क्राइम फाइल्स के पहले भाग में आपने पढ़ा कि 22-23 सितंबर 1998 की आधी रात, झाबुआ जिले के एक गांव में स्थित एक कॉन्वेंट मिशन में 26 से अधिक हथियारबंद बदमाश घुस आए।
उन्होंने पूरे परिसर में लूटपाट और हिंसा मचाई। उस रात कॉन्वेंट में चार नन सिस्टर्स भी थीं, जबकि प्रभारी फादर बाहर गए हुए थे। सुबह जब ग्रामीण मौके पर पहुंचे तो भवन का गेट टूटा मिला।
अंदर सारा सामान बिखरा पड़ा था और चारों सिस्टर्स बदहवास हालत में थीं। शुरुआती शिकायत में घटना को डकैती बताया गया, लेकिन जब पुलिस जांच आगे बढ़ी तो सब हैरान रह गए।
नर्सों ने अपने साथ गैंगरेप की बात कही। इसके बाद पूरे प्रदेश और देश में सनसनी फैल गई और पुलिस पर जल्द से जल्द आरोपियों की पहचान कर उन्हें गिरफ्तार करने का भारी दबाव बन गया। आगे क्या हुआ इस पार्ट में पढ़िए… कॉन्वेंट में मौजूद चारों सिस्टर्स तमिलनाडु की रहने वाली थीं। वे तमिल और अंग्रेजी जानती थीं, लेकिन हिंदी नहीं बोल सकती थीं। इसलिए अदालत ने दोनों पक्षों की सहमति से सरकारी कॉलेज झाबुआ के अंग्रेजी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर आर.ए. खान को अनुवादक नियुक्त किया। उन्हीं की मदद से पीड़िताओं के बयान दर्ज हुए। आधी रात… और गेट पर दस्तक 22 सितंबर की रात चारों अपने-अपने कमरों में थीं। करीब दो बजे कॉलिंग बेल बजी। दो नर्स पार्लर रूम पहुंचीं, जहां से दवाइयां दी जाती थीं। खिड़की से देखा तो बाहर कई लोग खड़े थे। कुछ ही देर में दो और नर्स भी वहां आ गईं। मुख्य गेट के पास जल रहे बल्ब की रोशनी में उन्हें आठ-दस लोग दिखाई दिए। उनके हाथों में धारदार हथियार थे। उन्होंने कहा कि उनका बच्चा बीमार है और दवा चाहिए। कुछ देर बाद बच्चे के रोने की आवाज भी सुनाई दी। सिस्टर्स ने बच्चे की मां के बारे में पूछा तो बाहर खड़े लोगों ने सड़क की ओर इशारा कर दिया। सिस्टर्स ने कहा मां को लेकर आएं तब इलाज होगा। इसके बाद दरवाजा बंद कर दिया। दरवाजा टूटा और सब कुछ बदल गया कुछ ही देर बाद तेज आवाज आई। बदमाशों ने मुख्य दरवाजा तोड़ दिया था। अब वे प्रार्थना कक्ष का दरवाजा खुलवाना चाहते थे। सिस्टर्स ने उनसे कहा कि जो सामान चाहिए ले जाएं, लेकिन उन्हें नुकसान न पहुंचाएं। उन्होंने दरवाजा रोकने की कोशिश की, लेकिन जब लगा कि वह टूट जाएगा तो मजबूरी में खोल दिया। रोशनी से भरे प्रार्थना कक्ष में दस-पंद्रह लोग घुस आए। वे अलमारी और किताबों के बीच कुछ तलाश रहे थे। नर्स के बयान ने बदली जांच की दिशा नर्स के मुताबिक, कुछ बदमाश उसे और दूसरी सिस्टर्स को बाहर घसीटकर ले गए। विरोध करने पर थप्पड़ मारे गए और हथियार दिखाकर चुप रहने को कहा गया। अपने बयान में उसने बताया कि उसके हाथ-पैर पकड़ लिए गए, मुंह दबा दिया गया और उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया। चार बदमाश हाथ पैर पकड़े थे और बाकी बारी-बारी रेप करते रहे। उसने दूसरी सिस्टर की चीखें भी सुनीं, लेकिन अंधेरे में कुछ देख नहीं सकी। चारों नर्स दो घंटें तक चिल्लाती रहीं लेकिन बचाने कोई नहीं आया। पुलिस ने 40 लोगों को हिरासत में लिया हमले के बाद बदमाश अलग-अलग कमरों में फैल गए। नकदी, घड़ियां, कैमरा, टाइपराइटर, सिलाई मशीन, कपड़े और अन्य सामान समेटकर फरार हो गए। उनके जाने के बाद चारों सिस्टर्स सदमे में थीं। सुबह करीब चार बजे कुछ ग्रामीण पहुंचे। टूटा गेट, बिखरा सामान और डरी-सहमी सिस्टर्स देखकर उन्होंने चर्च के फादर और फिर पुलिस को सूचना दी। पुलिस ने आसपास के गांवों में लगातार दबिश दी। करीब 40 लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ की गई। पहचान परेड में नर्सों ने 23 लोगों को पहचाना जांच का सबसे अहम चरण पहचान परेड था। सिस्टर्स पहले से किसी आरोपी को नहीं जानती थीं। इसलिए जिला जेल में न्यायिक अधिकारियों की निगरानी में पहचान परेड कराई गई। ये वो संदिग्ध थे जो उस रात इलाके में देखे गए थे। इसके अलावा पुलिस के पास कोई दूसरा सुराग नहीं था। इसलिए पहचान परेड पर पूरा केस निर्भर हो गया था। अलग-अलग चरणों में नर्सों ने भूर्जी, पिढ़िया, बादरा उर्फ बहादरा, चमना, रमेश, कमजी, मेसरिया, झितरा, खेमराज समेत कुल 23 लोगों की पहचान की। इनमें 23 गिरफ्तार हुए, जबकि तीन फरार रहे। बरामद टाइपराइटर, सिलाई मशीन, घड़ियां, कपड़े और अन्य सामान की भी पीड़िताओं ने पहचान की। ट्रायल कोर्ट से हाईकोर्ट तक चला मामला अप्रैल 2001 में ट्रायल कोर्ट ने फैसला सुनाया। 23 आरोपियों में से सात को बरी कर दिया गया, जबकि 16 आरोपियों को डकैती, घर में घुसकर अपराध करने और यौन हिंसा से जुड़े आरोपों में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। दो आरोपी-कालू लिमजी और बच्चू नाहरसिंह घटना के बाद से फरार थे। बाद में 2019 में कालू गिरफ्तार हुआ, जबकि बच्चू अब भी फरार बताया जाता है। दोषियों ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में फैसले को चुनौती दी। उनका कहना था कि पहचान परेड और शुरुआती एफआईआर में कई कमियां थीं। हाईकोर्ट ने सभी साक्ष्यों की दोबारा समीक्षा की। एक आरोपी के मामले में पहचान को लेकर संदेह का लाभ देते हुए उसे राहत दी गई, जबकि बाकी आरोपियों के खिलाफ सजा बरकरार रखी या संशोधित की गई। क्राइम फाइल्स पार्ट-1 भी पढ़ें… 6 हथियारबंद घुसे…लूट के बाद चार नर्सों से गैंगरेप मध्य प्रदेश क्राइम फाइल्स में आज कहानी 28 साल पुराने झाबुआ के उस बहुचर्चित मामले की, जिसने न सिर्फ मध्य प्रदेश बल्कि पूरे देश को झकझोर दिया था। इसकी गूंज विदेशों तक सुनाई दी। पढ़ें पूरी खबर…
