जब वैकल्पिक व्यवस्था तैयार होती है, तो इसी तरह के परिणाम सामने आते हैं। जिसका जो काम है और जो उसके योग्य है, उसे ही वह कार्य सौंपा जाना चाहिए। अधिकारी जो मंदिर की देखरेख करते हैं, उनकी नजर में मंदिर पर्यटन स्थल से ज्यादा कुछ नहीं हैं, इसलिए अब मांग उठ रही है कि सनातन बोर्ड का गठन किया जाए। यह कहना है द्वारका पीठ के शंकाराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती का। उन्होंने अयोध्या के राम मंदिर के दानपात्रों से चढ़ावे की 200 करोड़ की चोरी होने पर भी चिंता जाहिर की है, जिसमें कि नोटों की गिनती से जुड़े करीब 50 कर्मचारी संदेह के घेरे में हैं। उन्होंने कहा आयोध्या में हुई यह घटना आस्था के साथ खिलवाड़ है। परमहंसी गंगा आश्रम जाने से पहले जबलपुर में कुछ देर रुके शंकाराचार्य ने कहा कि यह काम उन लोगों का नहीं है, जो लोग इसे कर रहे थे। हम लोगों को यही तो आपत्ति है कि सनातन धर्मालंबियों के हिंदुओं के जितने भी मंदिर हैं पूरे देश में वो शासनाधीन है, जो अधिकारी हैं, कर्मचारी हैं उनका परिवर्तन होता रहता है, तबादला होता हैं। उनको धार्मिकता का अनुभव नहीं होता है, शास्त्र का ज्ञान नहीं होता है, विधिनिषेध का ज्ञान नहीं होता है, पाप पुण्य का ज्ञान नहीं होता है, ये सब मंदिरों को पर्यटक स्थल के दृष्टिकोण से देखते हैं, जबकि हम लोग वहां जाने वाले सनातन धर्मावलंबी, हिंदू यात्री दर्शन करने के लिए जाते हैं। हमारा दृष्टिकोण तपोभूमि होता है। द्वारका पीठ के शंकाराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती ने कहा कि हमारी यह मान्यता है कि मंदिर और धर्म स्थान, जहां धर्म और ब्रह्म की सत्ता विद्यमान होती है, सकारात्मक ऊर्जा होती है, आध्यात्मिक शक्ति होती है। उसे प्राप्त करने के लिए लोग जाते हैं, अपनी गाढ़ी खून पसीना की कमाई वहां अर्पण करके आते हैं। मंदिर में उसका अच्छा सदुपयोग होना चाहिए, ईमानदार व्यक्तियों की नियुक्ति होनी चाहिए। अयोध्या में जिन्होंने भी यह चोरी जैसा अपराध किया है, उन्हें कठोर दंड दिया जाना चाहिए, ताकि दूसरी बार वहां भी और अन्य दूसरे मंदिरों में इस तरह की प्रवृत्ति न हो और उस पर रोक लगा सके। शंकाराचार्य ने कहा कि देश और विदेश की जनता के बीच यह समाचार अच्छा नहीं है। कल तक राम मंदिर निर्माण के बाद लोगों को जो प्रसन्नता का अनुभव हो रहा था, इस घटना के बाद उस पर चोट लगी है। उन्होंने कहा कि हम लोग चाहते हैं कि सनातन धर्म संरक्षण समिति या सनातन धर्म बोर्ड का निर्माण हो और सारे धार्मिक जितने भी विषय हैं, धार्मिक स्थल हैं, वह सब उन सबको सौंप दिया जाएं, क्योंकि जिन लोगों को जिस विषय का ज्ञान है वही उसे समस्या का हल कर सकते हैं। स्वामी सदानंद सरस्वती ने यह भी कहा कि मंदिर संचालन वो कर सकता है, जिनको अनुभव हो। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार वो लोग इसलिए करते हैं कि पाप-पुन्य का उन्हें भय नहीं है। धर्म-अधर्म का ज्ञान नहीं है। देश की स्वतंत्रता के बाद लोगों ने विचार किया था कि अपनी विचारधारा, संस्कृति, धरोहर, भारतीय शिक्षा पद्धति का पालन कर पाएंगे, पर ऐसा नहीं हो पाया। मंदिरों की जो आवक है उससे गौशाला, पाठशाला, यज्ञशाला, धर्मशाला, औषधालय इन सबका निर्माण होना चाहिए। जहां-जहां मंदिर स्थित है, वहां विकास होना चाहिए। सरकारों को मंदिरों का धन व्यय करने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए। शासन का कर्तव्य है कि प्राचीन धरोहर का संरक्षण करे।
