खेत में निकलने वाला कचरा ही जब खाद और दवा का विकल्प बन जाए तो खेती की तस्वीर बदल जाती है। मंदसौर अंचल के रीछालाल मूहां गांव के रहने वाले प्रगतिशील किसान विनोद शिवराम पाटीदार ने ‘वेस्ट टू बेस्ट’ की इसी सोच को अपनाते हुए सब्जियों के छिलके, खराब फलों और जैविक अपशिष्ट से बायो वेस्ट डिकंपोजर तैयार कर लागत आधी कर दी। तीन बीघा जमीन में ओपन फार्म पद्धति से शिमला मिर्च सहित विभिन्न सब्जियों की खेती कर वे हर साल 10 लाख रुपए से अधिक का उत्पादन मूल्य प्राप्त कर रहे हैं। उनका कहना है कि यदि वैज्ञानिक प्रबंधन और जैविक विकल्पों पर ध्यान दिया जाए तो कम जमीन में भी सब्जी खेती बेहद लाभकारी बन सकती है। 7 हजार शिमला मिर्च के पौधे लगाए विनोद पाटीदार ने खेत में करीब 7 हजार शिमला मिर्च के पौधे लगा रखे हैं। सब्जी उत्पादन में सबसे बड़ी चुनौती रोग नियंत्रण की होती है, जिस पर रासायनिक दवाइयों का भारी खर्च आता है। वे बताते हैं कि पहले केवल शिमला मिर्च की फसल पर ही लगभग 2 लाख रुपए तक लागत आ जाती थी, जिसमें उर्वरक और दवाइयों का खर्च ज्यादा होता था। इसी दौरान उन्होंने तय किया कि खेत और घर से निकलने वाले जैविक कचरे का बेहतर उपयोग किया जाए। सब्जियों के छिलके, खराब फल और अन्य अपशिष्ट को एकत्र कर बायो वेस्ट डिकंपोजर बैग इंस्टाल किया। इस प्रक्रिया से तैयार घोल और खाद का उपयोग फसल में किया जाने लगा। लागत घटकर एक लाख रुपए रह गई परिणाम यह हुआ कि रासायनिक खाद और दवाइयों पर निर्भरता कम हो गई। अब कुल लागत घटकर लगभग 1 लाख रुपए रह गई है, जिसमें सिंचाई, बीज और अन्य आवश्यक खर्च शामिल हैं। यानी सीधे 50 प्रतिशत तक लागत में कमी आई। उत्पादन पर भी सकारात्मक असर पड़ा। बाजार में उचित दाम मिलने पर यह फसल 10 लाख रुपए तक का मूल्य दे देती है। किसान विनोद पाटीदार का कहना है कि हर किसान यदि एक गाय भी रखे तो उससे मिलने वाले गोबर और गोमूत्र के माध्यम से जैविक घोल, खाद और डिकंपोजर तैयार किए जा सकते हैं। इससे मिट्टी की सेहत सुधरती है और लागत घटती है।
