मध्यप्रदेश के 75 कपास कारखाने जब महाराष्ट्र शिफ्ट हो गए, तब कहीं जाकर सरकार ने मंडी फीस की दर को घटाने का निर्णय लिया। मंगलवार को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में मंत्रि-परिषद की बैठक भोपाल हुई। बैठक में मंत्रि-परिषद ने कपास पर मंडी फीस की दर को 1% से घटाकर 0.5% करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है, जिससे स्थानीय जिनिंग मिलों को मजबूती मिलेगी और रोजगार बढ़ेगा। किसान हित में सामान्य मंडी शुल्क को एक रुपए से बढ़ाकर एक रुपए 50 पैसे किया गया है। शुल्क के रूप में प्राप्त होने वाली 500 करोड़ रुपए की अनुमानित अतिरिक्त आय का उपयोग सीधे किसान सड़क निधि और कृषि अनुसंधान के विकास में किया जाएगा। सरकार के इस कदम के बाद दावा है कि कारखाने वापस आएंगे और 10 हजार लोगों को रोजगार मिलेगा। बता दें कि सरकार अब तक कपास पर एक रुपए प्रति सैकड़ा की दर से मंडी टैक्स वसूल रही थी। 15 साल में 75 फैक्ट्रियों के महाराष्ट्र पलायन की बात सामने आने के बाद सीएम डॉ. मोहन यादव ने संज्ञान लिया और कपास पर मंडी टैक्स महाराष्ट्र और गुजरात के बराबर करने का निर्णय लिया। मामले में दैनिक भास्कर ने पड़ताल की तो सामने आया कि एमपी में बढ़े हुए टैक्स के चलते कॉटन इंडस्ट्री बर्बादी की कगार पर पहुंच गई हैं। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…
सबसे पहले बैठक में हुए निर्णय मंत्रि-परिषद ने कपास जिनिंग मिलों की आवश्यकता को देखते हुए कपास पर मंडी फीस की दर 1% से घटाकर 0.5% करने का अनुमोदन दिया है। प्रदेश में करीब 158 कपास जिनिंग मिलें हैं, जिनकी प्रसंस्करण क्षमता करीब 13 लाख मीट्रिक टन है। प्रदेश में कपास पर मंडी फीस की दर में कमी किए जाने से जिनिंग मिलों के द्वारा अन्य पड़ोसी राज्यों में पलायन की अपेक्षा प्रदेश में ही व्यवसाय करने को प्राथमिकता दी जाएगी, जिससे रोजगार में तथा जीएसटी संग्रहण में वृद्धि होगी।
जानिए टैक्स बढ़ने पर क्या नुकसान मंडी टैक्स बढ़ा तो कारखाने महाराष्ट्र शिफ्ट हो गए
एमपी कॉटन जिनर्स एंड ट्रेडर्स एसोसिएशन के प्रदेशाध्यक्ष राजू चांदमल जैन के मुताबिक, मध्यप्रदेश में 15 साल पहले कपास पर मंडी टैक्स बढ़ा दिया गया था। इसका सीधा असर जिनिंग फैक्ट्रियों पर पड़ा। एमपी के कॉटन व्यापारियों ने महाराष्ट्र में कपास खरीदना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे कई फैक्ट्रियां भी महाराष्ट्र पलायन करने लगीं। एमपी सरकार ने बाद में टैक्स घटाकर दो रुपए से एक रुपए प्रति सैकड़ा कर दिया, लेकिन महाराष्ट्र में यह सिर्फ 55 पैसे ही रहा। इसी वजह से एमपी के व्यापारी महाराष्ट्र की ओर कूच कर गए। 15 साल पहले एमपी में करीब 350 कॉटन एवं जिनिंग फैक्ट्रियां थीं, जो अब घटकर 275 रह गई हैं। यानी 75 कारखानों का पलायन हो गया। एमपी में खंडवा, बुरहानपुर, खरगोन और बड़वानी जिलों में इन फैक्ट्रियों की बड़ी संख्या थी। पलायन करने वाली ज्यादातर फैक्ट्रियां बड़वानी जिले के सेंधवा क्षेत्र की थीं। एमपी में 30% घट गई गांठों की प्रेसिंग
कॉटन एसोसिएशन के अध्यक्ष राजू जैन के अनुसार- 15 साल पहले एमपी में 350 फैक्ट्रियां थीं। 7-8 साल पहले तक प्रदेश में 24 लाख गांठों की प्रेसिंग होती थी, जो देश में सबसे ज्यादा मानी जाती थी। एमपी की कॉटन इंडस्ट्री की अलग पहचान थी, लेकिन टैक्स बढ़ने और बाद में भी राहत नहीं मिलने से उद्योग की स्थिति लगातार बिगड़ती गई। 75 फैक्ट्रियां कम होने के कारण अब प्रदेश में सिर्फ 17 लाख गांठों की प्रेसिंग हो रही है। अब जानिए टैक्स घटने से क्या फायदा टैक्स घटा, महाराष्ट्र का कपास भी एमपी आएगा
जिनिंग एसोसिएशन का कहना है कि फिलहाल महाराष्ट्र और गुजरात की कॉटन इंडस्ट्री काफी हद तक एमपी के कपास पर निर्भर है। वहां फैक्ट्रियों की तुलना में कपास का उत्पादन कम होता है। अभी एमपी से जो कच्चा कपास महाराष्ट्र और गुजरात जा रहा है, टैक्स घटने के बाद वह लगभग बंद हो जाएगा। इसके बजाय महाराष्ट्र के सीमावर्ती जिलों से कच्चा कपास एमपी की फैक्ट्रियों में आने लगेगा। एक साल में 10 हजार लोगों को मिलेगा रोजगार
उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि मंडी टैक्स घटने के बाद महाराष्ट्र गई 50 फैक्ट्रियां एक साल के भीतर एमपी लौट सकती हैं। एक जिनिंग फैक्ट्री में औसतन 200 मजदूरों की जरूरत होती है। इस हिसाब से एमपी, खासकर निमाड़ क्षेत्र में, 10 हजार मजदूरों को नया रोजगार मिल सकता है। आदिवासी बाहुल्य खालवा ब्लॉक से महाराष्ट्र की ओर होने वाला मजदूर पलायन भी रुकने की उम्मीद है। इसके अलावा कपास उत्पादक किसानों को भी फायदा मिलेगा। स्थानीय मंडियों में उन्हें प्रति क्विंटल 50 से 100 रुपए तक ज्यादा दाम मिल सकते हैं। व्यापारियों को टैक्स और परिवहन खर्च में राहत मिलेगी, जिसका कुछ फायदा किसानों तक पहुंचेगा। इससे कपास उत्पादन बढ़ने की संभावना भी है। खंडवा में 13 में से सिर्फ 8 फैक्ट्रियां चालू
खंडवा जिनिंग एसोसिएशन के अनुसार, निमाड़ की सबसे बड़ी कपास मंडी खरगोन जिले में है, जबकि दूसरे नंबर पर खंडवा जिला आता है। खंडवा में पहले 13 जिनिंग फैक्ट्रियां और ऑयल मिल थीं, लेकिन अब सिर्फ 8 फैक्ट्रियां ही चालू हालत में हैं। इन फैक्ट्रियों में करीब एक लाख गांठों की प्रेसिंग हो रही है। खंडवा मंडी के पिछले 5 साल के आंकड़े, आवक और राजस्व घटे
