही से मिल मिली है। डोसी ने नालमे परिवार को अपने बेटे विश्वास की कहानी सुनाई। बताया कि किस तरह अंगदान ने उनके बेटे को अमर कर दिया। यही साहस अनुपम के परिवार को भी मिला। ग्रीन कॉरिडोर बनने से लेकर अंतिम प्रक्रिया तक डोसी पूरे समय परिवार के साथ खड़े रहे। शब्दों से नहीं, कर्म से उदाहरण बने पेशे से पत्रकार (फ्री लॉन्सर) जवाहर डोसी का कहना है कि समाज का सच्चा ठेकेदार वही है, जो शब्दों से नहीं, कर्म से उदाहरण बने। उन्होंने उस सोच को भी बदल दिया कि प्रेरणा सिर्फ बड़े संतों या समाज सुधारकों से मिलती है। उनका मानना है कि अक्सर असाधारण परिवर्तन साधारण समझे जाने वाले लोग ही करते हैं। डोसी कहते हैं डिजिटल इंडिया के इस दौर में भी लोग रक्तदान से डरते हैं, नेत्रदान से हिचकिचाते हैं। मिथकों में जीते हैं कि अगले जन्म में क्या होगा। लेकिन जो अच्छा करना है, वह आज और अभी करना चाहिए। अब तक छह देह दान करवा चुके महिदपुर तहसील में अब तक वे छह देहदान और कई नेत्रदान के लिए प्रेरित कर चुके हैं। स्वयं और उनके परिवार ने भी देहदान के संकल्प पत्र भर रखे हैं। वे अकसर लोगों को याद दिलाते हैं हम धन जोड़ते हैं, ऐश की योजनाएं बनाते हैं, लेकिन अंत में देह तो मिट्टी में मिल जानी है। कोई जलाया जाएगा, कोई दफनाया जाएगा… पर जो अंगदान करता है, वह सच में अमर हो जाता है। महिदपुर जैसी छोटी जगह से उठी यह पहल उज्जैन जिले की पहचान बन गई है। उनका मानना है कि क्या मार सकेगी मौत उसे, औरों के लिए जो जीता है। उनका कहना है कि कि निस्वार्थ कर्म ही सच्ची श्रद्धांजलि है।
