इंदौर में गहराते जल संकट को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने इंदौर नगर निगम को शहर के सबसे अधिक जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों की पहचान कर वहां पेयजल उपलब्ध कराने के लिए ठोस कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 6 जुलाई 2026 को होगी। राजलक्ष्मी फाउंडेशन द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान नगर निगम ने कोर्ट को बताया कि वर्षा जल संचयन नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए कई संस्थानों को नोटिस जारी किए गए हैं तथा उल्लंघन की स्थिति में अधिकतम 5 हजार रुपए तक का जुर्माना लगाया जा रहा है। हालांकि याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट अजय बगाड़िया ने तर्क दिया कि जल संकट की गंभीरता को देखते हुए यह जुर्माना बेहद कम और अप्रभावी है। 65% ट्रीटेड पानी हो रहा बर्बाद सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि पाइपलाइन लीकेज के कारण इंदौर में लगभग 65% ट्रीटेड पानी बर्बाद हो रहा है। इस पर हाई कोर्ट ने चिंता जताते हुए कहा कि इतनी बड़ी जल हानि गंभीर विषय है और इस दिशा में तत्काल सुधारात्मक कदम उठाए जाने चाहिए। हाईकोर्ट ने कहा कदम देर से और अपर्याप्त नगर निगम ने कोर्ट को बताया कि वर्षा जल संचयन और निरीक्षण कार्य के लिए 24 जोनों में करीब 1000 कर्मचारियों को लगाया गया है तथा कई संस्थानों को नोटिस जारी किए गए हैं। इसके बावजूद कोर्ट ने टिप्पणी की कि संकट की गंभीरता को देखते हुए अब तक उठाए गए कदम विलंबित और अपर्याप्त प्रतीत होते हैं। जल संरक्षण और पुनर्भरण पर भी जोर नगर निगम ने बताया कि 24 जल चैनलों में से 11 का कार्य पूरा हो चुका है और 8 पर काम जारी है। साथ ही सीएसआर के तहत 288 वॉटर शाफ्ट बनाए गए हैं तथा ट्रीटेड सीवेज जल के पुन: उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है। हाईकोर्ट ने भूजल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, जलाशयों के पुनर्जीवन और पाइप लाइन लीकेज रोकने जैसे उपायों पर प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इंदौर जैसे गंभीर जल संकट से जूझ रहे शहर में केवल योजनाएं नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर प्रभावी क्रियान्वयन आवश्यक है। अब नगर निगम को प्रभावित क्षेत्रों की पहचान कर वहां पेयजल उपलब्ध कराने संबंधी विस्तृत रिपोर्ट कोर्ट में प्रस्तुत करनी होगी।
