मंदसौर के स्वास्थ्य विभाग में आउटसोर्स भर्ती के नाम पर ऐसा घपला सामने आया है, जिसने सरकारी भर्ती व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जिले में सिर्फ 66 मल्टी टास्क वर्करों की भर्ती की मंजूरी थी, लेकिन सीएमएचओ कार्यालय से कथित तौर पर 318 लोगों को नियुक्ति दे दी गई।
इनमें कई कर्मचारियों के नियुक्ति आदेश केवल आउटसोर्स एजेंसी के लेटरहेड पर जारी हुए, जबकि स्वास्थ्य विभाग के आधिकारिक रिकॉर्ड में उनके नाम तक दर्ज नहीं हैं।
मामला खुलने के बाद सीएमएचओ डॉ. गोविंद सिंह चौहान को निलंबित कर दिया गया। निलंबन आदेश में उनके भतीजे जयदीप की भूमिका का भी उल्लेख है।
आखिर यह भर्ती घोटाला कैसे हुआ, भतीजे की क्या भूमिका रही और पूरे जिले में दलालों का नेटवर्क कैसे खड़ा हो गया? इस रिपोर्ट में पढ़िए- 66 पदों की मंजूरी को बना दिया कमाई का जरिया मध्य प्रदेश सरकार ने वर्ष 2025 में जिला अस्पताल, सिविल अस्पताल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में सपोर्ट स्टाफ के रूप में मल्टी टास्क वर्करों की आउटसोर्स भर्ती की अनुमति दी थी। मंदसौर जिले के लिए केवल 66 पद स्वीकृत थे।
आरोप है कि तत्कालीन सीएमएचओ डॉ. गोविंद सिंह चौहान ने इसी प्रक्रिया को कमाई का जरिया बना लिया। मार्च और अप्रैल के दौरान भर्ती शुरू हुई और दो महीने के भीतर 318 लोगों को नियुक्ति दे दी गई।
अतिरिक्त भर्ती के लिए न शासन से अनुमति ली गई, न यह तय किया गया कि कर्मचारियों का वेतन किस मद से दिया जाएगा। कई नियुक्तियां केवल आउटसोर्स एजेंसी के लेटरहेड पर जारी कर दी गईं। सीएमएचओ दफ्तर से बंगले तक चलता था पूरा खेल
जांच में सीएमएचओ के भतीजे जयदीप का नाम भी प्रमुखता से सामने आया है। उज्जैन संभाग के कमिश्नर द्वारा जारी निलंबन आदेश में भी उसकी भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं।
स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि जयदीप भर्ती के नाम पर उम्मीदवारों से पैसों की डील करता था। अस्पताल परिसर में सीएमएचओ के सरकारी बंगले पर ही ज्यादातर सौदे होते थे।
मंदसौर विधायक विपिन जैन का कहना है कि उन्होंने कई बार कलेक्टर और सीएमएचओ के सामने शिकायत की थी कि एक निजी व्यक्ति सरकारी कामों में हस्तक्षेप कर रहा है और लोगों से पैसे मांग रहा है।
उनके मुताबिक एक युवक से भर्ती के नाम पर 70 हजार रुपए लिए गए थे। शिकायत मिलने पर उन्होंने हस्तक्षेप किया, तब राशि वापस कराई गई।
हालांकि जयदीप से संपर्क की कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने कॉल रिसिव नहीं किया।
वेतन नहीं मिला तो खुलने लगी परतें भर्ती घोटाले का खुलासा तब हुआ जब नौकरी पाने वाले कई लोगों को महीनों तक वेतन नहीं मिला। इसके बाद अभ्यर्थी और उनके परिजन जनप्रतिनिधियों तथा कलेक्टर कार्यालय पहुंचे।
अंगारी गांव के बबलूसिंह ने बताया कि रिश्तेदार के माध्यम से जयदीप तक पहुंच बनाई गई। बेटे की नौकरी के लिए 70 हजार रुपए दिए, लेकिन सूची में नाम नहीं आया। विधायक विपिन जैन से शिकायत करने पर रकम वापस मिली।
हनुमंतिया निवासी गोवर्धनलाल चंद्रवंशी का दावा है कि छह लोगों की भर्ती के लिए उन्होंने अलग-अलग किस्तों में 9 लाख से अधिक रुपए दिए। छह लोगों को काम पर रखा गया, लेकिन केवल चार को वेतन मिला। इसके बाद जयदीप ने फोन उठाना बंद कर दिया।
इसी तरह बनी गांव के वीरेंद्र सिंह ने आरोप लगाया कि 11 लोगों की भर्ती के लिए 7.70 लाख रुपए दिए गए। बाद में उनसे यह लिखकर देने को कहा गया कि उन्होंने किसी को पैसे नहीं दिए। शक होने पर उन्होंने कलेक्टर से शिकायत कर दी। न नोटशीट, न बजट… फिर कैसे हुई 318 नियुक्तियां?
सरकार से सिर्फ 66 पदों की मंजूरी मिली थी। अतिरिक्त पदों के लिए न कोई प्रस्ताव बना, न विभागीय नोटशीट तैयार हुई और न ही शासन से स्वीकृति ली गई।
कलेक्टर ने भी केवल 66 पदों के अनुमोदन पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन उसी के आधार पर लगातार नियुक्तियां जारी रहीं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब अतिरिक्त कर्मचारियों के लिए न पद स्वीकृत थे और न बजट, तो उनकी नियुक्ति किस आधार पर की गई?
जब कर्मचारियों को वेतन नहीं मिला और वे कलेक्टर कार्यालय पहुंचे, तब पूरे मामले की परतें खुलनी शुरू हुईं।
एजेंसी के नाम पर नियुक्ति, उसने भी झाड़ा पल्ला जिस आउटसोर्स एजेंसी के नाम पर नियुक्तियां जारी हुईं, उसके संचालक राम द्विवेदी का कहना है कि विभाग से पहले 66 और बाद में 66 अन्य कर्मचारियों की भर्ती के लिए कहा गया था। कुल 132 नियुक्तियां एजेंसी ने कीं।
उन्होंने कहा कि यदि किसी ने एजेंसी के लेटरहेड या सील का दुरुपयोग कर अतिरिक्त नियुक्ति पत्र जारी किए हैं तो यह गलत है। एजेंसी ने अतिरिक्त कर्मचारियों को हटाने के लिए विभाग को पत्र भी भेज दिया है।
हालांकि जब उनसे पूछा गया कि शासन की मंजूरी 66 पदों की थी, फिर 132 लोगों की भर्ती कैसे की गई, तो उन्होंने इसे विभाग का आंतरिक मामला बताया। सीएमएचओ की सफाई- आरोप निराधार
सीएमएचओ डॉ. गोविंद सिंह चौहान ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों से इनकार किया है। उनका कहना है कि जयदीप केवल उनका ड्राइवर है और उन्होंने किसी तरह की गड़बड़ी नहीं की।
निलंबन के संबंध में उन्होंने कहा कि शासन की जो भी प्रक्रिया होगी, उसका पालन करेंगे। भ्रष्टाचार के आरोपों को उन्होंने निराधार बताया।
