राज्यसभा में शून्यकाल के दौरान जनजातीय समाज की अस्मिता और धर्मांतरण का मुद्दा गरमाया रहा। मध्य प्रदेश से बीजेपी सांसद डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी ने दो टूक कहा कि धर्मांतरण कर चुके आदिवासियों को जनजातीय आरक्षण के दायरे से बाहर किया जाना चाहिए। उन्होंने इसे जनजातीय पहचान और अधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय बताया। डॉ. सोलंकी ने सदन में कहा कि संविधान धार्मिक स्वतंत्रता देता है, लेकिन छल, बल और प्रलोभन के जरिए किया गया धर्मांतरण “अक्षम्य अपराध” है। उनके मुताबिक आदिवासी क्षेत्रों में सुनियोजित तरीके से मूल पहचान मिटाने की कोशिश हो रही है, जो सांस्कृतिक संकट के साथ राष्ट्रीय चिंता का विषय भी है। डीलिस्ट कर आरक्षण से वंचित किया जाए डॉ. सोलंकी ने सुझाव दिया कि जो लोग लालच या दबाव में धर्म बदल चुके हैं, उन्हें डी-लिस्ट कर आरक्षण से वंचित किया जाए, ताकि वास्तविक पात्र आदिवासियों के अधिकार सुरक्षित रह सकें। सोलंकी ने यह भी कहा कि बेहतर इलाज, मुफ्त शिक्षा और नौकरी का लालच देकर धर्मांतरण कराया जा रहा है, जिससे गांवों में सामाजिक तनाव बढ़ रहा है। एक देश एक कानून बनाने की मांग कानूनी व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि अलग-अलग राज्यों के कानून पर्याप्त नहीं हैं, इसलिए पूरे देश में एक समान और सख्त केंद्रीय कानून बनाया जाना चाहिए। साथ ही संविधान के अनुच्छेद 342 में संशोधन की जरूरत बताई। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला सुप्रीम कोर्ट के 24 मार्च 2026 के फैसले का हवाला देते हुए सोलंकी ने कहा कि जैसे SC वर्ग के लिए स्पष्ट व्यवस्था की गई है, वैसी ही व्यवस्था ST वर्ग के लिए भी लागू होनी चाहिए। उन्होंने सरकार से जनजातीय समाज की संस्कृति और पहचान की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की।
