भोपाल की रहने वाली महिला कारोबारी अर्चना शिवहरे के बैंक खाते में मौजूद 2.51 करोड़ रुपए से अधिक की राशि को महज 980 रुपए के संदिग्ध साइबर ट्रांजेक्शन के आधार पर फ्रीज किए जाने के मामले में जबलपुर हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। साइबर पुलिस की इस कार्रवाई को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने प्रदेशभर के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए। कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसियां पूरे बैंक खाते को फ्रीज करने के बजाय, जहां तक संभव हो, केवल विवादित राशि पर ही लियन या डेबिट फ्रीज लगाएं। पूरे खाते को फ्रीज करना अंतिम और असाधारण परिस्थिति में ही अपनाया जाने वाला कदम होना चाहिए। जस्टिस हिमांशु जोशी की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि यदि संदिग्ध लेन-देन की राशि सीमित है, तो पूरे खाते पर रोक लगाना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि जांच एजेंसियों को कथित अपराध से जुड़ी राशि और खाते में मौजूद वैध धनराशि के बीच अंतर करना चाहिए तथा केवल उतनी ही रकम पर रोक लगानी चाहिए, जितनी जांच के लिए आवश्यक हो। कोर्ट ने यह टिप्पणी उस मामले में की, जिसमें 980 रुपए के संदिग्ध साइबर ट्रांजेक्शन के आधार पर 2,51,72,192.57 रुपए वाले पूरे चालू खाते को फ्रीज कर दिया गया था। केवल 980 रुपए के संदिग्ध ट्रांजेक्शन पर फ्रीज हुआ 2.51 करोड़ दरअसल, भोपाल निवासी याचिकाकर्ता अर्चना शिवहरे नरसिंहपुर जिले में सात कंपोजिट शराब दुकानों की लाइसेंसधारी हैं। इन सभी दुकानों का वित्तीय लेन-देन उनके एक ही चालू बैंक खाते के माध्यम से होता है। अप्रैल 2026 में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की इटारसी शाखा ने बिना किसी पूर्व सूचना के उनका बैंक खाता फ्रीज कर दिया। बाद में पता चला कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा-106 के तहत दर्ज साइबर अपराध से जुड़ी शिकायत के आधार पर यह कार्रवाई की गई थी। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ऐश्वर्य साहू ने हाईकोर्ट में दलील दी कि संदिग्ध साइबर लेन-देन की राशि महज 980 रुपए है, जबकि खाते में 2.51 करोड़ रुपए से अधिक जमा हैं। उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि यदि जांच के लिए आवश्यक हो तो केवल 980 रुपए की राशि पर रोक लगाई जाए और शेष धनराशि के संचालन की अनुमति दी जाए। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि पूरे बैंक खाते को फ्रीज करना एक असाधारण कार्रवाई है और इसे सामान्य प्रक्रिया के तौर पर नहीं अपनाया जा सकता। जांच एजेंसी को कथित अपराध से जुड़ी राशि और खाते में मौजूद वैध धनराशि के बीच अंतर करते हुए केवल उतनी ही रकम पर रोक लगानी चाहिए, जितनी जांच के लिए आवश्यक हो। कोर्ट बोला- अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकते अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बैंक केवल आदेश का पालन करने वाली संस्था नहीं हैं, बल्कि शिकायत निवारण प्रक्रिया का पहला और महत्वपूर्ण माध्यम भी हैं। इसलिए बैंक खाताधारक को खाता फ्रीज करने का कारण, संबंधित जांच एजेंसी की जानकारी और उपलब्ध शिकायत निवारण प्रक्रिया की पूरी जानकारी तत्काल उपलब्ध कराई जानी चाहिए। केवल पुलिस या अदालत जाने की सलाह देकर बैंक अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकते। हाईकोर्ट की प्रमुख गाइडलाइन कोर्ट ने राज्य के सभी बैंकों, पुलिस और जांच एजेंसियों के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जो कि इस प्रकार है। – जहां संभव हो, केवल विवादित राशि पर लियन या डेबिट फ्रीज लगाया जाए। – पूरे खाते को फ्रीज करने का आदेश केवल लिखित कारणों के आधार पर और असाधारण परिस्थितियों में ही दिया जाए। – जांच अधिकारी बैंक खाता फ्रीज करने की सूचना यथाशीघ्र संबंधित मजिस्ट्रेट को दें। – बैंक खाताधारक को फ्रीजिंग की सूचना और शिकायत निवारण की प्रक्रिया बताए। – बैंक शिकायत मिलने के 7 दिन के भीतर उसे पोर्टल पर अपलोड करें। – जांच अधिकारी शिकायत पर 15 दिन के भीतर कारणयुक्त निर्णय दें। – यदि शिकायत स्वीकार होती है तो बैंक 48 घंटे के भीतर खाते को डी-फ्रीज करने की कार्रवाई करे। – 90 दिन तक विवाद का समाधान नहीं होने और खाते को फ्रीज रखने का कोई वैध आदेश न होने पर, निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए बैंक खाते से रोक हटाई जा सकती है। – यदि जांच एजेंसी पूरे खाते को फ्रीज रखना चाहती है तो उसे कारणयुक्त आदेश पारित करना होगा। पूरी राशि फ्रीज करने पर जारी करना होगा आदेश हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के आवेदन पर 10 अप्रैल 2026 की SOP और अदालत द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार निर्णय लिया जाए। यदि जांच के लिए केवल 980 रुपए की राशि सुरक्षित रखना पर्याप्त हो तो बैंक को शेष राशि जारी करने का निर्देश दिया जाए। यदि पूरे खाते को फ्रीज रखना आवश्यक समझा जाए तो उसका विस्तृत और कारणयुक्त आदेश पारित किया जाए। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि इस फैसले की प्रति सभी बैंकों, पुलिस थानों, साइबर क्राइम पुलिस स्टेशनों, जांच एजेंसियों और संबंधित अधिकारियों को भेजी जाए ताकि साइबर अपराधों में बैंक खाते फ्रीज करने की प्रक्रिया एक समान और कानून सम्मत तरीके से लागू हो सके।
