देवास जिले में स्थित खिवनी अभयारण्य से वन्यजीव इतिहास की एक दुर्लभ और हैरान करने वाली घटना सामने आई है। अभयारण्य के अल्फ़ा मेल (इलाके का मुख्य बाघ) कहे जाने वाले 10 वर्षीय टाइगर युवराज को एक टेरिटोरियल फाइट (वर्चस्व की जंग) में शिकस्त झेलनी पड़ी है। एक नए, अत्यंत फुर्तीले और युवा बाघ “अधिराज” ने युवराज को उसके अपने ही गढ़ में चुनौती देकर खदेड़ दिया। शुक्रवार को वन विभाग की टीम ने युवराज को लहूलुहान देखा। शनिवार को वन विहार भोपाल की टीम ने 4 घंटे के बेहद जोखिम भरे ऑपरेशन के बाद उसे रेस्क्यू कर भोपाल शिफ्ट कर दिया। शुक्रवार को गश्त के दौरान स्टाफ को युवराज लंगड़ाते हुए चलता मिला। उसके अगले पैरों पर नाखूनों के ताजा जख्म थे। वन्यजीव व्यवहार के अनुसार, वर्चस्व की लड़ाई में बाघ हमेशा एक-दूसरे के पंजों को निशाना बनाते हैं। इससे प्रतिद्वंदी शिकार नहीं कर पाता। उम्रदराज होने के कारण युवराज युवा बाघ की फुर्ती का मुकाबला नहीं कर सका। उसके नाखून टूट गए। उसके पैर डैमेज हो गए। वह शिकार करने और चलने में अक्षम हो गया। अब उसकी सल्तनत पर नए बाघ का आधिपत्य हो गया है। खिवनी में सात बाघों का कुनबा युवराज की ही देन शनिवार सुबह रेस्क्यू का खाका बना। सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि खिवनी में रेस्क्यू के लिए हाथी मौजूद नहीं था। आमतौर पर हिंसक बाघों को हाथी की पीठ पर बैठकर बेहोश किया जाता है। ऊंचाई के कारण डॉक्टर सुरक्षित रहते हैं। हाथी न होने से वन विहार भोपाल के सीनियर डॉक्टर अतुल गुप्ता और खिवनी अभयारण्य की दो टीमों के लिए घायल बाघ को चारों तरफ से घेरकर निशाने पर लेना बेहद जोखिम भरा था। डॉ. अतुल गुप्ता ने अनुभव का परिचय दिया। उन्होंने बंदूक का एयर प्रेशर सटीक सेट किया। उन्होंने सही कोण (एंगल) से युवराज के पिछले हिस्से की मुख्य मांसपेशी में निशाना साधा। बेहोश करने के बाद वन विहार की टीम ने युवराज का प्राथमिक उपचार किया। टीम उसे सुरक्षित रूप से भोपाल ले गई। वहां उसका बेहतर इलाज होगा। 07 बाघों के कुनबे का जनक है युवराज खिवनी अभयारण्य का इतिहास युवराज के बिना अधूरा है। आज खिवनी में जो 07 बाघों का पूरा कुनबा फल-फूल रहा है, वह दरअसल “युवराज और मीराश’ (बाघिन) की ही देन है। इनकी जोड़ी ने ही खिवनी को नई पहचान दिलाई है। आज उसी के जनक को यहां से विस्थापित होना पड़ा।
