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नदी-जंगल की बलि देकर बन रही 12हजार करोड़ की यूनिट:सतपुड़ा पावर प्लांट के मैनेजमेंट ने बोले 6 झूठ, दुर्लभ वन्यजीवों को भी खतरा

मध्य प्रदेश की जीवनरेखा कही जाने वाली नर्मदा की सबसे बड़ी सहायक नदी तवा और सतपुड़ा के घने जंगल के बीच बड़ा प्रोजेक्ट आने वाला है। सारणी स्थित सतपुड़ा थर्मल पावर प्लांट में 660 मेगावाट की 12वीं यूनिट लगाने की तैयारी है, लेकिन ₹12,000 करोड़ का यह प्रोजेक्ट ‘झूठ’ पर टिका है। दैनिक भास्कर के ग्राउंड इन्वेस्टिगेशन में खुलासा हुआ है कि प्लांट प्रबंधन ने एनवायरमेंटल क्लियरेंस के लिए तथ्यों को गलत तरीके से पेश किया। पर्यावरण और वन्यजीवों की मौजूदगी को पूरी तरह नकार दिया गया। प्लांट मैनेजमेंट का कहना है कि नई यूनिट उनकी जमीन पर बन रही है। डैम का कोई हिस्सा नहीं पाटा जाएगा। केवल 800 पेड़ कटेंगे। वहीं, वन विभाग का कहना है कि इस प्रोजेक्ट के लिए उससे कोई अनुमति नहीं ली गई है। पढ़िए, रिपोर्ट… नदी, वेटलैंड और पेड़ों की बलि तय भास्कर टीम जब प्लांट के पीछे उस हिस्से में पहुंची, जहां नई यूनिट प्रस्तावित है तो नजारा अभयारण्य जैसा था। चारों तरफ घने पेड़, पक्षियों का शोर और सतपुड़ा डैम का साफ पानी था। इतना स्वच्छ कि जब पानी में सिक्का डाला गया, तो वह गहराई में भी चमकता नजर आया। इसी शुद्ध पानी के करीब 6 एकड़ हिस्से को पाटा जाना है। प्लांट प्रशासन का दावा है कि वे अपनी जमीन पर काम कर रहे हैं, लेकिन निर्माण के लिए नदी का बड़ा हिस्सा, वेटलैंड और सैकड़ों पेड़ों की बलि दी जानी तय है। भास्कर पड़ताल में क्लियरेंस के लिए दी गई जानकारियों और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर मिला। पावर प्लांट के 6 सफेद झूठ, जिनसे पर्यावरण को खतरा झूठ 1: डैम और पानी को नुकसान नहीं होगा
हकीकत: गूगल मैप और साइट के को-ऑर्डिनेट्स बताते हैं कि नई यूनिट के लिए डैम का वह हिस्सा पाटा जाएगा, जहां लाखों लीटर शुद्ध पानी भरा है। करीब 6 एकड़ जलमग्न क्षेत्र प्रोजेक्ट की भेंट चढ़ जाएगा। झूठ 2: 10 किमी के दायरे में सिर्फ मोर हैं
हकीकत: वन विभाग के दस्तावेज बताते हैं कि यहां बसे 30 वन्यजीव ‘वन्यप्राणी संरक्षण अधिनियम 1972’ की शेड्यूल-1 (अति सुरक्षित) श्रेणी में आते हैं। पूरा इलाका समृद्ध वेटलैंड बन चुका है, जहां साइबेरिया से भी प्रवासी पक्षी आते हैं। झूठ 3: टाइगर कॉरिडोर 10 किमी दूर है
हकीकत: सतपुड़ा-मेलघाट टाइगर कॉरिडोर का मैप दिखाता है कि नई यूनिट की साइट प्लांट से महज 1 किलोमीटर दूर है। प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ, वाइल्डलाइफ) स्मिता राजोरा ने पुष्टि की है कि प्लांट की वजह से बाघों का प्राकृतिक रास्ता पहले ही प्रभावित हो चुका है। झूठ 4: एक भी पेड़ नहीं काटा जाएगा
हकीकत: प्रोजेक्ट साइट पर सैकड़ों पेड़ों पर कटाई के नंबर डले हैं। प्लांट के चीफ इंजीनियर ने स्वीकार किया कि 800 पेड़ काटने की अनुमति मांगी गई है। झूठ 5: कोई स्थानीय प्रजाति नहीं है
हकीकत: यहां मध्य भारत की दुर्लभ छिपकली की प्रजाति ‘सतपुड़ा लेपर्ड गेको’ पाई जाती है, जो दुनिया में कहीं और नहीं मिलती। झूठ 6: इंसान और वन्यजीवों में कोई संघर्ष नहीं है
हकीकत: स्थानीय निवासी नितिशा शेजकर बताती हैं कि मोहल्लों में तेंदुए का आना आम है। वन विभाग के रिकॉर्ड में पालतू जानवरों के शिकार और मुआवजे के कई मामले दर्ज हैं। इससे साफ है कि यहां ‘ह्यूमन-वाइल्डलाइफ कॉन्फ्लिक्ट’ चरम पर है। प्रकृति को बचाने का विकल्प मौजूद था वाइल्डलाइफ एक्टिविस्ट आदिल खान का कहना है कि यह प्रोजेक्ट भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है। प्लांट की यूनिट नंबर 1 से 9 तक पहले ही बंद हो चुकी हैं। प्रबंधन चाहता तो इन बंद पड़ी यूनिटों की खाली जमीन पर नई यूनिट लगा सकता था। इससे जंगल और नदी बचती, प्रोजेक्ट की लागत भी करीब 30 प्रतिशत कम हो जाती। लेकिन जानबूझकर नई जगह चुनी गई ताकि निर्माण के नाम पर बड़ा खेल किया जा सके। मध्य प्रदेश वन विभाग के प्रमुख शुभरंजन सेन का कहना है कि इस प्रोजेक्ट के लिए उनसे कोई अनुमति नहीं ली गई और न ही आधिकारिक जानकारी दी गई है।

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