छत्तीसगढ़ के राजकीय पशु वन भैंसे का कुनबा बढ़ाने की उम्मीद अब ‘छोटू’ पर टिकी है। उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में मौजूद इस अकेले नर वन भैंसे के लिए असम से 3 मादा वन भैंसे लाने की तैयारी है। राज्य में वन भैंसों की घटती संख्या के बीच वन विभाग को उम्मीद है कि ‘छोटू’ के साथ प्राकृतिक प्रजनन से एक बार फिर वन भैंसों का कुनबा बढ़ सकेगा। उदंती में फिलहाल यही एकमात्र नर वन भैंसा बचा है और उसकी उम्र भी बढ़ रही है। ऐसे में उसके लिए मादा वन भैंसें लाना जरूरी है। विभाग अब असम से तीन मादाओं को लाकर पहले उनकी निगरानी और देखभाल करेगा, इसके बाद अनुकूल माहौल में प्राकृतिक प्रजनन की कोशिश की जाएगी। मकसद यहां वन भैंसों की नई पीढ़ी तैयार करना है। वन विभाग की योजना सिर्फ उदंती तक सीमित नहीं है। पामेड़ वन्यजीव अभयारण्य और इंद्रावती टाइगर रिजर्व में भी असम से वन भैंसे लाकर उनकी संख्या बढ़ाने की तैयारी है। इसके लिए जल्द ही केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा जाएगा। अधिकारियों का मानना है कि असम से स्वस्थ वन भैंसों को लाकर उन्हें छत्तीसगढ़ के अनुकूल माहौल में रखा जाए तो धीरे-धीरे इनकी आबादी को प्राकृतिक तरीके से बढ़ाया जा सकता है। बारनवापारा मॉडल, उदंती में दोहराया जाएगा असम से वन भैंसे लाकर उनकी संख्या बढ़ाने का प्रयोग छत्तीसगढ़ में पहले ही सफल हो चुका है। बारनवापारा वन्यजीव अभयारण्य में असम से वन भैंसों को लाकर संरक्षण और प्रजनन की कोशिश की गई थी। 2020 में एक नर और एक मादा वन भैंसा यहां लाया गया। इसके बाद 2023 में चार मादा वन भैंसों को और लाया गया। इन प्रयासों के बाद बरनवापारा में वन भैंसों की संख्या बढ़कर 11 हो गई है। वन विभाग अब इसी सफल मॉडल को उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व, पामेड़ वन्यजीव अभयारण्य और इंद्रावती टाइगर रिजर्व में दोहराने की तैयारी कर रहा है। अधिकारियों का मानना है कि असम से स्वस्थ वन भैंसों को लाकर उन्हें अनुकूल वातावरण देने और वैज्ञानिक निगरानी के साथ प्रजनन का मौका देने से छत्तीसगढ़ में इनकी घटती आबादी को फिर बढ़ाया जा सकता है। बरनवापारा में मिली सफलता इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां बाहर से वन भैंसे लाने के बाद उनकी आबादी को बनाए रखने और बढ़ाने में विभाग को कामयाबी मिली है। अब इसी अनुभव के आधार पर उदंती में मौजूद अकेले नर वन भैंसे के लिए असम से तीन मादा वन भैंसे लाने की योजना बनाई गई है। विभाग की कोशिश है कि प्राकृतिक प्रजनन के जरिए उदंती में भी वन भैंसों का नया कुनबा तैयार हो। कभी 6 राज्यों में थे, अब दो राज्यों तक सिमटे वन भैंसा कभी मध्य भारत के बड़े हिस्से में पाया जाता था। छत्तीसगढ़ के अलावा महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, ओडिशा, झारखंड और तेलंगाना तक इसकी मौजूदगी थी। अब स्थिति बदल गई है। मध्य भारत में वन भैंसे मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के कुछ इलाकों में ही छोटी-छोटी आबादी में बचे हैं। वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया की 2005 की रिपोर्ट में बीजापुर जिले के उदंती-सीतानदी, इंद्रावती और पामेड़ इलाके में 39 से 47 वन भैंसे होने की जानकारी दी गई थी। अधिकारियों के अनुमान के मुताबिक अब इनकी संख्या घटकर महज 12 से 16 के बीच रह गई है। यानी करीब दो दशक में इनकी संख्या में बड़ी गिरावट आई है। वन भैंसे को भारत में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-1 के तहत सबसे उच्च स्तर की कानूनी सुरक्षा मिली हुई है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसकी स्थिति चिंताजनक है। 2016 की IUCN रेड लिस्ट में इसे ‘एंडेंजर्ड’ यानी लुप्तप्राय श्रेणी में रखा गया है। असम में हजारों, छत्तीसगढ़ में दर्जनभर असम और छत्तीसगढ़ की आबादी का अंतर इस संकट को और स्पष्ट करता है। दुनिया में वन्य जल भैंसों की कुल संख्या करीब 3,500 से 3,700 मानी जाती है। इनमें 90 फीसदी से ज्यादा भारत में हैं। भारत में भी सबसे बड़ी आबादी असम में है, जहां करीब 3,000 से 3,500 वन भैंसे पाए जाते हैं। इसके मुकाबले छत्तीसगढ़ में इनकी संख्या बेहद कम रह गई है। यही वजह है कि विभाग अब असम को वन भैंसों की आबादी बढ़ाने के लिए संभावित स्रोत के तौर पर देख रहा है। वहां बड़ी और अपेक्षाकृत स्थिर आबादी होने के कारण स्वस्थ वन भैंसों को वैज्ञानिक तरीके से छत्तीसगढ़ लाने की योजना बनाई गई है। उदंती के अकेले नर के लिए असम से आएंगी 3 मादाएं उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में फिलहाल एक नर वन भैंसा है। उसकी बढ़ती उम्र को देखते हुए अधिकारियों के सामने समय कम है। अगर यहां मादा वन भैंसें नहीं पहुंचीं तो प्राकृतिक प्रजनन की संभावना और मुश्किल होती जाएगी। इसी को देखते हुए विभाग असम से तीन मादा वन भैंसों को उदंती लाने की योजना बना रहा है। शुरुआत में इन्हें सुरक्षित enclosure (घेरा) में रखा जाएगा। इनके भोजन, स्वास्थ्य और व्यवहार की निगरानी के लिए डॉक्टरों और प्रशिक्षित कर्मचारियों की टीम तैनात रहेगी। कोशिश होगी कि वन भैंसों को इंसानी गतिविधियों से कम से कम संपर्क में रखा जाए। इनकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए रेडियो कॉलर लगाए जाएंगे। इससे वन विभाग यह पता लगा सकेगा कि जानवर किस इलाके में जा रहे हैं, उनका व्यवहार कैसा है और वे अपने नए वातावरण में किस तरह ढल रहे हैं। उदंती के कोर एरिया में आने वाले 17 गांवों ने वन भैंसों को छोड़े जाने के लिए सहमति दी है। यानी विभाग ने सिर्फ जंगल के स्तर पर ही नहीं, बल्कि आसपास के गांवों को भी इस संरक्षण योजना से जोड़ने की कोशिश की है। करीब 26 साल का हो चुका है छोटू उदंती-सीतानदी का नर वन भैंसा ‘छोटू’ अब करीब 26 साल का बताया जा रहा है। बढ़ती उम्र के बावजूद वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया (WTI) के वैज्ञानिकों ने उसकी जांच कर उसे प्रजनन के लिए फिट पाया है। उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के उप निदेशक वरुण जैन ने दैनिक भास्कर को बताया कि उदंती-सीतानदी का इलाका पहले नक्सल प्रभावित रहा है। इसी वजह से असम से लाए गए वन भैंसों को बारनवापारा में रखा गया था। उस समय प्लान था कि जैसे ही यहां के हालात सुधरेंगे, इन्हें उदंती-सीतानदी में शिफ्ट किया जाएगा। असम से 6 वन भैंसे लाए गए थे और अब बारनवापारा में इनकी संख्या बढ़कर 12 हो गई है। अब असम से 3 मादा वन भैंसे लाकर उदंती-सीतानदी में प्राकृतिक तरीके से इनका कुनबा बढ़ाने की कोशिश होगी। प्राकृतिक ब्रीडिंग नहीं हुई तो कृत्रिम गर्भाधान विभाग की पहली कोशिश प्राकृतिक तरीके से प्रजनन कराने की होगी। इसके लिए नर और मादा वन भैंसों को अनुकूल वातावरण दिया जाएगा। लेकिन अगर यह प्रयास सफल नहीं हुआ तो विभाग कृत्रिम गर्भाधान का सहारा लेने की तैयारी में है। यानी योजना सिर्फ वन भैंसों को दूसरे राज्य से लाकर छोड़ देने तक सीमित नहीं है। उनकी ब्रीडिंग, स्वास्थ्य, मूवमेंट और जेनरिक मैनेजमेंट तक पूरी प्रक्रिया की निगरानी की जाएगी। 2015 में क्लोनिंग से उम्मीद, ‘दीपाशा’ का प्रयोग नहीं हुआ सफल वन भैंसों की घटती संख्या के बीच वन विभाग ने 2015 में क्लोनिंग के जरिए आबादी बढ़ाने की कोशिश की थी। इसके तहत क्लोन की गई मादा वन भैंस ‘दीपाशा’ को तैयार किया गया था। विभाग को उम्मीद थी कि इसके जरिए वन भैंसों की संख्या बढ़ाने में मदद मिलेगी। हालांकि यह प्रयोग सफल नहीं हो सका और बाद में इसे बंद कर दिया गया। दीपाशा को उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में रखा गया था। अब उसे उदंती-सीतानदी से बाहर कर दिया गया है। यानी वन भैंसों की आबादी बढ़ाने के लिए क्लोनिंग के जरिए किया गया यह प्रयोग आगे नहीं बढ़ सका। अब वन विभाग ने असम से वन भैंसे लाकर प्राकृतिक प्रजनन के जरिए आबादी बढ़ाने की योजना पर जोर दिया है। उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व कहां है? उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व छत्तीसगढ़ के गरियाबंद और धमतरी जिलों में स्थित है। करीब 1,842 वर्ग किमी में फैला यह टाइगर रिजर्व राज्य के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में है। यह वनभैंसा संरक्षण के प्रमुख क्षेत्रों में शामिल है। ………………… इससे जुड़ी खबर भी पढ़ें… भाई-बहन को मारकर शवों को नोचता रहा भालू, LIVE VIDEO: कांकेर में खेत में काम करते समय किया हमला, 3 की मौत, 1 गंभीर छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में एक मादा भालू ने हमला कर भाई और बहन की जान ले ली। मारने के बाद वह उनके शवों को नोचती रही, जिसका लाइव वीडियो भी सामने आया है। हमले में एक ग्रामीण गंभीर रूप से घायल हुआ है, जिसे रायपुर रेफर किया गया है। घटना नरहरपुर वन परिक्षेत्र के लारगांव मरकाटोला गांव की है। पढ़ें पूरी खबर…
