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मुस्लिम पक्ष ने कहा- सर्वे प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं थी:कार्बन डेंटिंग नहीं हुई, रिपोर्ट अधूरी, भोजशाला मामले में सर्वे तकनीक और प्रक्रिया पर आपत्ति

इंदौर में सोमवार को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच में चर्चित भोजशाला प्रकरण की सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष की ओर से सीनियर एडवोकेट शोभा मेनन और सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट सलमान खुर्शीद ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पक्ष रखा, जबकि एडवोकेट तौसिफ वारसी कोर्ट में उपस्थित रहे। सुनवाई के दौरान मुख्य रूप से राज्य सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा प्रस्तुत तर्कों और सर्वे रिपोर्ट का विरोध किया गया। वर्ष 2022 में रंजना अग्निहोत्री और उनके साथियों ने भोजशाला का धार्मिक स्वरूप तय करने तथा हिंदू समाज को पूर्ण अधिकार दिए जाने की मांग को लेकर याचिका दायर की थी। इसी प्रकरण में वर्ष 2024 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) ने भोजशाला परिसर में 98 दिनों तक वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया था। बाद में 23 जनवरी 2026 को वसंत पंचमी पर पूरे दिन पूजा-अर्चना की अनुमति सुप्रीम कोर्ट ने दी थी। यह तय नहीं हुआ है कि भोजशाला मंदिर है, मस्जिद है या जैन शाला भोजशाला मामले की नियमित सुनवाई 6 अप्रैल से हाई कोर्ट में जारी है। 6 से 9 अप्रैल तक हिंदू पक्ष की ओर से विष्णुशंकर जैन और विनय जोशी ने भोजशाला को मंदिर बताते हुए अपने तर्क रखे थे। एडवोकेट शोभा मेनन ने कोर्ट में कहा कि अभी यह तय नहीं हुआ है कि भोजशाला मंदिर है, मस्जिद है या जैन शाला। उन्होंने कहा कि यदि यह मंदिर होता तो वहां मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा होती, जबकि ऐसा कोई प्रमाण नहीं है। धार्मिक स्वरूप तय करने का अधिकार सिविल कोर्ट को तर्क दिया कि विवादित स्थल का धार्मिक स्वरूप तय करने का अधिकार सिविल कोर्ट को है, जबकि हाई कोर्ट में अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दायर की गई है। उन्होंने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा जनहित याचिका के माध्यम से स्वयं को समाजसेवी बताना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। सलमान खुर्शीद ने सर्वे रिपोर्ट पर उठाए सवाल एडवोकेट सलमान खुर्शीद ने कहा कि सर्वे के दौरान उपलब्ध कराई गई वीडियोग्राफी और तस्वीरें स्पष्ट नहीं थीं तथा रंगीन फोटो भी उपलब्ध नहीं कराए गए। उन्होंने कहा कि अयोध्या मामले में रामलला विराजमान की मूर्ति मौजूद थी, जबकि भोजशाला में ऐसी कोई मूर्ति स्थापित नहीं है। रिपोर्ट में गौतम बुद्ध की प्रतिमा का नहीं है उल्लेख आरोप लगाया कि सर्वे की सूचना मुस्लिम पक्ष को औपचारिक रूप से नहीं दी गई और जानकारी केवल सोशल मीडिया के माध्यम से मिली। खुर्शीद ने कहा कि सर्वे एक साथ कई स्थानों पर किया गया, जिससे सभी स्थानों पर पक्षकारों की मौजूदगी संभव नहीं थी। उन्होंने दावा किया कि सर्वे के दौरान गौतम बुद्ध की प्रतिमा मिली थी, लेकिन उसका उल्लेख रिपोर्ट में नहीं किया गया। साथ ही सर्वे में कार्बन डेटिंग तकनीक का उपयोग नहीं किए जाने पर भी सवाल उठाए गए। सर्वे प्रक्रिया पर भी उठे सवाल एडवोकेट तौसिफ वारसी ने कहा कि सर्वे के दौरान पुलिस अधीक्षक और कलेक्टर की मौजूदगी के लिए कोई स्पष्ट न्यायालयीन आदेश नहीं था, फिर भी वे पूरे समय उपस्थित रहे उन्होंने यह भी कहा कि सर्वे आधुनिक तकनीक से किया जाना था, लेकिन सर्वे टीम ने पुरानी तकनीक “टोटल स्टेशन” का इस्तेमाल किया। मामले में अब 12 मई को अंतिम बहस प्रस्तावित है, जिसके बाद कोर्ट अपना निर्णय सुरक्षित रख सकती है।

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