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मानसून के पहले हफ्ते में बिजली गिरने से 17 मौतें:एमपी में सबसे ज्यादा क्यों गिरती है आसमानी बिजली, जानिए इसके पीछे के 4 कारण

मानसून की शुरुआत के साथ मध्य प्रदेश में आकाशीय बिजली का खतरा बढ़ गया है। इस साल पहले ही सप्ताह में छिंदवाड़ा, शहडोल, खंडवा, सीहोर, मंदसौर और रायसेन समेत कई जिलों में बिजली गिरने से 17 से ज्यादा लोगों और कई मवेशियों की मौत हो चुकी है, जबकि 13 लोग गंभीर रूप से झुलस गए हैं। आंकड़े बताते हैं कि आकाशीय बिजली से सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में मध्य प्रदेश प्रमुख है। यहां हर साल औसतन 500 लोगों की मौत होती है। संडे स्टोरी में जानिए कि प्रदेश में बिजली गिरने की घटनाएं अधिक क्यों होती हैं और इसके पीछे कौन-से भौगोलिक व वैज्ञानिक कारण जिम्मेदार हैं। बिजली गिरने की सबसे ज्यादा घटनाएं मध्यप्रदेश में क्यों… मौसम वैज्ञानिकअरुण शर्मा के मुताबिक, मध्य प्रदेश में आकाशीय बिजली की घटनाएं अधिक होने के पीछे प्राकृतिक, भौगोलिक और मौसमी कारकों की मिलीजुली भूमिका है। 1. दो दिशाओं से आने वाले मानसून का संयुक्त प्रभाव मध्य प्रदेश उन चुनिंदा राज्यों में है, जहां अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनों से आने वाली मानसूनी हवाएं सक्रिय रहती हैं। इन नमी से भरी हवाओं के टकराने से वायुमंडल में अस्थिरता बढ़ती है। सतह की गर्म हवा और नमी मिलकर ऊंचे क्यूम्यूलोनिंबस बादल बनाती हैं, जिनमें अधिक विद्युत आवेश पैदा होता है और यही आकाशीय बिजली का प्रमुख कारण बनता है। 2. भौगोलिक स्थिति और अधिक तापमान देश के मध्य में स्थित होने के कारण गर्मियों में मध्य प्रदेश का तापमान कई बार 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। मानसून की ठंडी और नम हवाएं गर्म सतह से टकराकर गर्म हवा को तेजी से ऊपर उठाती हैं। इससे गरज-चमक वाले बादलों का निर्माण तेज होता है और बिजली गिरने की संभावना बढ़ जाती है। 3. प्री-मानसून और मानसून में तीव्र संवहन अप्रैल से सितंबर के बीच भीषण गर्मी और हवा में नमी के कारण संवहन (कन्वेक्शन) की प्रक्रिया तेज रहती है। हवा के तेजी से ऊपर उठने और ठंडा होने से गरज-चमक वाले बादल बनते हैं, जिससे बिजली गिरने की घटनाएं बढ़ जाती हैं। 4. विंध्य, सतपुड़ा और मालवा क्षेत्र की भौगोलिक भूमिका विंध्य और सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाएं तथा मालवा का पठारी क्षेत्र नमी से भरी मानसूनी हवाओं को ऊपर उठने के लिए बाध्य करते हैं। इससे ऊंचे बादलों का निर्माण होता है, जिनमें तेजी से विद्युत आवेश विकसित होता है और आकाशीय बिजली गिरने की संभावना बढ़ जाती है। जलवायु परिवर्तन से बढ़ रहा है आकाशीय बिजली का खतरा वैज्ञानिकों के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के कारण गरज-चमक वाले बादलों की तीव्रता बढ़ रही है। बढ़ते तापमान के चलते मध्य भारत में भविष्य में आकाशीय बिजली गिरने की घटनाएं और बढ़ सकती है। किसानों पर सबसे अधिक खतरा क्यों? मध्य प्रदेश में आकाशीय बिजली से होने वाली अधिकांश मौतें क्लाउड-टू-ग्राउंड बिजली के कारण होती हैं। प्रदेश की बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है, इसलिए बारिश के दौरान किसान खुले खेतों में काम करते हैं। अचानक बारिश होने पर वे अक्सर अकेले खड़े पेड़ों के नीचे शरण लेते हैं। ऊंचे पेड़ों पर बिजली गिरने की संभावना अधिक होने से उनके नीचे खड़े लोगों के प्रभावित होने का खतरा बढ़ जाता है। कैसे पहचानें कि आकाशीय बिजली गिरने की आशंका है? मौसम वैज्ञानिक अरुण शर्मा के अनुसार, कुछ प्राकृतिक संकेतों की पहचान कर समय रहते सुरक्षित स्थान पर पहुंचा जा सकता है।
सिवनी, ग्वालियर सहित 8 जिले सबसे ज्यादा प्रभावित लाइटनिंग स्ट्राइक से सबसे ज्यादा 8 जिले प्रभावित हैं इनमे देवास, विदिशा, सीहोर, पन्ना, सिवनी,सिंगरौली,ग्वालियर ओर इंदौर शामिल हैं। प्रदेश के 20 जिले संवेदनशील ओर 8 जिले अतिसंवेदनशील क्षेत्र मे आते हैं। मौसम विभाग एसएमएस से जारी करता है अलर्ट मौसम विभाग लोगों तक सीधे जानकारी पहुंचाता है कि किस लोकेशन पर कहां बिजली गिरने वाली है। इसके अलावा मौसम विभाग के दामिनी, मेघदूत और मौसम ये तीन मोबाइल ऐप है जो अलर्ट जारी करते हैं। साथ ही सीएपीए सचेत प्लेटफॉर्म के जरिए भी मौसम विभाग लोगों तक सीधे सूचनाएं पहुंचाता है। मौसम विभाग के मुताबिक बारिश के दिनों में बिजली गिरने की घटनाएं दोपहर 2 बजे से शाम 6 बजे के बीच होती है। ऐसे में जो लोग खुले में काम करते हैं उन्हें इस समय ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है और खास तौर पर उस जगह पर जहां मौसम विभाग बिजली गिरने या बादलों की गड़गड़ाहट की संभावना जताता है।

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