दसवीं कक्षा अच्छे नंबरों से परीक्षा पास की, इसी दौरान शादी कर दी गई। ससुराल में आगे पढ़ने की इजाजत नहीं मिली। परिवार के फैसले के खिलाफ खड़ी हुईं, पति से रिश्ता तोड़ा और अपनी पढ़ाई पूरी कर सरकारी नौकरी हासिल की। जिंदगी के संघर्षों से लड़कर खुद को आत्मनिर्भर बनाने वाली खंडवा की 49 वर्षीय कृष्णा घड़िए ने अब तीनों अनाथ सगे भाइयों को एक साथ गोद लेकर उनकी जिंदगी संवारने का संकल्प लिया है। जनजातीय कार्य विभाग में हॉस्टल अधीक्षिका के पद पर पदस्थ कृष्णा अब तीन सगे भाइयों की मां बन गई हैं। इसी कहानी के साथ एमपी में पहली बार किसी सिंगल मदर ने एक साथ तीन सिबलिंग बच्चों को गोद लेने का यह मामला सामने आया है। तीनों बच्चों ने कोविड के दौरान अपने माता-पिता को खो दिया था। इसके बाद वे यूपी की एक संस्था में रह रहे थे। करीब डेढ़ साल तक चली दत्तक ग्रहण की कानूनी प्रक्रिया बुधवार शाम पूरी हुई। सहज समागम फाउंडेशन की संचालक दीपमाला विधानी के मुताबिक, CARA (केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण) के नियमों के तहत तीनों बच्चों को हॉस्टल अधीक्षिका कृष्णा ने अपना लिया। सरकार ने तीन बच्चों का विकल्प दिया
कृष्णा घड़िए ने बताया कि दुनिया में उनका अपना कोई नहीं है। लंबे समय से उनके मन में बच्चा गोद लेकर परिवार बसाने की इच्छा थी। इसके लिए उन्होंने सरकार के CARA पोर्टल पर आवेदन किया था। दत्तक ग्रहण की प्रक्रिया के दौरान उन्हें तीन बच्चों का विकल्प मिला। ये तीनों सगे भाई थे और इन्हें एक साथ गोद लेने वाला परिवार नहीं मिल रहा था। कृष्णा ने कहा कि जब सरकार की ओर से तीनों बच्चों को अपनाने का विकल्प मिला तो उन्होंने तीनों को एक साथ परिवार देने का फैसला किया। ऐसे हजारों बच्चे अभी भी परिवार मिलने के इंतजार में हैं। इन बच्चों को भी मां और घर मिलना चाहिए। इसलिए उन्होंने तीनों को गोद लेने की सहमति दे दी। उनके मुताबिक, करीब डेढ़ साल की प्रक्रिया के बाद बुधवार शाम तीनों बच्चों का दत्तक ग्रहण पूरा हो गया। तीनों ने कोविड में माता-पिता को खो दिया था
तीनों बच्चों के माता-पिता की कोविड के दौरान मौत हो गई थी। माता-पिता के जाने के बाद उनके सामने पालन-पोषण और भविष्य का संकट खड़ा हो गया। ऐसे में उत्तर प्रदेश की एक संस्था ने तीनों को संरक्षण दिया। वहां वे करीब दो से तीन साल तक रहे। CARA की प्रक्रिया के तहत तीनों बच्चों को एक ही परिवार में गोद दिए जाने का विकल्प सामने आया और खंडवा की कृष्णा घड़िए ने उन्हें अपनाने का निर्णय लिया। बोलीं- तीनों को अच्छी शिक्षा दिलाऊंगी
कृष्णा का कहना है कि उन्होंने तीनों बच्चों को गोद लेने का फैसला भावनात्मक रूप से ही नहीं, बल्कि उनकी पूरी जिंदगी की जिम्मेदारी समझकर लिया है। उनके मुताबिक, तीन बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए उनके पास पर्याप्त संपत्ति है। तीनों के हिसाब से मकान और प्लॉट पहले से हैं। उन्होंने बच्चों की शिक्षा और भविष्य के लिए भी तैयारी कर रखी है। कृष्णा ने कहा कि तीनों को अच्छी शिक्षा दिलाऊंगी, खूब पढ़ाऊंगी। वे अपनी पसंद और योग्यता के मुताबिक आगे बढ़ेंगे। यदि पढ़ाई पूरी करने के बाद किसी की सरकारी या निजी नौकरी नहीं लगती है तो उसे अपना व्यवसाय शुरू करवाऊंगी। इसके लिए जमीन भी खरीदकर रखी है। उनका कहना है कि बच्चों को किसी तरह की कमी महसूस नहीं होने देंगी। 10वीं में शादी हुई, पढ़ाई के लिए परिवार के खिलाफ गईं
कृष्णा की अपनी जिंदगी भी संघर्षों से भरी रही है। उन्होंने बताया कि जब वे दसवीं कक्षा में थीं, तभी परिवार ने उनकी शादी कर दी थी। शादी के बाद जब परीक्षा का रिजल्ट आया तो वे अच्छे अंकों से पास हुईं। वे आगे पढ़ना चाहती थीं, लेकिन ससुराल पक्ष ने पढ़ाई जारी रखने की अनुमति नहीं दी। कृष्णा ने बताया कि पढ़ाई छोड़ने के बजाय उन्होंने परिवार के फैसले के खिलाफ जाने का साहस किया। पति से तलाक लिया और अपनी शिक्षा पूरी करने का निर्णय किया। इसके बाद बारहवीं की पढ़ाई की और फिर ग्रेजुएशन तथा पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा किया। लगातार मेहनत के बाद सरकारी नौकरी हासिल की। वे पिछले 26 साल से नौकरी कर रही हैं और वर्तमान में जनजातीय कार्य विभाग के अंतर्गत खालवा क्षेत्र में हॉस्टल अधीक्षिका के पद पर पदस्थ हैं। 50-60 बच्चों की जिम्मेदारी संभालने का भी अनुभव
कृष्णा पिछले कई वर्षों से हॉस्टल में रहने वाले करीब 50 से 60 बच्चों के रहने, देखभाल और शिक्षा से जुड़ी जिम्मेदारियां भी संभालती रही हैं। दूसरों के बच्चों की परवरिश और उनके भविष्य को संवारने के अनुभव के बीच उनके मन में अपना परिवार बनाने की इच्छा भी बनी रही। अब तीन बच्चों को गोद लेकर उन्होंने इस इच्छा को एक नई जिम्मेदारी में बदल दिया है।
