5 सितंबर को आबकारी विभाग ने अपनी जांच रिपोर्ट में लिखा- शराब पीने लायक है, कोई खतरा नहीं। अगले ही दिन, 6 सितंबर की सुबह, सागर के बंडा इलाके में उसी शराब को पीकर लोग एक-एक कर गिरने लगे। कोई घर पर मरा, कोई अस्पताल ले जाते वक्त रास्ते में। कई मरीजों के शरीर नीले पड़ गए, कइयों की आंखों की रोशनी चली गई। ताजा प्रशासनिक आंकड़ों के मुताबिक अब तक 22 लोगों की मौत हो चुकी है और 112 से ज्यादा मरीज अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती हैं, आंकड़ा अभी और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। आखिर सागर में क्या घटित हुआ, मेथेनॉल पॉइजनिंग किसे कहते हैं, यह शरीर में क्या करता है और इस हादसे के लिए जिम्मेदार कौन है; मध्य प्रदेश एक्सप्लेनर में पूरी कहानी… सवाल 1: सागर में हुआ क्या, शराब पीने के बाद लोगों की मौत कैसे हुई? जवाब: पूरा घटनाक्रम तीन तारीखों के जरिए समझते हैं… 2 सितंबर (चेतावनी): राठौर डिस्टलरी के संचालक शुवेंद्र सिंह राठौर ने आबकारी विभाग में लिखित शिकायत दी कि इलाके में ‘सागर गोल्ड’ और ‘बॉम्बे व्हिस्की’ ब्रांड की नकली कॉपी बेची जा रही है। 5 सितंबर (क्लीनचिट): आबकारी विभाग ने जांच रिपोर्ट में इसी शराब को ‘पीने योग्य’ बता दिया। 6 सितंबर (मौतें): अगले दिन सुबह करीब 4:30 बजे बंडा क्षेत्र के नौराज, गूगरा खुर्द, पाटन, छापरी और बमूरा भेड़ा जैसे गांवों से बीमार पड़ने की खबरें आने लगीं। शनिवार रात शराब पीने वालों में रविवार सुबह उल्टी, सिरदर्द, धुंधलापन और बदन में अकड़न के लक्षण दिखे। बाद में दर्ज FIR में वही ‘बॉम्बे व्हिस्की’ और सागर गोल्ड जैसा नाम सामने आया। विभाग ने एक दिन पहले सुरक्षित बता चुका था। बमुराबेड़ा के रामकुमार दांगी के मुताबिक उनके गांव में साथ शराब पीने वाले तीन लोगों की तबीयत आधे घंटे में इतनी बिगड़ी कि मौत हो गई। पोस्टमार्टम में मृतकों में बड़ी मात्रा में मेथेनॉल की पुष्टि हुई है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार और कुछ ग्रामीणों का दावा है कि 2020 की एक्सपायर्ड बोतलों पर 2026 की तारीख डालकर बेचा गया, यानी मेथेनॉल मिलावट के अलावा एक्सपायरी बदलने का फ्रॉड भी इसमें शामिल हो सकता है। सवाल 2: आखिर जहरीली शराब कहते किसे हैं? क्या होता है मेथेनॉल पॉइजनिंग?
जवाब: शराब में नशा एक ही चीज से आता है, अल्कोहल। लेकिन अल्कोहल भी एक जैसा नहीं होता, दो तरह के अल्कोहल हैं, एक शरीर के लिए, दूसरा फैक्ट्री के लिए। पीने वाला अल्कोहल- एथेनॉल: हर वैध शराब में यही होता है। शरीर इसे धीरे-धीरे तोड़ना जानता है, इसीलिए यह जानलेवा नहीं होता। जहर वाला अल्कोहल- मेथेनॉल: यह पीने के लिए बना ही नहीं है, यही केमिकल पेंट थिनर, वाइपर फ्लूइड और फर्नीचर पॉलिश में इस्तेमाल होता है। देखने, सूंघने और चखने में यह एथेनॉल से मुश्किल से अलग पहचाना जा सकता है। सवाल-3: मेथेनॉल शरीर में जाने के बाद क्या करता है, और इससे मौत कैसे होती है? जवाब: मेथेनॉल पीते ही जहर का काम नहीं करता- असली खतरा तब शुरू होता है जब शरीर उसे पचाने बैठता है। भोपाल के किडनी रोग विशेषज्ञ डॉ. संजय गुप्ता इसे लिवर का एक कन्फ्यूजन बताते हैं- लिवर मेथेनॉल को असली शराब (एथेनॉल) समझकर उसी तरह तोड़ने लगता है, और यही गलती जहर बना देती है। इसे चार स्टेप में समझिए… 1. शरीर के अंदर ही तेजाब बनना: लिवर मेथेनॉल को तोड़कर पहले फॉर्मेल्डिहाइड (शव सुरक्षित रखने वाला वही केमिकल) और फिर फॉर्मिक एसिड बना देता है- एक तेज तेजाब। डॉ. गुप्ता के मुताबिक, मेथेनॉल की थोड़ी मात्रा भी यह जहर बनाने के लिए काफी है। 2. खून खट्टा होना (मेटाबॉलिक एसिडोसिस): यह एसिड खून में घुलकर उसे बेहद तेजाबी बना देता है- यानी शरीर का पूरा अंदरूनी संतुलन बिगड़ जाता है। इससे सांस धीमी पड़ती है, बीपी गिरता है, दिल पर दबाव बढ़ता है। यही वजह है कि नशे में सोया व्यक्ति अक्सर सुबह मृत मिलता है। 3. आंखों की नस जलना: फॉर्मिक एसिड सीधे ऑप्टिक नर्व (आंख से दिमाग तक तस्वीर पहुंचाने वाली नस) पर हमला करता है। असर एक-आध घंटे में दिख सकता है- पहले धुंधलापन, फिर पूरी रोशनी जाने तक। 4. शरीर नीला पड़ना: खून ज्यादा तेजाबी होने पर अंगों तक ऑक्सीजन पहुंचनी बंद हो जाती है (हाइपोक्सिया)। इससे त्वचा नीली पड़ने लगती है (सायनोसिस)- यानी सांस लगभग रुकने के करीब पहुंच चुकी है। ऐसा ही सागर में पीड़ितों के साथ हुआ। कब दिखता है असर: आमतौर पर 12-24 घंटे लगते हैं, इसलिए पीने के तुरंत बाद इंसान सामान्य महसूस करता है और किसी को शक नहीं होता। ज्यादा मिलावट में यह मिनटों में भी हो सकता है, जैसा बमुराबेड़ा में हुआ, जहां तीन लोगों की जान आधे घंटे में गई। इलाज मुमकिन है, समय पर मिले तो: सबसे भरोसेमंद तरीका डायलिसिस है, जिससे जहर सीधे खून से निकाला जाता है। दूसरा तरीका शुद्ध एथेनॉल या ‘फोमेपिजोल’ इंजेक्शन (करीब 10,000 रुपए का) देना है, जो लिवर को उलझाए रखता है ताकि वह मेथेनॉल को जहर बनाने से पहले असली शराब में लग जाए। फोमेपिजोल 2013 से WHO की जरूरी दवाओं की सूची में शामिल है, यानी यह प्रयोगात्मक नहीं, मान्य इलाज है। फिलहाल भर्ती 112 मरीजों पर डॉ. गुप्ता की सलाह है कि उन्हें तुरंत डायलिसिस पर लिया जाए, जरूरत हो तो जबलपुर-भोपाल शिफ्ट करें, और सरकार दिल्ली-मुंबई से फौरन फोमेपिजोल मंगवाए। उनके मुताबिक हर घंटा कीमती है- जितनी देर, जहर उतना बढ़ेगा। सवाल 4: शराब जहरीली है या नहीं, यह पता कैसे चलेगा? क्या बोतल देखकर पहचान संभव है? जवाब: नहीं। मेथेनॉल मिला है या नहीं, इसे सिर्फ बोतल देखकर, सूंघकर या चखकर पता नहीं लगाया जा सकता। इसकी पुष्टि जांच से ही होती है। 1. सिर्फ बोतल देखकर भरोसा न करें
शराब का रंग, गंध या स्वाद सामान्य लग सकता है, फिर भी उसमें जहरीला रसायन मिला हो सकता है। इसलिए घर पर इसे चखकर या सूंघकर जांचने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। 2. कुछ संकेत खतरे की ओर इशारा कर सकते हैं
सागर के मामले में जिस शराब की शिकायत सामने आई, वह सामान्य कीमत से 20 रुपए सस्ती बताई गई। ऐसे मामलों में असामान्य रूप से कम कीमत, खुली शराब या संदिग्ध तरीके से सील की गई बोतल जोखिम के संकेत हो सकते हैं। लेकिन इनमें से कोई भी चीज अपने-आप यह साबित नहीं करती कि शराब में मेथेनॉल है। 3. सागर के मामले में खुली बिक्री भी जांच का हिस्सा है
FIR के मुताबिक, शराब का एक क्वार्टर 70 रुपए में खरीदा गया था और उसे सामान्य कीमत से सस्ता बताया गया। इसलिए यहां सवाल सिर्फ शराब में मिलावट का नहीं, बल्कि वह शराब कहां से आई और किस नेटवर्क के जरिए बेची गई, इसका भी है। 4. पीने के बाद लक्षण दिखें तो इंतजार न करें
उल्टी, सिरदर्द, चक्कर, धुंधला दिखना, कमजोरी या सांस लेने में परेशानी जैसे लक्षण दिखाई दें तो इसे सामान्य नशा मानकर सोने या घर पर इलाज करने के बजाय तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए। सवाल 5: सागर में इस हादसे के लिए कौन-कौन जिम्मेदार हैं, किसकी क्या जिम्मेदारी थी? जवाब: इस पूरी घटना को एक सप्लाई चेन की तरह देखिए, जो ललितपुर से चलकर सागर के गांवों तक पहुंची। इस चेन को बीच में रोकने के कम से कम 4 मौके थे, और हर मौके पर जिस अधिकारी को रोकना था, उसने नहीं रोका। पहला मौका- राज्य की सीमा पर, फ्लाइंग स्क्वाड और आबकारी विभाग चूके मई 2026 की ललितपुर FIR में सागर के तीन ढाबों का नाम सप्लाई पॉइंट के तौर पर पहले से दर्ज था, यहां तक कि आरोपियों के फर्जी नंबर प्लेट बदलने के तरीके का भी जिक्र था, फिर भी सागर में इस सुराग पर कोई अतिरिक्त निगरानी नहीं बिठाई गई। इसी लापरवाही में संभागीय फ्लाइंग स्क्वाड प्रभारी नीरजा श्रीवास्तव को अब ग्वालियर मुख्यालय अटैच किया गया है। दूसरा मौका- गांव के स्तर पर, लोकल पुलिस चूकी ग्रामीणों के मुताबिक नौराज पंचायत के ततरवारा गांव में लंबे समय से अवैध शराब बनती और सप्लाई होती थी, स्थानीय पुलिस कार्रवाई से बचती रही। इसी वजह से गूगरा चौकी प्रभारी सब-इंस्पेक्टर पूरन लाल लाडिया और बंडा थाना प्रभारी राजेंद्र सिंह कुशवाहा सस्पेंड किए गए हैं। बंडा SDM आरती यादव को कलेक्ट्रेट कार्यालय सागर में पदस्थ कर दिया गया है, उनकी जगह डिप्टी कलेक्टर संजय कुमार जैन को प्रभार सौंपा गया है। तीसरा मौका- सीधी शिकायत के बावजूद, चूका जिला आबकारी अमला 2 सितंबर की शिकायत जिला आबकारी अधिकारी और सहायक आबकारी आयुक्त के दायरे में आती थी, जांच हुई तो जरूर, पर महज तीन दिन में। सहायक आबकारी आयुक्त कीर्ति दुबे, जिला आबकारी अधिकारी दिलीप खंडाते और बंडा आबकारी उप निरीक्षक रोशनी उरेती सस्पेंड किए गए हैं। चौथा और सबसे बड़ा मौका- खुद अपनी रिपोर्ट में चूक सबसे भारी पड़ी 5 सितंबर को सरकारी विदेशी मदिरा भंडार की प्रभारी अधिकारी मंजूषा सोनी ने शिकायत के आधार पर जांच रिपोर्ट तैयार की और शराब को ‘पीने योग्य’ बताया। अगले ही दिन बंडा क्षेत्र में इसी ब्रांड की शराब पीने के बाद लोगों के बीमार पड़ने और मौतों की खबरें सामने आईं। मैदानी अफसरों पर तुरंत गाज गिरी, 5 अफसर सस्पेंड हुए, 30 से ज्यादा नामजद आरोपियों पर FIR दर्ज हुई, 14 गिरफ्तार हो चुके हैं, लाइसेंसी ठेकेदार सिद्धार्थ कुशवाहा व यशवंत ठाकुर भी आरोपियों में शामिल हैं। मध्य प्रदेश एक्सप्लेनर का ये एपिसोड भी पढ़िए… कौन है ‘बिट्टू तबाही’, जिसका मुरीद हुआ सोशल मीडिया:महिंद्रा से लेकर पूर्व क्रिकेटर केविन पीटरसन ने की तारीफ भोपाल से 119 किलोमीटर दूर ब्यावरा का एक 21 साल का लड़का इन दिनों देश-दुनिया में चर्चा में है। तैरना तक नहीं आता, फिर भी अकेले दम पर एक प्रदूषित नदी में उतर गया। लोग मजाक उड़ाते रहे, लेकिन वह हर दिन कचरा निकालता रहा। उद्योगपति आनंद महिंद्रा से लेकर मुख्यमंत्री तक, कई बड़े नाम उसकी तारीफ कर चुके हैं….पूरा एक्सप्लेनर पढ़िए।
