रतलाम जिले का कछालिया गांव अपनी अनूठी परंपरा के लिए जाना जाता है। गांव में 300 से अधिक पक्के और आधुनिक घर हैं, लेकिन किसी भी घर की दीवार पर रंग नहीं किया गया है। ग्रामीण काले रंग के कपड़े-जूते नहीं पहनते और भूरे जूते भी बिना मोजे के पहनते हैं। उनके अनुसार यह परंपरा बाबा कालेश्वर से जुड़ी मान्यताओं पर आधारित है। ग्रामीणों का विश्वास है कि घरों पर रंग-रोगन कराने से अनहोनी हो सकती है। इसी कारण करीब 700 वर्षों से लोग मकानों पर पुताई नहीं कराते। दिवाली के मौके पर भी ग्रामीण बिना रंग रोगन के मकानों पर सजावट करते हैं। गांव में प्रवेश करते ही दिखती है अलग पहचान
आलोट-जावरा हाईवे से करीब ढाई किलोमीटर अंदर स्थित कछालिया गांव में दाखिल होते ही सभी घर बिना रंग के दिखाई देते हैं। गांव में कई आधुनिक और बहुमंजिला मकान हैं, जिन पर लाखों रुपये खर्च किए गए हैं, लेकिन उनकी दीवारों पर रंग नहीं किया गया है। ग्रामीण बद्रीलाल धाकड़ बताते हैं कि गांव में न केवल घरों पर पुताई नहीं की जाती, बल्कि लोग पानी छानकर पीने से भी बचते हैं। उनके अनुसार यह परंपरा करीब 700 वर्षों से चली आ रही है और बाबा कालेश्वर से जुड़ी मान्यताओं पर आधारित है। सरकारी आवासों पर भी नहीं हुआ रंग-रोगन
प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत गांव में करीब 100 मकान बने, लेकिन ग्रामीणों ने उन पर भी रंग नहीं कराया। सरपंच प्रतिनिधि जगदीश पुरी गोस्वामी के अनुसार, गांव में सरकारी और निजी दोनों तरह के मकानों पर यह परंपरा समान रूप से लागू होती है। इसी बात पर एक ग्रामीण मुस्कुराते हुए कहता है, “सरकार हमें सिर छुपाने के लिए घर तो दे सकती है, लेकिन हमारे गांव की सदियों पुरानी परंपरा को नहीं बदल सकती।” काले रंग से परहेज की परंपरा
गांव में काले कपड़े, विशेषकर काले जूते और मोजे पहनने से कई लोग परहेज करते हैं। ग्रामीण बापूपुरी गोस्वामी के अनुसार काले जूते और मोजे पहनना अशुभ माना जाता है। बुजुर्गों के अनुसार पहले इस नियम का कड़ाई से पालन होता था। अब युवाओं में कुछ बदलाव दिखता है, लेकिन अधिकांश परिवार आज भी इसे मानते हैं। बाबा कालेश्वर से जुड़ी लोककथा
लोककथाओं के अनुसार, बाबा कालेश्वर के अनादर के बाद यह मान्यता बनी कि घरों पर रंग-रोगन कराने से परिवार पर संकट आ सकता है। समय के साथ इस लोककथा के कई रूप प्रचलित हुए, लेकिन सभी में घरों को बिना रंग रखने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। गांव की बुजुर्ग महिलाएं भी इसे पूर्वजों से चली आ रही मान्यता बताती हैं। ग्रामीणों का मानना है कि बाबा कालेश्वर उनकी मनोकामनाएं पूरी करते हैं, इसलिए वे इन परंपराओं का पालन करते हैं। गांव में आधुनिक सुविधाएं, स्मार्टफोन और शिक्षित युवा मौजूद हैं। युवाओं का भी कहना है कि हम पढ़े-लिखे जरूर हैं, लेकिन पूरे गांव के विश्वास के खिलाफ जाकर कोई ऐसा प्रयोग नहीं करना चाहते जिससे किसी का दिल दुखे या कोई अनहोनी हो।” परंपरा तोड़ने से जुड़ी स्थानीय कहानियां
ग्रामीणों के बीच ऐसी कई घटनाओं की चर्चा होती है, जिन्हें वे परंपरा तोड़ने के परिणाम से जोड़ते हैं। एक ग्रामीण के अनुसार, सालों पहले एक परिवार ने अपने घर के सामने वाले हिस्से पर रंग करवा लिया था। इसके कुछ समय बाद उस परिवार के छोटे बेटे की पानी में डूबने से मौत हो गई। बताया जाता है कि जहां हादसा हुआ, वहां पानी बहुत कम था, फिर भी बच्चे की जान नहीं बच सकी। इसी तरह एक अन्य परिवार ने घर की पुताई करवाई थी, जिसके बाद वे भारी आर्थिक नुकसान के शिकार हो गए। हालांकि इन दावों की कोई वैज्ञानिक या आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है। सामाजिक सहमति की भी भूमिका
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी परंपराएं केवल धार्मिक विश्वास से नहीं, बल्कि सामाजिक सहमति और सामुदायिक दबाव से भी लंबे समय तक बनी रहती हैं। यदि कोई व्यक्ति अपने घर पर रंग करवाने का फैसला कर ले, तो उसे केवल व्यक्तिगत डर ही नहीं, बल्कि समाज के विरोध और अलगाव का भी सामना करना पड़ सकता है। यही कारण है कि लोग अलग राय रखने के बावजूद सामूहिक रूप से इस परंपरा का हिस्सा बने रहते हैं।
