‘गांव वाले पिताजी से कहते कि तेरा ये लंगड़ा लड़का खुद तो किसी काम का नहीं है, हमारे बच्चों को भी बिगाड़ रहा है। पिताजी मुझे डांटते, घर से बाहर जाने के लिए मना करते।’ यह कहना है बाएं पैर से दिव्यांग लोकेंद्र आर्य का। उनका सिलेक्शन दिव्यांग क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ऑफ इंडिया (DCCBI) की इंडिया-ए टीम में हुआ है। वह 13 से 15 जून तक हरियाणा के यमुनानगर में होने वाले केसरी दिव्यांग टूर्नामेंट-2026 में इंडिया-ए की ओर से मैदान में उतरेंगे। सिलेक्शन के बाद लोग बधाई देने घर आ रहे हैं। मिठाई खिला कर फूल माला पहनाकर स्वागत कर रहे हैं। पिता रूमा आर्य पेशे से किसान हैं। दैनिक भास्कर की टीम बड़वानी जिले में सेंधवा के मोरदड़ गांव पहुंची। यहां लोकेंद्र और पिता से बात करके उनका सफर जानने की कोशिश की। क्रिकेट खेलने पर हंसी उड़ाते थे लोग यहां टीले पर बने कच्चे मकान के सामने बड़ा सा शामियाना लगा है। चारपाई के साथ 20-25 कुर्सियां रखी हैं। घर के बाहर फूलों की मालाएं और गुलदस्ते लिए किसी का इंतजार कर रहे हैं। इतने में घर के अंदर से एक 27 साल का युवक एक पैर से लंगड़ाते हुए बाहर आया। माला और गुलदस्ता लिए खड़े लोग उसे एक-एक कर माला पहनाते और फोटो खिंचवाने लगता है। ये वही लोग हैं, जो इसे कभी लंगड़ा कहकर चिढ़ाते थे। उसके पिता से कहते- ऐसा बेटा पैदा किया है, किसी काम का नहीं है। ये क्या करेगा। दाएं हाथ के बल्लेबाज लोकेंद्र वर्तमान में दिव्यांग क्रिकेट एसोसिएशन मध्यप्रदेश की सतपुड़ा डिवीजन (ग्रामीण) टीम के कप्तान हैं। बचपन में लोगों ने उनके पैरों की कमजोरी को लेकर ताने दिए थे। क्रिकेट खेलने पर हंसी उड़ाते थे, लेकिन उन्होंने इन बातों को अपनी ताकत बनाया। लोग बोलते- हमारे बच्चों को बिगाड़ देगा लोकेंद्र कहते हैं कि इस मुकाम पर पहुंचने के लिए मैंने क्या कुछ नहीं सुना और सहा है, ये मैं ही जानता हूं। लोगों के तानों से परेशान होकर पिताजी बचपन में ही विकलांग आश्रम में छोड़ आए थे। वे भी क्या करते, ताने और घर के हालत ऐसे नहीं थे कि मेरी इलाज और पढ़ाई के साथ देखभाल कर पाते। सोचता था कि जिंदगी ऐसे ही कट जाएगी। क्रिकेट खेलने का शौक, तो तीन-चार साल की उम्र से ही था। खड़ा तो ठीक से हो नहीं पाता था, लेकिन प्लास्टिक का बैट जरूर अपने पास ही रखता था। थोड़ा बड़ा हुआ, तो लकड़ी के पल्ले को बैट बना लिया। अपने गांव के हम उम्र बच्चों के साथ खेलना शुरू कर दिया। तब गांव वाले पिताजी से कहते कि तेरा ये लंगड़ा लड़का खुद तो किसी काम का नहीं है, हमारे बच्चों को भी बिगाड़ रहा है। पिताजी भी मुझे डांटते, घर से बाहर जाने के लिए मना करते। छोटा था, इसलिए कुछ समझ नहीं पाता था। आश्रम से मिली नई राह और जिंदगी विकलांग सेवा आश्रम में शुरुआती दिन मुश्किल से कटे। हर पल मां की याद आती थी। सोचता था, मेरा पैर ऐसा क्यों है? क्यों मैं अपने दोनों छोटे भाइयों की तरह अपने घर में रह सकता। आश्रम पहुंचा, तो वहां सीनियर्स को क्रिकेट खेलते देखा। मन को तसल्ली हुई। धीरे-धीरे अपने दोस्तों के साथ मैं भी क्रिकेट खेलने लगा। वहां जो हमारे वार्डन थे, वो हमेशा मोटिवेट करते। जितनी पढ़ाई करना हो करो, जितना खेलना हो खेलो। कबीर के दोहे ने दी प्रेरणा आश्रम में हम लोग प्रार्थना भी करते थे। कबीर ग्रंथावली का एक दोहा है- मन के हारे हार हैं, मन के जीते जीत। कहै कबीर हरि पाइए, मन ही की परतीति॥ पहले तो इस दोहे को ऐसे ही दोहरा लेते थे। लेकिन, जब इसका अर्थ समझ आया, तो अमल करना शुरू कर दिया। सोच लिया कि अब किसी भी हालत और कीमत में अपने आपको और अपने मन को कभी हारने नहीं देना है। लोकेंद्र कहते हैं कि 2021 में विश्व दिव्यांग दिवस पर दिव्यांग क्रिकेटर टीम के कप्तान ब्रजेश द्विवेदी के बारे में पता चला। उनके बारे में जानकारी हासिल की तो पता चला वे IIT इंदौर में नौकरी करते हैं। दो-तीन दिन बाद उनसे मिलने IIT इंदौर पहुंच गया। उन्हें क्रिकेट को लेकर अपने जुनून के बारे में बताया। उन्होंने मेरा ट्रायल कराया। इसके कुछ महीने बाद ही खास तौर से हमारे लिए सतपुड़ा डिवीजन के नाम से टीम बन गई। चंदे से खरीदी पहली किट शुरुआत में लेदर बॉल से खेलने के दिक्कत हुई। किट भी नहीं थी। दोस्तों ने चंदा जमा कर किट की व्यवस्था की। शुरुआत में सेंधवा के किला परिसर स्थित मंडी में डामर सड़क पर खेले। इसके बाद निवाली के खेल परिसर में प्रैक्टिस करना शुरू किया। आज भी यहां से हर शनिवार रविवार को सेंधवा से 20 किमी दूर निवाली मैच खेलने जाते हैं। तीन साल पहले मेरी शादी हुई। आईटीआई करने के बाद बीए कर रहा हूं। बेटी को खेलते देख मिलता है सुकून तीन साल पहले 22 मार्च 2023 को टिकेश्वरी से शादी हुई। एक बेटी है। जब बेटी होने वाली थी, उस समय मन में डर था। लगता था कि कहीं बच्चा भी मेरी तरह तो नहीं होगा। ऐसे में पत्नी का समय समय डॉक्टरों से उपचार ओर जांच करवाते रहे। खुशी होती है, जब अपनी बेटी को सभी बच्चों के साथ अच्छे से खेलता देखता हूं। बुखार के इलाज में पता चला, पोलियो है लोकेंद्र के पिता रूमा आर्य कहते हैं कि चार एकड़ खेती है। इसमें जो फसल होती है, उसी में गुजारा करना होता है। मेरी शादी के डेढ़ साल बाद घर में पहली संतान आने वाली थी। परिवार खुश था। 11 सितम्बर 1998 लोकेंद्र का जन्म हुआ। पहला जन्मदिन धूमधाम से मनाया था। दो-तीन महीने में ये घोंटू-घोंटू चलने लगा, लेकिन ठीक से खड़ा नहीं हो पाता था। डेढ़ साल का था, इसे तेज बुखार आ गया। देशी इलाज करवाया, लेकिन बुखार नहीं उतरा। शहर जाकर इलाज कराने की हैसियत नहीं थी। ससुरालवालों ने लोकेंद्र को डॉक्टर को दिखाने के लिए अपने पास बुला लिया। लोकेंद्र के बाद दो बेटे और हुए, लेकिन वो दोनों स्वस्थ थे। अपने ही लोगों के तानों ने किया परेशान जैसे-जैसे लोकेंद्र बड़ा हो रहा था, परेशानियां बढ़ती जा रही थीं। कहीं भी आना-जाना होता तो गोदी में लेकर जाता। जो भी देखता, उलहाना देता था। कहते थे क्या करोगे ऐसे लड़के का। इसका इलाज कराने मेरे पास रुपए नहीं थे। बेटा जब करीब 8 साल का था, तब 2006 में जानकारी मिली कि निवाली के पास झाकर में पद्मश्री कांता विकलांग सेवा ट्रस्ट नाम का आश्रम है। पैसों की कमी और लोगों के तानों से परेशान हो मैं उसे वहां छोड़ आया। आश्रम की तरफ से उसका 2012 में इंदौर में सर्जरी भी कराई गई। लेकिन, फायदा कुछ नहीं हुआ। वहां वो 12 वीं क्लास तक रहा। इसके बाद उसने आईटीआई की। अब बीए सेकंड ईयर कर रहा है।
