मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में ओबीसी आरक्षण के मामलों में मंगलवार (4 अगस्त) को 14वें दिन सुनवाई हुई। विशेष बेंच में जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ ने मामले की सुनवाई की। ओबीसी पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने दलीलें रखीं। उन्होंने कहा कि यदि आरक्षण से समाज के किसी वर्ग को परेशानी है तो सरकार एक नियम बनाकर आरक्षण व्यवस्था समाप्त कर सकती है। इसके लिए उन्होंने सुझाव दिया कि कक्षा 1 से 12वीं तक सरकारी स्कूल में पढ़ाई करने वाले छात्रों को ही सरकारी नौकरी देने का प्रावधान किया जाए। अधिवक्ता ने कहा कि इससे आरक्षण को लेकर विवाद खत्म हो सकता है और सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर भी अपने आप बेहतर होगा। उन्होंने यह भी कहा कि अगस्त 2019 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने विधानसभा से ओबीसी के लिए 27% आरक्षण का कानून पारित कराया था। अक्टूबर 2019 में सरकार ने 555 पेज का जवाब दाखिल कर कानून को उचित ठहराने का प्रयास किया था। 555 पेज के जवाब में 51% आबादी का डेटा
वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने कोर्ट को बताया कि अक्टूबर 2019 में तत्कालीन सरकार की ओर से दाखिल 555 पेज के जवाब में पहली बार ओबीसी की 51% आबादी का डेटा हाईकोर्ट के सामने रखा गया था। उन्होंने कहा कि जिस सरकार ने ओबीसी के लिए 27% आरक्षण का कानून बनाया, उसी सरकार ने उसके समर्थन में यह जवाब दाखिल किया था। उनके अनुसार बाद में मार्च 2020 में सरकार बदलने के बाद मौजूदा सरकार की ओर से आरक्षण के समर्थन में उसी तरह का प्रयास नहीं किया गया। मंडल और महाजन आयोग की रिपोर्ट का हवाला
ओबीसी पक्ष ने दलील दी कि ओबीसी का संपूर्ण डेटा धर्मग्रंथों में वर्णित है, जिसे मंडल और महाजन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में संग्रहित किया है। इसलिए अलग से डेटा की आवश्यकता नहीं है। सुनवाई के दौरान महाजन आयोग की रिपोर्ट के अध्याय 4 और 5 का हवाला दिया गया। इन अध्यायों में वर्ण व्यवस्था और उसके पिछड़े वर्गों पर प्रभाव का उल्लेख है। अधिवक्ता ने हिंदू वर्ण व्यवस्था के संदर्भ में दलील देते हुए कहा कि ओबीसी की सभी जातियों को शूद्र वर्ण में वर्णित किया गया है। सरकार पर मामलों को सुप्रीम कोर्ट ले जाने का आरोप
ओबीसी पक्ष ने कोर्ट को बताया कि अगस्त 2019 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने विधानसभा से 27% ओबीसी आरक्षण का कानून पारित कराया था। अक्टूबर 2019 में 555 पेज का जवाब दाखिल कर कानून को जस्टिफाई करने का प्रयास किया गया। इसके बाद मार्च 2020 में सरकार बदल गई। आरोप लगाया गया कि जब भी हाईकोर्ट ने इन मामलों पर निर्णय की प्रक्रिया आगे बढ़ाई, सरकार ने तीन दिनों के भीतर सुप्रीम कोर्ट में 83 ट्रांसफर याचिकाएं दायर कर सभी मामलों को वहां ट्रांसफर करा लिया। मेरिट में आने वाले OBC अभ्यर्थियों का मुद्दा
ओबीसी पक्ष ने अदालत को बताया कि बड़ी संख्या में ओबीसी अभ्यर्थी मेरिट सूची में आते हैं और ऐसे अभ्यर्थियों को अनारक्षित श्रेणी में गिना जाता है। इससे उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिल पाता। इस पर जस्टिस विनय सराफ ने सवाल किया कि यदि ओबीसी अभ्यर्थी लगातार बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं तो क्या यह दलील उनके अपने मामले को कमजोर नहीं करती? उन्होंने कहा कि इससे यह संदेश भी निकल सकता है कि ओबीसी अभ्यर्थी अधिक प्रतिभाशाली हैं और उन्हें शायद आरक्षण की जरूरत ही नहीं है। अधिवक्ता ने रखा वैकल्पिक प्रस्ताव जज के सवाल पर वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने कहा कि उन्होंने कई बार सरकार को पत्र लिखकर ओबीसी आरक्षण समाप्त करने का सुझाव दिया है। इसके साथ ही उन्होंने वैकल्पिक व्यवस्था का प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि यदि कोई छात्र कक्षा 1 से 12वीं तक सरकारी स्कूल में पढ़ा है तो सरकारी नौकरी उसी को दी जानी चाहिए। उनके अनुसार ऐसा होने पर आरक्षण को लेकर विवाद खत्म हो सकता है और सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर भी अपने आप सुधरेगा। यह अधिवक्ता की ओर से अदालत में रखा गया व्यक्तिगत सुझाव था, न कि अदालत की टिप्पणी या आदेश। बुधवार को हो सकती है अंतिम बहस
सुनवाई के अंत में अदालत ने मामले को बुधवार 5 अगस्त के लिए सूचीबद्ध किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जस्टिस आनंद पाठक की अन्य व्यस्तताओं के कारण गुरुवार से यह विशेष बेंच उपलब्ध नहीं रहेगी। ऐसे में बुधवार को इस चरण की अंतिम बहस पूरी होने की संभावना है।
