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एक फर्जी व्यक्ति डॉक्टर बन 17 साल करता रहा इलाज:बीएमओ भी बना; भास्कर की खबर के बाद FIR हुई तो फरार हो गया

मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में फर्जीवाड़े का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। यहां एक व्यक्ति करीब 17 साल तक दूसरे डॉक्टर के नाम पर सरकारी अस्पतालों में मरीजों का इलाज करता रहा। इतना ही नहीं, वह ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर (बीएमओ) जैसे जिम्मेदार प्रशासनिक पद पर भी रहा। जांच में सामने आया कि डॉ. सुनील कुमार सिंह के नाम से नौकरी करने वाला व्यक्ति असल में रीवा निवासी शिवकुमार पांडे है। उसने दूसरे डॉक्टर के नाम, शैक्षणिक योग्यता और मेडिकल रजिस्ट्रेशन नंबर का इस्तेमाल कर सरकारी नौकरी हासिल की थी।
दैनिक भास्कर ने इस मामले को ‘एक नाम-दो डॉक्टर, सरकारी अस्पताल में 15 साल से फर्जी इलाज’ शीर्षक से उजागर किया था। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग ने राज्य स्तर पर जांच समिति गठित की। जांच में फर्जीवाड़े की पुष्टि होने पर बालाघाट जिले के बिरसा थाने में आरोपी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। अब पुलिस उसकी तलाश कर रही है। साथ ही, फर्जी तरीके से नौकरी हासिल कर अर्जित की गई संपत्ति का ब्योरा भी जुटाया जा रहा है। असली डॉक्टर देवास में, हमनाम बालाघाट में करता रहा नौकरी लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग के आदेश और बालाघाट के सीएमएचओ डॉ. शत्रुघ्न सिंह दाहिया के प्रतिवेदन के मुताबिक, असली डॉ. सुनील कुमार चिकित्सा अधिकारी (PGMO) के पद पर देवास जिले में पदस्थ हैं। दूसरी ओर, शिवकुमार पांडे ने उनके नाम, शैक्षणिक योग्यता और रजिस्ट्रेशन नंबर के आधार पर फर्जी दस्तावेज तैयार किए और संविदा चिकित्सक के रूप में स्वास्थ्य विभाग में नौकरी हासिल कर ली। आरोपी ने कई वर्षों तक बिरसा और दमोह क्षेत्र में काम किया। इस दौरान वह प्रभारी बीएमओ जैसे पद पर भी रहा। इतने लंबे समय तक सरकारी व्यवस्था में काम करने के बावजूद उसकी पहचान उजागर नहीं हुई। उसने अपने गृह जिले को लेकर भी अलग-अलग जानकारियां दीं। कभी मुरैना, तो कभी रीवा और बालाघाट से जुड़ी जानकारी सरकारी रिकॉर्ड में सामने आई। सबसे गंभीर पहलू यह है कि एक ही डॉक्टर के नाम और रजिस्ट्रेशन नंबर का इस्तेमाल कर दो अलग-अलग जिलों में नौकरी किए जाने का मामला वर्षों तक विभागीय जांच और निगरानी के दायरे से बाहर रहा। 2024 में शिकायत हुई, फिर कैसे मिल गई क्लीनचिट? इस मामले में विभागीय जांच की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में है। वर्ष 2024 में भी बिरसा में पदस्थ डॉ. सुनील सिंह की डिग्री को लेकर शिकायत की गई थी। उस समय जांच हुई, लेकिन आरोपी को क्लीनचिट दे दी गई। अब सवाल उठ रहा है कि जब शिकायत पहले ही सामने आ चुकी थी, तो उस समय दस्तावेजों का सही तरीके से सत्यापन क्यों नहीं किया गया? क्या जांच के दौरान देवास में पदस्थ मूल डॉक्टर के रिकॉर्ड से आरोपी के दस्तावेजों का मिलान कराया गया था? क्या स्वास्थ्य संचालनालय की स्थापना और वेतन संबंधी प्रक्रिया में एक ही नाम और रजिस्ट्रेशन नंबर के आधार पर दो व्यक्तियों के नौकरी करने का पता नहीं चल सका? या फिर आरोपी को विभाग के कुछ प्रभावशाली अधिकारियों का संरक्षण हासिल था? इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेंगे। वर्ष 2024 में शिकायत की जांच करने वाले तत्कालीन बालाघाट सीएमएचओ डॉ. मनोज पांडे ने अपनी कार्रवाई का बचाव किया है। उनका कहना है कि उस समय शिकायत डॉ. सुनील सिंह की डिग्री को लेकर आई थी। इसके बाद उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर डिग्री के सत्यापन के लिए रीवा मेडिकल कॉलेज से संपर्क किया गया था। उनके मुताबिक, मेडिकल कॉलेज की ओर से बताया गया था कि सुनील सिंह नाम का व्यक्ति वहां का छात्र रहा है और उसने पढ़ाई पूरी की है। इसी आधार पर आरोपी को क्लीनचिट दे दी गई थी। भास्कर की खबर के बाद भोपाल स्तर पर हुई जांच भास्कर डिजिटल पर दस्तावेजों के साथ खबर प्रकाशित होने के बाद मामला उच्च स्तर तक पहुंचा। इसके बाद भोपाल में राज्य स्तरीय जांच समिति गठित की गई। जांच में बालाघाट में डॉ. सुनील कुमार सिंह के नाम से नौकरी करने वाले व्यक्ति की पहचान शिवकुमार पांडे के रूप में सामने आई। अधिकारियों के मुताबिक, उसने फर्जी दस्तावेजों के जरिए शासकीय सेवा हासिल की थी। इसके बाद बिरसा थाने में मामला दर्ज कराया गया। अब पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि उसने नौकरी हासिल करने के लिए किन दस्तावेजों का इस्तेमाल किया। फर्जीवाड़े में किसी अन्य व्यक्ति की भूमिका थी या नहीं और इतने वर्षों तक वह विभागीय सत्यापन से कैसे बचता रहा। गांव में फोटो दिखाया तो लोगों ने पहचान लिया असली नाम बिरसा थाने में केस दर्ज होने के बाद पुलिस ने आरोपी की तलाश शुरू की। मोबाइल नंबरों और अन्य तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर पुलिस टीम रीवा जिले के बड़ागांव पहुंची। यहां स्थानीय लोगों को डॉ. सुनील सिंह की तस्वीर दिखाई गई, तो उन्होंने उसकी पहचान शिवकुमार पांडे के रूप में की। बिरसा थाना प्रभारी विजय कैन के मुताबिक, ग्रामीणों ने बताया कि तस्वीर में दिख रहा व्यक्ति डॉ. सुनील सिंह नहीं, बल्कि स्वर्गीय रामलखन पांडे का बेटा शिवकुमार पांडे है। लोगों ने पुलिस को यह भी जानकारी दी कि शिवकुमार गांव में कम ही आता है और उसका एक मकान रीवा शहर के खुटेही क्षेत्र में भी है। इसके बाद पुलिस खुटेही स्थित मकान नंबर 12/789 पहुंची। वहां आरोपी का बेटा और बेटी मिले। पुलिस ने जब उन्हें तस्वीर दिखाई, तो उन्होंने भी व्यक्ति की पहचान अपने पिता शिवकुमार पांडे के रूप में की। पुलिस के मुताबिक, बच्चों ने बताया कि उनके पिता बालाघाट में डॉक्टर के रूप में काम करते हैं। हालांकि, पुलिस की दबिश के दौरान आरोपी घर पर नहीं मिला। FIR दर्ज, संपत्ति का ब्योरा जुटा रही पुलिस प्रभारी बीएमओ डॉ. नरेश मारन की शिकायत पर पुलिस ने शिवकुमार पांडे के खिलाफ BNS की धारा 318(4), 340(2) और 336(3) के तहत एफआईआर दर्ज की है। पुलिस आरोपी की चल-अचल संपत्ति का ब्योरा जुटा रही है। इसके लिए रीवा की गुढ़ और हुजूर तहसीलों को पत्र भेजे गए हैं, ताकि नियमानुसार कुर्की की कार्रवाई की जा सके। बालाघाट के एडिशनल एसपी डॉ. नितेश भार्गव ने बताया कि आरोपी की गिरफ्तारी के लिए टीमें जुटी हैं। वह अपने स्थायी पते से फरार है। उस पर इनाम घोषित किया गया है। इनाम के पोस्टर रीवा पुलिस को सौंपने के साथ ही अलग-अलग जगहों पर चस्पा किए गए हैं।
भास्कर ने किया था खुलासा एक नाम-दो डॉक्टर, सरकारी अस्पताल में 15साल से फर्जी इलाज: एक बिना डॉक्टरी पढ़े ही कर रहा नौकरी, स्वास्थ्य विभाग अनजान इस शीर्षक से भास्कर ने दैनिक भास्कर एप पर खबर पब्लिश की थी। उस खबर को पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें-
https://dainik.bhaskar.com/X8X2jXblv2b?ref=MjA3NDAyMTE4NTY0NzIyNjg4MA%3D%3D

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