राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन यानी एनएचएम ने एमपी के सरकारी अस्पतालों में पैथोलॉजी जांच के लिए जिस कंपनी को ठेका दिया है उसके जांच रेट को लेकर सवाल उठ रहे हैं। यह टेंडर भोपाल स्थित साइंस हाउस मेडिकल्स प्राइवेट लिमिटेड कंपनी को मिला है, जिसने सेंट्रल गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम (CGHS) की दरों से 81.2% कम पर जांच करने की बोली लगाई है। इसका सीधा मतलब है कि जिस जांच के लिए सरकार खुद 100 रुपए की दर तय करती है, वही जांच अब मात्र 18 रुपए 20 पैसे में की जाएगी। पैथोलॉजिस्ट और हेल्थ एक्सपर्ट का तर्क है कि इतनी कम कीमत पर गुणवत्तापूर्ण जांच संभव ही नहीं है। इससे प्रदेश की जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ की संभावना है। वहीं, कंपनी और NHM के अधिकारी अपने-अपने तर्कों से इस फैसले को सही ठहरा रहे हैं। पढ़िए रिपोर्ट… कैसे मिला कंपनी को 180 करोड़ का टेंडर?
मध्य प्रदेश सरकार ने 2020 में सरकारी अस्पतालों की पैथोलॉजी जांचें निजी हाथों में देने की शुरुआत की थी। पिछले छह साल से यह काम साइंस हाउस मेडिकल्स प्राइवेट लिमिटेड के पास ही था। पुराने टेंडर की अवधि खत्म होने पर NHM ने 12 फरवरी 2026 को नए सिरे से टेंडर जारी किए। यह टेंडर ‘हब एंड स्कोप’ मॉडल पर आधारित था, जिसमें जिले के प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों से सैंपल इकट्ठा कर जांच के लिए जिला स्तर पर स्थापित कंपनी की सेंट्रलाइज्ड लैब में भेजा जाता है। टेंडर के लिए CGHS की दरों को आधार बनाया गया और शर्त यह थी कि जो भी कंपनी इन दरों पर सबसे ज्यादा छूट देगी, उसे ही यह 5 साल का ठेका मिलेगा। 9 मार्च 2026 को जब टेंडर खुले, तो साइंस हाउस ने 81.20% की छूट देकर बाकी कंपनियों को पीछे छोड़ दिया और करीब 36 करोड़ रुपए सालाना, यानी 5 साल के लिए 180 करोड़ रुपए का यह टेंडर हासिल कर लिया। गुणवत्ता को लेकर क्यों उठ रहे हैं गंभीर सवाल?
प्रदेश के स्वास्थ्य विशेषज्ञ और पैथोलॉजिस्ट इस टेंडर को अव्यावहारिक और जनता के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक मान रहे हैं। पूर्व स्वास्थ्य अधिकारी और पैथोलॉजिस्ट डॉ. पद्माकर त्रिपाठी कहते हैं, सीजीएचएस के जिस रेट को आधार बनाया गया है, वह पहले से ही बाजार दर से दो से तीन गुना कम है। केंद्र सरकार की दरें इतनी प्रतिस्पर्धी होती हैं कि निजी अस्पताल भी मुश्किल से उन पर काम कर पाते हैं। अब कोई कंपनी उस दर से भी 81% कम पर काम करने का दावा करे, तो यह सीधे तौर पर फर्जीवाड़े को निमंत्रण देना है। उन्होंने लागत का गणित समझाते हुए कहा, मैं खुद एक पैथोलॉजिस्ट हूं और जानता हूं कि इस रेट पर जांच की लागत भी नहीं निकल सकती। लागत नहीं निकलेगी तो जांच कैसे होगी? डॉ त्रिपाठी एक उदाहरण देते हुए कहते हैं कि कम्प्लीट ब्लड काउंट (CBC) की जांच बाजार में 300-400 रुपए में होती है। CGHS का रेट 270 रुपए है। अब अगर कंपनी 81.2% की छूट देगी, तो यह जांच मात्र 50.76 रुपए में होगी। जबकि इस जांच में लगने वाले रिएजेंट की कीमत ही लगभग 70 रुपए आती है। बल्क में खरीदने पर भी यह लागत बहुत कम नहीं होती। इसके अलावा लाखों की मशीनें, उनका मेंटेनेंस, बिजली, स्टाफ का वेतन और अन्य खर्चे भी हैं। यह असंभव है। डॉ. त्रिपाठी कहते हैं कि जब लागत ही नहीं निकलेगी तो या तो जांच की नहीं जाएगी या फिर फर्जी रिपोर्ट दी जाएगी। हमने अपने कार्यकाल में ऐसे कई मामले देखे हैं। एक बार एक मरीज की जॉन्डिस की रिपोर्ट नेगेटिव आई, जबकि वह पॉजिटिव था। कंपनी के सीईओ बोले- सोच समझकर डिस्काउंट दिया
कंपनी के सीईओ पुनीत दुबे कहते हैं कि हमने जो डिस्काउंट दिया है, वह बहुत सोच-समझकर और पूरे कैलकुलेशन के साथ दिया है। पिछले 10 वर्षों में भारत के डायग्नोस्टिक्स बाजार में बहुत विकास हुआ है। पहले हम विकसित देशों पर निर्भर थे, लेकिन अब उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद और रिएजेंट भारत में ही कम कीमतों पर उपलब्ध हैं। NHM का तर्क- इससे तो जनता का भला होगा
NHM की एमडी डॉ. सलोनी सडाना ने कहा कि टेंडर प्रक्रिया पूरी तरह से नियमों के अनुसार हुई है। उन्होंने कहा, हमने CGHS की वर्तमान दरों को बेस रेट रखा था। पात्रता की शर्त यही थी कि जो इस रेट पर सबसे ज्यादा डिस्काउंट देगा, उसे टेंडर मिलेगा। साइंस हाउस L1 रहा, इसलिए हमने उन्हें लेटर ऑफ इंटेंट (LoI) जारी कर दिया है और जल्द ही एमओयू साइन किया जाएगा। जब उनसे पूछा गया कि पिछली बार यही टेंडर मात्र 30% की छूट पर गया था, तो इस बार 81% की छूट संदेहास्पद नहीं है? इस पर उन्होंने कहा, तकनीकी बिड में छह कंपनियां चयनित हुई थीं और सभी ने 60% से ज्यादा की छूट दी है। साइंस हाउस पर पड़ चुका इनकम टैक्स का छापा
सितंबर 2025 में आयकर विभाग ने कंपनी के मालिक जितेंद्र तिवारी, शैलेंद्र तिवारी और उनके सहयोगियों के भोपाल, इंदौर और मुंबई स्थित 30 से ज्यादा ठिकानों पर छापे मारे थे। इस कार्रवाई में टैक्स चोरी और हवाला कनेक्शन के सबूत मिलने की बात सामने आई थी। कंपनी को 943 करोड़ के भुगतान पर भी सवाल
कांग्रेस विधायक जयवर्धन सिंह ने पहले भी कंपनी पर आरोप लगाए थे कि कंपनी ने मिलीभगत कर गैर-जरूरी जांचें कीं और प्रदेश की 7.5 करोड़ की आबादी पर 12.84 करोड़ जांचें कर डालीं, जिसके बदले में कंपनी को 943 करोड़ का भुगतान किया गया। हालांकि, कंपनी इन आंकड़ों को गलत बताती है और उसका कहना है कि उसने 1.5 करोड़ लोगों की 4.5 करोड़ जांचें की हैं।
