मध्य प्रदेश के सिवनी जिला अस्पताल की सिक न्यू बॉर्न केयर यूनिट (एसएनसीयू) में छह महीने (अप्रैल से सितंबर 2026) के भीतर 80 नवजात बच्चों की मौत हो चुकी है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी इसे कोई गंभीर मामला नहीं मानते। जिले के अफसरों का तर्क है कि मौतों का यह आंकड़ा (7.4%) पूरी तरह ‘सामान्य’ है, क्योंकि वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) के मुताबिक 10% तक नवजात शिशुओं की मौत एक्सेप्टेबल होती है। दैनिक भास्कर की जमीनी और तकनीकी पड़ताल में अफसरों के ये तमाम दावे पूरी तरह झूठे साबित हुए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर के दौर में SNCU में 6% से ज्यादा मौतें किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं हैं। वहीं बीते साढ़े छह साल में केवल इसी एक अस्पताल के SNCU में 1,100 नवजात बच्चों की मौत दर्ज हो चुकी है, जो अपने आप में कई सवाल खड़े करती है। भास्कर ने उन परिजन से भी बात की, जिन्होंने अपने बच्चों को खोया। पढ़िए रिपोर्ट… विधायक के दौरे से सामने आया मामला यह मामला तब गरमाया, जब बीजेपी विधायक दिनेश राय मुनमुन ने 10 अक्टूबर 2026 को जिला अस्पताल के एसएनसीयू का दौरा किया। वहां 3 महीने में 46 बच्चों की मौत की जानकारी मिलने पर उन्होंने सीएम मोहन यादव को पत्र लिखकर जांच की मांग की। सरकार ने जांच के लिए 4 डॉक्टरों की टीम बनाई। टीम ने खुलासा किया कि 6 महीने में 1088 नवजात भर्ती हुए थे, जिनमें 80 की मौत हुई। इस रिपोर्ट के आधार पर एसएनसीयू प्रभारी डॉ. पारस पटेरिया को पद से हटा दिया गया । तीन केस : परिजन ने लगाया लापरवाही का आरोप केस 1: स्वस्थ बच्चा डिस्चार्ज किया, फिर तेज बुखार से मौत बरघाट की माधुरी पटले ने 14 अप्रैल को स्वस्थ बेटे को जन्म दिया। जन्म के समय उसका वजन 2.6 किलो था। अस्पताल से डिस्चार्ज के बाद घर पहुंचते ही बच्चे को तेज बुखार आया। दोबारा अस्पताल ले जाने पर उसे एसएनसीयू में रखा गया, जहां 5 दिन बाद उसने दम तोड़ दिया। पिता कमलेश का सवाल है- जब बच्चा बीमार था तो बिना जांच डिस्चार्ज क्यों किया? केस 2: लंच टाइम का बहाना और वॉशरूम में डिलीवरी बरघाट के राहुल और पूजा बाहेश्वर के जुड़वां बच्चे होने वाले थे। छठे महीने में दर्द होने पर निजी डॉक्टर ने ₹300 फीस लेकर सिवनी रेफर किया। दोपहर 1 बजे सिवनी अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टरों का लंच चल रहा था। 2 बजे तक कोई सुनवाई नहीं हुई। दर्द से तड़पती पूजा जब वॉशरूम गई तो वहीं एक बच्चे का जन्म हो गया। बाद में लेबर रूम में दूसरा बच्चा हुआ। एसएनसीयू में भर्ती होने के कुछ घंटों में दोनों बच्चों की मौत हो गई। केस 3 : गरीबी के कारण सोनोग्राफी नहीं, जुड़वां बच्चों की मौत जामुन टोला की प्रियंका कुसाम ने सातवें महीने में जुड़वां बच्चों को जन्म दिया, जिन्हें बचाया नहीं जा सका। आशा कार्यकर्ता बबीता ठाकरे ने माना कि प्रियंका के पास पैसे नहीं होने के कारण गर्भावस्था के शुरुआती 6 महीनों में सोनोग्राफी ही नहीं हो सकी थी। प्रियंका को ‘प्रधानमंत्री मातृ वंदन योजना’ का पोषण भत्ता भी नहीं मिला। अफसरों की दलील- 1000 से ज्यादा बच्चे बचाए भी तो हैं सिविल सर्जन डॉ. विनोद नवकर और CMHO डॉ. पंकज दुबे का कहना है कि 80 में से 58 बच्चे प्री-मेच्योर (समय से पूर्व जन्मे) थे। इनमें से 18 बच्चों का वजन तो 1 किलो से भी कम था। डॉ. नवकर ने कहा- एसएनसीयू में केवल गंभीर बच्चे आते हैं। 10-12 मौतें प्रति माह होना स्वाभाविक है। हमें खुश होना चाहिए कि हमने 1,000 से ज्यादा बच्चों की जान बचाई है। वहीं CMHO डॉ. दुबे ने 8% के आसपास की मौतों को WHO मानकों के तहत नॉर्मल बताया। एक्सपर्ट्स ने खोली पोल: 16 साल पुराने मानकों में भी 6% की ही लिमिट थी अफसरों के इन तर्कों को एनएचएम (NHM) के पूर्व डिप्टी डायरेक्टर व रिटायर्ड CMHO डॉ. पंकज शुक्ला ने सिरे से खारिज कर दिया। डॉ. शुक्ला ने बताया- 2010 में यूनिसेफ और WHO के सहयोग से जब एसएनसीयू की गाइड लाइंस बनी थीं, तब मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य सुविधाएं बेहद खराब थीं। उस समय मौतों की अधिकतम सीमा 6% तय की गई थी। वहीं शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. वंदना प्रसाद ने कहा- सरकारी अफसर यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं भाग सकते कि गंभीर बच्चे आए थे। शिशु मृत्यु दर में एमपी दूसरे स्थान पर भारत सरकार की सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम सांख्यिकीय रिपोर्ट 2024 के मुताबिक, मध्य प्रदेश में जन्म लेने वाले 1000 बच्चों में 35 बच्चे अपना पहला जन्मदिन ही नहीं मना पाते। शिशु मृत्यु दर के मामले में मध्य प्रदेश देश में दूसरे स्थान पर हैं। मध्य प्रदेश में 28 बच्चों की मौत शुरुआत के 28 दिनों के अंदर ही हो जाती है। हालांकि, 5 साल में इन आंकड़ों में 11 अंकों का सुधार हुआ है, लेकिन इसके बाद भी मध्य प्रदेश राष्ट्रीय औसत से 11 अंक पीछे हैं।
