सच्ची बात, बेधड़क। दैनिक भास्कर भोपाल संस्करण के 68 वर्ष पूरे होने पर हम 11 दिन तक हर सुबह भोपाल की नई कहानी, अनदेखे पहलू की एक विशेष श्रृंखला लेकर आए हैं। हम आपको भोपाल के सबसे बड़े बदलावों, शहर को जीवन देने वाली धरोहरों पर विशेषज्ञों के मंथन, पुराने दस्तावेजों और दुर्लभ अभिलेखों की पड़ताल से निकले अनकहे सच, तथ्यों पर आधारित एक्सक्लूसिव खुलासों और दुर्लभ तस्वीरों के संग्रह से रूबरू कराएंगे। पढ़िए आज की कहानी… बोरास गोलीकांड ने दिल्ली को साफ संदेश दे दिया था कि भोपाल का सवाल अब ज्यादा दिन टाला नहीं जा सकता। दस दिन बाद 24 जनवरी 1949 को सरदार वल्लभभाई पटेल ने अपने सबसे भरोसेमंद अधिकारी और स्टेट्स डिपार्टमेंट के सचिव वी.पी. मेनन को भोपाल भेजा। मेनन ने लगातार तीन दिनों तक नवाब हमीदुल्ला खान, उनके मंत्रियों और अन्य पक्षों से बातचीत की। मेनन ने नवाब को समझाया कि भोपाल की भौगोलिक स्थिति, संस्कृति और भाषाई निकटता को देखते हुए उसका मध्य भारत में विलय ही एकमात्र व्यावहारिक विकल्प है। जवाब में नवाब ने कहा कि रियासत की बिगड़ती स्थिति के लिए वे नहीं, बल्कि आंदोलनकारी जिम्मेदार हैं। उन्होंने यहां तक संकेत दिया कि यदि हालात ऐसे ही रहे तो वे सत्ता अपने उत्तराधिकारी को सौंपने पर भी विचार कर सकते हैं। मेनन ने उन्हें ऐसा कदम न उठाने की सलाह दी। तीन दिन की बातचीत के बाद एक अहम सहमति बनी। तय हुआ कि सरदार पटेल की मंजूरी के बाद यह घोषणा की जाएगी कि नवाब सत्ता हस्तांतरण के लिए तैयार हैं। इसके बदले आंदोलन शांत कराने की कोशिश होगी। इसी गोपनीय वार्ता में मेनन ने नवाब को अपनी प्रशासनिक तैयारियां पूरी करने के लिए छह महीने की मोहलत भी दी। वार्ता के दौरान एक दिलचस्प निजी मुद्दा भी सामने आया। नवाब ने कहा कि उनकी मां ने उनकी तीसरी बेटी को जो जागीर दी थी, वह उसे वापस लेना चाहते हैं। मेनन ने शुरुआत में इस पर असहमति जताई, लेकिन बाद में सरदार पटेल के परामर्श से इस पर सहमति बन गई। नवाब और सरदार पटेल के बीच पत्राचार भी जारी रहा। 7 जनवरी 1949 को नवाब ने पटेल से मार्गदर्शन मांगा था। दोनों के बीच कई पत्रों का आदान-प्रदान हुआ, जिसने धीरे-धीरे अविश्वास खत्म किया। आखिरकार पटेल की सलाह और बदलते राजनीतिक हालात को देखते हुए नवाब ने 30 अप्रैल 1949 को ‘मर्जर एग्रीमेंट’ पर हस्ताक्षर कर दिए। 1 जून 1949 को भारत सरकार ने भोपाल का प्रशासन औपचारिक रूप से अपने हाथ में ले लिया घोषित कर दिया। जनमत संग्रह कराना चाहते थे नवाब और उनके मंत्री… मेनन नहीं माने बातचीत के दौरान कुछ मंत्रियों ने विलय के मुद्दे पर जनमत संग्रह कराने का सुझाव रखा। मेनन ने इसे तुरंत खारिज कर दिया। उनका तर्क था कि ग्वालियर और इंदौर जैसी बड़ी रियासतों में भी जनमत संग्रह नहीं कराया गया, इसलिए भोपाल में भी इसकी आवश्यकता नहीं है। (स्रोत : वीपी मेनन की पुस्तक ‘द स्टोरी ऑफ द इंटीग्रेशन ऑफ द इंडियन स्टेट्स’ और मध्यप्रदेश शासन के स्वराज संस्थान से प्रकाशित पुस्तक।)
