एनआईए की तर्ज पर मप्र में यूएपीए और गंभीर नक्सली अपराधों की जांच के लिए गठित स्टेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एसआईए) को 22 महीने बाद काम मिला है। गृह विभाग ने नवंबर 2024 में सीआईडी के अधीन इस नोडल एजेंसी का गठन किया था, लेकिन यह कागजों से बाहर नहीं निकल पाई। सिर्फ आईजी स्तर के अफसर की पदेन पदस्थापना हुई। अलग अमला या समर्पित स्टाफ नहीं मिला। सीआईडी के मौजूदा विवेचक ही इसे चला रहे हैं। फील्ड इन्वेस्टिगेशन और सुरक्षा के लिए संबंधित जिलों के एसपी मैनपॉवर-संसाधन देंगे। अब एसआईए को बालाघाट के 8 संगीन नक्सली मामले जांच के लिए मिले हैं। सभी मामले 2017 से 2022 के हैं और जिला पुलिस के पास अटके थे। मूल आदेश के मुताबिक नक्सल केस की सूचना एसआईए को देकर डीजीपी के अनुमोदन से ट्रांसफर करना था। पुलिस ने केस अपने पास रखे और लॉ एंड ऑर्डर, वीआईपी ड्यूटी व रूटीन गश्त में उलझी रही। सीआईडी के उपलब्ध बल से ही काम चलाने का आदेश… राज्य शासन ने एनआईए की तर्ज पर एसआईए तो बनाई, लेकिन इसे बिना दांत का शेर बना दिया गया। सीआईडी के आईजी को इसका पदेन प्रमुख बना दिया गया। उनके नीचे कोई पदस्थापना नहीं हुई। आदेश में लिखा कि सीआईडी के उपलब्ध बल से ही काम चलाया जाएगा। सीआईडी में पहले से ही स्टाफ की कमी और सैकड़ों पुराने केसों का बोझ है। मुखबिरी से टेरर फंडिंग तक के केस मजबूत साक्ष्यों से दोषसिद्धि पर रहेगा फोकस… यूएपीए और गंभीर नक्सल मामलों में साइंटिफिक एविडेंस और ट्रेल पकड़ना सबसे अहम होता है। जिला पुलिस पर लॉ एंड ऑर्डर का भारी दबाव रहता है। एसआईए का पूरा फोकस केवल मजबूत केस डायरी, फॉरेंसिक साक्ष्य और कोर्ट में दोषसिद्धि सुनिश्चित करने पर रहेगा। बालाघाट के इन 8 मामलों की केस डायरियां तलब कर विवेचना आगे बढ़ाई जा रही है। -पंकज श्रीवास्तव, स्पेशल डीजी सीआईडी
