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इंदौर की 25 हजार इमारतें खतरे में:फायर कंट्रोल के मानक तय करने वाली नगर निगम की बिल्डिंग भी असुरक्षित, बाजार में भी यही हालात

इंदौर में हाल ही में हुए ईवी अग्निकांड ने शहर को झकझोर दिया है। सतर्कता के दावों के बीच प्रशासन एक बार फिर हरकत में आया है। 15 दिन की जांच, बहुमंजिला इमारतों को चेतावनी और फायर कंट्रोल सिस्टम अनिवार्य करने की बातें की गईं, लेकिन ये सब बातें ही हैं, क्योंकि जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। भास्कर की पड़ताल में सामने आया कि जिन इमारतों में यह सिस्टम अनिवार्य है, उनमें से बड़ी संख्या में या तो ये लगा ही नहीं है, या फिर मेंटेनेंस के अभाव में बेकार पड़ा है। चौंकाने वाली बात यह भी है कि जो विभाग शहर की सुरक्षा के मानक तय करता है, उसके अपने भवन में ही फायर कंट्रोल सिस्टम नहीं है। यही नहीं शहर के भीड़भाड़ वाले क्षेत्र के कमर्शियल कॉम्प्लेक्स के हालात भी ऐसे ही हैं। क्या 8 लोगों की मौत से भी जिम्मेदारों ने कोई सबक नहीं लिया? कंट्रोल सिस्टम कैसे लोगों की जिंदगी बचा सकता है? क्यों हादसे के बाद भी अफसरों की सुस्ती कायम है? इस रिपोर्ट में पढ़िए… शहर में 25 हजार से अधिक ऐसी इमारतें हैं, जहां फायर कंट्रोल सिस्टम होना जरूरी है। नई इमारतों में यह कुछ हद तक काम कर रहा है, लेकिन पुरानी बिल्डिंगों में या तो यह लगाया ही नहीं गया, या फिर खराब हालत में है। कई इलाकों में ट्रैफिक इतना अधिक है कि आग लगने की सूचना मिलने के बाद भी फायर ब्रिगेड को मौके तक पहुंचने में लंबा समय लग सकता है। इस दौरान ‘गोल्डन टाइम’ निकल जाता है और नुकसान कई गुना बढ़ जाता है। अब प्रशासन ने 15 दिन का विशेष अभियान चलाने की घोषणा की है, जिसमें जागरूकता के साथ सिस्टम इंस्टॉल कराने पर जोर दिया जाएगा। तीन दृश्यों से समझिए फायर सेफ्टी के हाल… 1. नगर निगम-नियम बनाने वाले ही लापरवाह शहर की इमारतों में फायर सेफ्टी सिस्टम की जांच और एनओसी देने की जिम्मेदारी नगर निगम की है। यहां जब हमारी टीम ने पड़ताल की तो पता चला निगम की अपनी बिल्डिंग में ही यह सिस्टम नहीं है। नई बन रही बिल्डिंग और पुरानी दोनों में फायर हाइड्रेंट सिस्टम नहीं लगाया गया है। यहां रोज सैकड़ों लोगों की आवाजाही होती है, लेकिन आपात स्थिति से निपटने के पर्याप्त साधन नहीं हैं। पुरानी बिल्डिंग में केवल फायर एक्सटिंग्विशर हैं, जो छोटी आग तक ही सीमित हैं। बड़ी आग के लिए जरूरी हाईड्रेंट सिस्टम पूरी तरह नदारद है। 2. नाॅवेल्टी मार्केट-भीड़, तंग गलियां और बड़ा खतरा जेल रोड स्थित नाॅवेल्टी मार्केट, जहां 100 से अधिक दुकानें हैं, आग की दृष्टि से बेहद संवेदनशील है।
यहां तंग गलियां, भारी भीड़ और फायर सिस्टम का अभाव दिखता है। यहां हादसे की स्थिति में बचाव बेहद मुश्किल हो सकता है। ऊपर से मार्केट के पास ही 11 केवी का ट्रांसफार्मर हैं, जिसमें तारों का जाल लटका हुआ है, यह खतरे को और बढ़ा देता है। व्यापारियों के मुताबिक, अलग-अलग मालिकों के कारण सामंजस्य नहीं बन पाता और इसी वजह से फायर सिस्टम नहीं लग पाया। 3. सिल्वर मॉल-सिस्टम है, लेकिन बेकार देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के सामने स्थित सिल्वर मॉल, जो कंप्यूटर मार्केट के रूप में जाना जाता है, वहां भी हालात चिंताजनक हैं। मॉल में लगा फायर एक्सटिंग्विशर 2023 में ही एक्सपायर हो चुका है, लेकिन अब तक इसे बदला नहीं गया। फायर हाइड्रेंट सिस्टम भी यहां लगा है, लेकिन रखरखाव के अभाव में जाम हो चुका है। नियमों के अनुसार, इस सिस्टम को हर 20 दिन में चलाकर जांचना जरूरी होता है, लेकिन यहां ऐसा बिल्कुल नहीं हो रहा। फायर सेफ्टी एक्सपर्ट प्रकाश राजदेव ने 5 प्वाइंट में भास्कर से साझा की गाइडलाइन और कमियां 1. नियम और हाइड्रेंट सिस्टम की अनिवार्यता:
शहरों में अग्नि सुरक्षा के लिए एनबीसी कोड-16 के तहत G+6 या कमर्शियल बिल्डिंग में 12 मीटर और रेसिडेंशियल में 15 मीटर तक फायर हाइड्रेंट सिस्टम अनिवार्य है। इसमें छत पर टंकी, फायर-रेसिस्टेंट पाइपलाइन और हर फ्लोर पर कनेक्शन होता है, ताकि ‘गोल्डन टाइम’ में आग पर काबू पाया जा सके। हर 20 दिन में इसकी जांच जरूरी मानी गई है। 2. फायर एक्ट का अभाव, विशेषज्ञों की कमी:
प्रदेश में अब तक अलग फायर एक्ट लागू नहीं हो पाया है। इसके कारण विभागों में प्रशिक्षित फायर एक्सपर्ट की कमी है और काम केवल एनओसी जारी करने और फायर ब्रिगेड भेजने तक सीमित रह जाता है। 3. पुरानी इमारतें सबसे ज्यादा असुरक्षित:
नई बिल्डिंगों में सिस्टम लग रहा है, लेकिन पुरानी इमारतों में हालात चिंताजनक हैं। 4. गोल्डन टाइम में ही सबसे ज्यादा नुकसान:
फायर ब्रिगेड को मौके पर पहुंचने में 15-20 मिनट लग जाते हैं। यही वह समय होता है जब आग सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा चुकी होती है। ऐसे में हाइड्रेंट सिस्टम का तुरंत चालू होना बेहद जरूरी है। 5. एनओसी प्रक्रिया और तकनीकी खामियां: एनओसी की प्रक्रिया जटिल और धीमी है। निरीक्षण में देरी आम बात है और सिविल अफसर ही तकनीकी निर्णय ले रहे हैं, जबकि इसके विशेषज्ञ अलग होने चाहिए। निजी कंसल्टेंट या विशेषज्ञों की नियुक्ति भी अब जरूरी हो गई है। घटनाक्रम से जुड़ी ये खबरें भी पढ़ें… DVR जला, सबूत अधूरे…घर की बिजली ओवरलोड:कम्बाइंड रिपोर्ट का इंतजार; बिजली कंपनी का दावा-सुबह 4 बजे लगी आग बिजली कंपनी का दावा…ओवरचार्जिंग से बैटरी बम की तरह फटी:इंदौर में ईवी चार्जिंग से ही लगी थी आग बेटे का दावा-EV से नहीं इलेक्ट्रिक पोल से निकली चिंगारी, बिजली बंद किए बिना पानी डाला; यही मौतों की वजह इंदौर EV हादसा…4 महीने की गर्भवती थी बड़ी बहू:दुआओं से कोख में पल रही जिंदगी भी बुझी; खुशियों वाला घर 8 मौतों से मातम से भरा

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