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शादीशुदा होकर लिव-इन में गए तो 5 साल की जेल:सीएम ने क्यों कहा- राम एक शादी करेगा तो रहीम चार क्यों’; MP में UCC से क्या बदलेगा?

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने शुक्रवार को कटनी में कहा- अगर राम एक शादी करेगा तो रहीम दो या चार शादियां क्यों करेगा? मध्य प्रदेश में वही रह पाएगा, जो एक ही शादी करेगा। रविवार को भोपाल के जगदीशपुर में हुई कैबिनेट बैठक में मध्यप्रदेश समान नागरिक संहिता-2026 को मंजूरी मिल गई। अब इसे 20 जुलाई से शुरू हो रहे विधानसभा के मानसून सत्र में विधेयक के रूप में पेश किया जाएगा। तो क्या UCC किसी एक धर्म के खिलाफ है और क्या लिव-इन पार्टनर्स को भी अलग करना चाहती है सरकार; समझेंगे आज के एमपी एक्सप्लेनर में… सवाल 1: UCC का एमपी मॉडल क्या उत्तराखंड से ज्यादा सख्त है? जवाब: मध्य प्रदेश का ड्राफ्ट काफी हद तक उत्तराखंड मॉडल पर ही आधारित है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि उत्तराखंड का UCC ड्राफ्ट भी सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई ने ही तैयार किया था और मध्य प्रदेश की समिति की अध्यक्ष भी वही हैं। हालांकि, मध्य प्रदेश के ड्राफ्ट में कुछ बदलाव किए गए हैं… सवाल 2: ‘राम एक शादी करेगा तो रहीम चार क्यों’ सीएम के बयान के क्या मायने हैं? जवाबः मुख्यमंत्री के इस बयान का मतलब बहुविवाह खत्म करना है। सवाल 3: क्या लिव-इन में रहने पर पुलिस सीधे गिरफ्तार कर लेगी? जवाबः अगर आप सामान्य और अविवाहित लिव-इन कपल हैं तो जवाब है- नहीं। पुलिस यूं ही गिरफ्तार नहीं करेगी। प्रस्ताव के मुताबिक, हर लिव-इन कपल को रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य होगा। इसके 5 अहम पहलू हैं 1. पेरेंट्स और पुलिस को सूचना: रजिस्ट्रेशन होते ही इलाके के थाने और कपल के माता-पिता को इसकी आधिकारिक सूचना भेजी जाएगी। 2. पड़ोसी भी कर सकेंगे शिकायत: बिना रजिस्ट्रेशन लिव-इन में रहने पर पड़ोसी, स्थानीय लोग या किराए के मकान के मालिक भी पुलिस से इसकी शिकायत कर सकते हैं। 3. बिना बताए रहने पर 3 महीने की जेल: रजिस्ट्रेशन न कराने या अपनी गलत पहचान बताने पर 3 महीने तक की जेल हो सकती है। उत्तराखंड में भी बिल्कुल यही नियम है। ब्रेकअप होने की स्थिति में रजिस्ट्रेशन कैंसिल कराना भी उतना ही जरूरी होगा। 4. शादीशुदा होने पर 5 साल की जेल: अगर कोई व्यक्ति पहले से शादीशुदा है और वह लिव-इन रिलेशनशिप में जाता है, तो 5 साल तक की सजा का प्रावधान रखा गया है। सरकार ने इसे कठोरता से लागू करने की बात कही है। 5. मेंटेनेंस देना होगा: पुरुष अगर अपनी लिव-इन पार्टनर को छोड़कर जाता है, तो उसे महिला को भरण-पोषण देना पड़ सकता है। सवाल 4: लिव-इन कपल अगर अलग हो जाएं, तो उनसे पैदा हुए बच्चों का क्या होगा? जवाबः अभी तक लिव-इन से जन्मी संतानों को अपने जन्म देने वाले माता-पिता की संपत्ति में हक पाने के लिए अक्सर कोर्ट में लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती थी, खासकर तब जब कपल में अनबन हो जाए। सूत्रों के मुताबिक, इसे सिर्फ संपत्ति के अधिकार तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि बच्चे की पूरी कानूनी पहचान को सुरक्षित करने का प्रस्ताव है। इसमें 3 प्रावधान हो सकते हैं…. 1. माता-पिता की पहचान कानूनी तौर पर मिलेगी: अभी तक कानूनी उलझनों में बच्चों को अक्सर समाज में अवैध या नाजायज मान लिया जाता था। लेकिन UCC लागू होने के बाद, रजिस्टर्ड लिव-इन से पैदा हुए बच्चे कानूनी रूप से पूरी तरह वैध माने जाएंगे। कानून की नजर में उनका दर्जा शादीशुदा जोड़े के बच्चे जैसा ही होगा। साथ ही उन्हें माता-पिता का नाम और पहचान भी कानूनी तौर पर मिलेगी। 2. संपत्ति में जन्म से हक: बच्चों को अपने माता और पिता, दोनों की पैतृक और खुद कमाई हुई संपत्ति में जन्म से ही बराबर अधिकार मिलेगा। इसके लिए उन्हें खुद को संतान साबित करने या कोर्ट के चक्कर काटने की जरूरत नहीं पड़ेगी। 3. ब्रेकअप के बाद जिम्मेदारी: लिव-इन कपल के अलग होने पर महिला को भरण-पोषण यानी आर्थिक सहारा मिलने का प्रावधान प्रस्ताव में शामिल है। चूंकि बच्चे को अब कानूनन वैध माना जाएगा, इसलिए तार्किक तौर पर उसकी कस्टडी, शिक्षा और भरण-पोषण के भी वही नियम लागू होने की उम्मीद है, जो शादीशुदा जोड़ों के बच्चों पर लागू होते हैं। हालांकि, ड्राफ्ट बिल विधानसभा में पेश होने के बाद ही इन प्रावधानों की आधिकारिक तस्वीर साफ हो सकेगी। सवाल 5: क्या UCC लागू होने से सात फेरे या निकाह जैसी परंपराएं खत्म हो जाएंगी? जवाबः ऐसा नहीं है। सवाल 6: संपत्ति पर किसका-कितना हक होगा, क्या यह बदल सकता है? जवाबः प्रदेश के UCC ड्राफ्ट में कमेटी ने दो बदलावों का प्रस्ताव रखा है… 1. पिता को बराबर हक: मौजूदा व्यवस्था में उत्तराधिकार के नियम अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के तहत तय होते हैं। प्रस्तावित ड्राफ्ट में ‘मां’ की जगह ‘माता-पिता’ शब्द इस्तेमाल करने की सिफारिश की गई है। इसका मकसद यह है कि मां के न होने की स्थिति में भी पिता का उत्तराधिकार का अधिकार बना रहे। 2. बेटियों को बेटों के बराबर हक: हिंदू बेटियों को पैतृक संपत्ति में बेटों के बराबर अधिकार 2005 से मिल चुका है। प्रस्तावित UCC के तहत इसी तरह के समान उत्तराधिकार सभी समुदायों की बेटियों को देने की व्यवस्था की गई है, ताकि धर्म के आधार पर अलग-अलग नियम न रहें। सवाल 7: किन समुदायों को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है और क्यों? जवाबः कमेटी ने अनुसूचित जनजातियों (ST) के साथ-साथ घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदायों को UCC के दायरे से बाहर रखने की सिफारिश की है। सवाल 8: क्या UCC किसी धर्म के खिलाफ है? जवाबः नहीं, UCC किसी भी धर्म के खिलाफ नहीं है। मध्य प्रदेश में UCC का मसौदा तैयार करने से पहले राज्य स्तरीय समिति ने आम लोगों से सुझाव मांगे थे। समिति के मुताबिक, उसे करीब साढ़े नौ लाख सुझाव मिले। एमपी एक्सप्लेनर की यह खबर भी पढ़ें… क्या नरोत्तम के आंसू हार की वजह बनेंगे 15 साल दतिया के विधायक रहे नरोत्तम मिश्रा टिकट कटने के बाद मंच पर भावुक नजर आए। इसके बाद गुरुवार को आशुतोष तिवारी की मौजूदगी में अपने कार्यकर्ताओं से कहा- लोग कहने लगे हैं कि आशुतोष ने टिकट काट दिया। उसकी क्षमता है टिकट काटने की? टिकट काटने वाले कोई और हैं। पढ़ें पूरी खबर…

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