महंगी दवा बेचने वाली कंपनियों से सराकर को ₹8,447.4 करोड़ बसूलना बाकी है। राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) ने 10,029.8 करोड़ देने का आदेश दिया था। हालांकि, अब तक सिर्फ 1,582.4 करोड़ ही मिले हैं। यानी 84% राशि बकाया है। इसमें में से 5,800 करोड़ रुपए से ज्यादा रकम कानूनी विवादों में फंसी है। करीब 200 करोड़ रुपए की वसूली के मामले जिलाधिकारियों को भेजे गए हैं। ₹2,369.3 करोड़ की वसूली की प्रक्रिया जारी है। एनपीपीए दवाओं की कीमतों पर नजर रखने वाली सरकारी संस्था है। यह जरूरी दवाओं की अधिकतम कीमत तय करती है। अगर कोई कंपनी तय कीमत से ज्यादा पैसे लेती है, तो प्राधिकरण अतिरिक्त रकम ब्याज सहित देने का निर्देश देता है। ग्रामीण क्षेत्रों में कुल इलाज के खर्च का 19% हिस्सा दवाओं पर खर्च होता है। भास्कर इनसाइट मरीजों को पैसा लौटाने की व्यवस्था क्यों नहीं? सरकार दवा कंपनियों से तय कीमत से ज्यादा वसूली गई रकम मांगती है, पर जिन मरीजों ने महंगी दवाएं खरीदीं, उन्हें पैसा लौटाने का प्रावधान नहीं है। ऐसे में सवाल है कि जब मरीजों की जेब से ज्यादा पैसे गए, तो उन्हें वापस दिलाने का इंतजाम क्यों नहीं है? अस्पताल में खर्च का बड़ा हिस्सा दवाओं पर अस्पताल में भर्ती होने पर खर्च में दवाओं की बड़ी हिस्सेदारी रहती है। ग्रामीण क्षेत्रों में कुल इलाज के खर्च का 19% हिस्सा दवाओं पर खर्च होता है। इसके मुकाबले, शहरी क्षेत्रों के चिकित्सा संस्थानों में दवाओं की यह हिस्सेदारी 15% दर्ज की गई है।
