ग्वालियर के बलुआ पत्थर की पहचान देश से लेकर यूरोप तक है। यहां के स्टोन उत्पाद यूरोप के करीब 27 देशों में पहुंचते हैं, लेकिन कंटेनर किराए में अचानक हुई भारी बढ़ोतरी ने इस कारोबार की पूरी गणित बिगाड़ दी है। यूरोप जाने वाले कंटेनर का किराया करीब 150% तक बढ़ गया है। जो कंटेनर पहले करीब 2 हजार डॉलर में मिल जाता था, उसके लिए अब 5 हजार डॉलर से ज्यादा चुकाने पड़ रहे हैं। कारोबारियों के मुताबिक कुछ मामलों में किराया 5,400 डॉलर तक पहुंच गया है। दरअसल खाड़ी देशों में युद्ध के चलते जहाजों को घूमकर जाना पड़ रहा है। इसके चलते यह किराया बढ़ाया गया है। कई बार लौटते समय जहाजों को माल नहीं मिल पा रहा है जिसका असर बढ़ोत्तरी में पड़ा है। शिपिंग लागत बढ़ने से ग्वालियर के स्टोन उत्पाद यूरोप के बाजार में महंगे पड़ने लगे हैं। इसका सीधा असर ऑर्डर पर पड़ा है। कई विदेशी खरीदारों ने फिलहाल ऑर्डर होल्ड कर दिए हैं। इससे पुरानी छावनी स्थित स्टोन पार्क की 55 फैक्ट्रियों और अंचल की 150 से ज्यादा स्टोन इकाइयों में तैयार माल जमा होने लगा है। स्थिति यह है कि अब फैक्ट्रियों और गोदामों में तैयार माल रखने के लिए जगह कम पड़ रही है। सबसे पहले देखिए ग्वालियर के बलुआ पत्थर की तस्वीरें… 27 टन के कंटेनर में 6-7 लाख का माल, भाड़ा ही कई गुना बढ़ा कारोबारियों के मुताबिक 27 टन क्षमता वाले एक कंटेनर में करीब 6 से 7 लाख रुपए के स्टोन उत्पाद यूरोप भेजे जाते हैं। ऐसे में कंटेनर का किराया करीब ढाई गुना तक बढ़ जाने से प्रति खेप निर्यात लागत काफी बढ़ गई है। पत्थर की कीमत और परिवहन खर्च के बीच का अंतर कम होने के कारण बढ़ा हुआ भाड़ा कारोबारियों और विदेशी खरीदारों, दोनों पर असर डाल रहा है। ऑर्डर रुके तो फैक्ट्रियों में माल, पूंजी भी फंसी विदेशी ऑर्डर होल्ड होने से तैयार स्टोन उत्पाद फैक्ट्रियों में ही पड़े हैं। पत्थर भारी होने के कारण इसे लंबे समय तक सामान्य गोदामों में रखना भी आसान नहीं है। कारोबारियों के सामने दोहरी परेशानी है- पुराना माल उठ नहीं रहा और नया उत्पादन करने पर स्टॉक और बढ़ जाएगा। इससे तैयार माल के साथ कारोबारियों की पूंजी भी फंस गई है। ओवरटाइम से पूरी हाजिरी तक का संकट, मजदूर लौटने लगे कारोबार पर असर अब सीधे रोजगार तक पहुंच गया है। पत्थर का काम करने वाले कारीगरों ने बताया है कि वे इस समय परेशान हैं। काम नहीं मिल रहा है। जहां काम है तो पैसा समय पर नहीं मिल रहा है। कई जगह मजदूर वापस लौट रहे हैं। उद्योग ने मांगी सब्सिडी स्टोन पार्क ग्वालियर इंडस्ट्रियलिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष सत्य प्रकाश शुक्ला ने कहा कि कंटेनर भाड़े में अचानक बढ़ोतरी से यूरोप में ग्वालियर के स्टोन उत्पादों की लागत बढ़ गई है। इसका सीधा असर ऑर्डर और फैक्ट्रियों के काम पर पड़ा है। इस तरह विदेश तक पहुंचता है पत्थर ग्वालियर सहित पूरे अंचल और प्रदेश से विदेश में भेजे जाने वाले पत्थर को कई चरणों से गुजरना पड़ता है। सबसे पहले खदानों से बड़ी-बड़ी चट्टानों के रूप में पत्थर निकाला जाता है। इसके बाद ट्रक या ट्रॉला से इसे फैक्ट्री तक पहुंचाया जाता है, जहां बड़ी मशीनों से इसकी कटिंग की जाती है। फिर जरूरत के अनुसार पत्थर को अलग-अलग आकार और साइज में तैयार किया जाता है। तैयार उत्पादों को लकड़ी के बॉक्स में पैक कर बड़े ट्रॉला से पोर्ट तक भेजा जाता है। गुजरात के सहारे भेजा जाता है ग्वालियर-चंबल अंचल और मध्यप्रदेश से विदेश जाने वाला अधिकांश स्टोन गुजरात के मुंद्रा और कांडला पोर्ट भेजा जाता है। कारोबारियों के मुताबिक यहां से माल पहुंचने में करीब 22 से 26 दिन लगते हैं, जबकि मुंबई पोर्ट तक पहुंचने में 32 से 35 दिन लग जाते हैं। पोर्ट पर पहुंचने के बाद पत्थर को ट्रॉला से उतारकर केमिकल ट्रीटमेंट किया जाता है, ताकि फंगस या संक्रमण जैसी समस्या न हो। इसके बाद तैयार माल को कंटेनर में लोड किया जाता है। कंटेनर के आकार के अनुसार माल की पैकिंग और लोडिंग की जाती है। सामान्य कंटेनर करीब 10 फीट चौड़ा, 20 फीट लंबा और 8 फीट ऊंचा होता है। ये खबर भी पढ़ें… पन्ना में हीरे निकल रहे, पर बिक क्यों नहीं रहे कहा जाता है कि करीब 350 साल पहले महाराजा छत्रसाल के गुरु महामति प्राणनाथ ने उन्हें बताया था कि पन्ना की धरती के नीचे हीरे दबे हैं। इसी के बाद पन्ना में पहली खदान खुदी और तब से पन्ना हीरे की खान के तौर पर मशहूर है, और आज भी यहां कोई भी नागरिक 200 रुपए का पट्टा लेकर खुदाई शुरू कर सकता है। लेकिन आज पन्ना के सामने अलग किस्म की मुश्किल है- हीरे मिल रहे हैं, लेकिन बिक नहीं पा रहे।पूरी खबर पढ़ें
