सच्ची बात, बेधड़क। दैनिक भास्कर भोपाल संस्करण के 68 वर्ष पूरे होने पर हम 11 दिन तक हर सुबह भोपाल की नई कहानी, अनदेखे पहलू की एक विशेष श्रृंखला लेकर आए हैं। हम आपको भोपाल के सबसे बड़े बदलावों, शहर को जीवन देने वाली धरोहरों पर विशेषज्ञों के मंथन, पुराने दस्तावेजों और दुर्लभ अभिलेखों की पड़ताल से निकले अनकहे सच, तथ्यों पर आधारित एक्सक्लूसिव खुलासों और दुर्लभ तस्वीरों के संग्रह से रूबरू कराएंगे। पढ़िए आज की कहानी… विदिशा का विजय मंदिर, जिसे स्थानीय रूप से बीजामंडल कहा जाता है, मध्य भारत के प्रमुख धरोहरों में से एक है। इसी की तर्ज पर देश की नई संसद की डिजाइन बनाई गई है। प्राचीन वेदिसा, बेसनगर या भेलसा में स्थित इस मंदिर का निर्माण चालुक्य राजा कृष्ण के प्रधानमंत्री वाचस्पति ने विदिशा विजय की स्मृति में कराया था। यहां भेल्लिस्वामिन (सूर्य देव) की प्रतिमा स्थापित की गई, जिससे नगर का नाम भेलसा पड़ा। बाद में मंदिर का विस्तार हुआ और यह देवी चर्चिका (विजया) तथा भगवान शिव को भी समर्पित रहा। 11वीं शताब्दी में अलबरूनी ने इसकी ऊंचाई करीब 300 फीट बताई गई। इससे इसकी भव्यता कोणार्क सूर्य मंदिर के समकक्ष मानी जाती है। पूरा परिसर आधा मील लंबा और आधा मील चौड़ा था। मंदिर ऊंचे चबूतरे पर बना था। यहां पूर्व, उत्तर और दक्षिण से सीढ़ियां थीं। चारों ओर प्रदक्षिणा पथ था। स्तंभों पर बेल-बूटों, यक्ष-यक्षिणियों और पौराणिक कथाओं की नक्काशी थी। परिसर के उत्तर में स्थित 8वीं शताब्दी की एल-आकार की बावड़ी, जिस पर कृष्ण की बाल लीलाएं उकेरी गई हैं, मंदिर से भी 400 साल प्राचीन है। देखिए बीजामंडल की तस्वीरें… दशकों से विवाद, 2024 में दोबारा याचिका 1947 से 1964 के बीच हिंदू महासभा ने मंदिर पर अधिकार को लेकर सत्याग्रह चलाया। कुछ समय बाद परिसर में पूजा और नमाज, दोनों पर रोक लगा दी गई। मुस्लिम समुदाय के लिए भोपाल रोड पर अलग ईदगाह बनाई गई और एएसआई ने मंदिर का मुख्य द्वार बंद कर दिया। 1992 के समझौते के बाद से हर नागपंचमी पर बाहर से प्रतीकात्मक पूजा की अनुमति मिलती रही है। 2024 में गर्भगृह में पूजा करने, दोबारा सर्वे कराने और रिकॉर्ड से ‘मस्जिद’ शब्द हटाने की मांग की। एएसआई ने 1951 की गजट का हवाला देते हुए पूजा की अनुमति नहीं दी। अक्सर विदिशा और खजुराहो के बीजामंडल को एक ही स्मारक समझा जाता है, जबकि दोनों अलग हैं। विदिशा का बिजामंडल परमारकालीन मंदिर है, जिसके चबूतरे पर आलमगीरी मस्जिद बनी है। वहीं खजुराहो का बीजामंडल चंदेलकालीन शैव मंदिर है और संरक्षित पुरातात्विक स्मारक है।
