आमतौर पर भरोसे और तेजी के लिए पहचानी जाने वाली स्पीड पोस्ट सेवा इस बार खुद ही सवालों के घेरे में आ गई। एक साधारण सा पार्सल, जिसमें घर का स्नेह और स्वाद दोनों शामिल थे, समय पर नहीं पहुंचा तो मामला उपभोक्ता आयोग तक जा पहुंचा। आयोग ने हाल ही में इसे गंभीर लापरवाही मानते हुए डाक विभाग को फटकार लगाई और मुआवजा देने का आदेश सुनाया। यह फैसला बेंच क्रमांक-1 (जिला उपभोक्ता आयोग, भोपाल के अध्यक्ष योगेश दत्त शुक्ला और सदस्य डॉ. प्रतिभा पांडेय ने सुनाया है। घर का स्वाद और श्रद्धा भेजी थी पार्सल में
भोपाल की ज्योति शर्मा ने 12 जनवरी 2026 को स्पीड पोस्ट के जरिए एक पार्सल भेजा था। इस पार्सल में धार्मिक पुस्तक (श्रीमद्भगवद्गीता), शुद्ध घी से बनी मिठाइयां और कपड़े रखे गए थे। यह पार्सल भोपाल के अरेरा हिल्स उप डाकघर से बुक किया था और इसे सुरक्षित व जल्द पहुंचाने के लिए उन्होंने 1228 रुपए का शुल्क भी चुकाया। एक पार्सल 3 दिन में, दूसरा 7 दिन में, यहीं से शुरू हुआ विवाद दिलचस्प बात यह है कि ज्योति शर्मा ने उसी दिन एक और स्पीड पोस्ट भेजा था, जो महज 3 दिन में 15 जनवरी को अपने गंतव्य तक पहुंच गया। लेकिन, दूसरा पार्सल 19 जनवरी को पहुंचा, यानी पूरे 7 दिन की देरी के साथ। यही देरी आगे चलकर कानूनी लड़ाई की वजह बनी। कहां भेजा गया था पार्सल? दस्तावेजों के अनुसार पार्सल भोपाल से ही एक अन्य स्थान स्थानीय पर भेजा गया था, जहां सामान्यतः स्पीड पोस्ट 2-3 दिनों में पहुंच जाती है। यानी दूरी कोई बड़ी बाधा नहीं थी, फिर भी देरी होना विभागीय लापरवाही की ओर इशारा करता है। डाक विभाग नहीं दे पाया देरी का कारण मामले की सुनवाई के दौरान डाक विभाग यह स्पष्ट नहीं कर सका कि आखिर पार्सल पहुंचाने में 7 दिन क्यों लग गए। आयोग ने कहा कि सिर्फ “डिलीवर हो गया” कहना पर्याप्त नहीं है, जब तक देरी का ठोस कारण न बताया जाए। आयोग की सख्त टिप्पणी, प्रीमियम सेवा में लापरवाही बर्दाश्त नहीं उपभोक्ता आयोग ने अपने फैसले में कहा कि जब उपभोक्ता अतिरिक्त शुल्क देकर स्पीड पोस्ट जैसी प्रीमियम सेवा चुनता है, तो समयबद्ध डिलीवरी उसकी अपेक्षा ही नहीं, अधिकार भी है। बिना किसी उचित कारण के देरी करना सीधे-सीधे ‘सेवा में कमी’ की श्रेणी में आता है। डाक विभाग को देना होगा 8 हजार रुपए
