सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि गिरफ्तार व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की 24 घंटे की समयसीमा हिरासत लेते ही शुरू होगी। यह समयसीमा औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज होने के समय से नहीं गिनी जाएगी। 24 घंटे से ज्यादा हिरासत में रखने पर व्यक्ति को तुरंत रिहा करना होगा। जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंद्रकुर की बेंच ने कहा कि जांच एजेंसी हिरासत में लेने और औपचारिक गिरफ्तारी के बीच का समय अलग नहीं मान सकती। मजिस्ट्रेट की अदालत तक पहुंचने में लगने वाला जरूरी यात्रा समय ही इस अवधि से अलग रखा जाएगा। क्या था पूरा मामला? यह मामला ‘सुजीत दास बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ से जुड़ा है। इसमें ड्रग तस्करी के आरोपियों को 29 सितंबर 2025 को दोपहर 2 बजे हिरासत में लिया गया था, लेकिन उनकी औपचारिक गिरफ्तारी अगले दिन 30 सितंबर को दिखाई गई। जांच एजेंसी का कहना था कि 24 घंटे की समयसीमा औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज होने के बाद शुरू होगी। वहीं, आरोपियों ने इसे संविधान के अनुच्छेद 22(2) का उल्लंघन बताया। सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों की दलील सही मानी। कोर्ट के मुताबिक, उन्हें 30 सितंबर को दोपहर 2 बजे तक मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना चाहिए था, लेकिन पुलिस ने उन्हें शाम 4:45 बजे पेश किया। यानी तय समय से 2 घंटे 45 मिनट की देरी हुई। कोर्ट ने इस देरी को असंवैधानिक मानते हुए आरोपियों को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया। साथ ही, जमानत देने से इनकार करने वाले त्रिपुरा हाईकोर्ट के आदेश को भी रद्द कर दिया। मामले में आरोपियों को हिरासत में लेने और औपचारिक गिरफ्तारी दिखाने के बीच करीब 18 घंटे का अंतर था। जांच एजेंसी इस देरी का कोई उचित कारण भी नहीं बता सकी। हिरासत या गिरफ्तारी में आपके अधिकार क्या हैं? 24 घंटे का नियम: अनुच्छेद 22 के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना जरूरी है। गिरफ्तारी का कारण जानने का हक: सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में कहा है कि गिरफ्तारी के आधार लिखित में देने होंगे। रिपोर्ट के मुताबिक कोर्ट ने पिछले महीने कहा कि अनुच्छेद 22 के सुरक्षा उपायों का उल्लंघन करने वाली गिरफ्तारी असंवैधानिक होगी। वकील का अधिकार: अपनी पसंद के वकील से मिलने और उसकी मदद लेने का हक है। वकील का खर्च न उठा सकें, तो मुफ्त कानूनी सहायता मिलती है। BNSS की धारा 38 में पूछताछ के दौरान वकील से मिलने की बात है, लेकिन पूरी पूछताछ के दौरान साथ रहने की नहीं। महिलाओं के लिए खास प्रावधान: BNSS की धारा 43(5) के मुताबिक महिला को सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। अपवाद में इसके लिए न्यायिक मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति चाहिए। डीके बसु गाइडलाइंस (1997): ये गिरफ्तारी या हिरासत दोनों पर लागू हैं। पुलिसकर्मी का नेम टैग साफ दिखना चाहिए। एक गवाह की मौजूदगी में अरेस्ट मेमो बनना चाहिए। चोटें दर्ज होनी चाहिए और परिवार को सूचना दी जानी चाहिए। कोर्ट ने कहा था कि ये सिर्फ सुझाव नहीं हैं। पालन न करने पर विभागीय कार्रवाई या अवमानना का मामला भी बन सकता है।
