उज्जैन की माकड़ौन तहसील स्थित ग्राम सामानेरा में पुरातात्विक सर्वेक्षण के दौरान परमार कालीन समृद्ध पुरावैभव और प्राचीन मंदिरों के ऐतिहासिक अवशेष मिले हैं। अश्विनी शोध संस्थान की टीम ने सर्वेक्षण कर इन दुर्लभ प्रतिमाओं व स्थापत्य खंडों को उजागर किया है। कालीसिंध नदी के तट पर बसे सामानेरा में प्राचीन ताम्र पाषाण कालीन बस्तियों की मौजूदगी की संभावनाएं भी व्यक्त की गई हैं। संस्थान के निदेशक डॉ. आरसी ठाकुर और उपाध्यक्ष तिलक राज सिंह सोलंकी के निर्देशन में शोधकर्ता अनुष्का तिवारी ने यह सर्वेक्षण पूरा किया, जिसमें स्थानीय शिक्षक सत्यनारायण प्रजापत का सराहनीय सहयोग रहा। सर्वेक्षण के दौरान गांव के प्राचीन मां ब्रह्माणी माता मंदिर के निकटवर्ती कगार से उमा-महेश्वर की दो अति सुंदर परमार कालीन प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं। इसके अतिरिक्त भवानी मंदिर परिसर की जांच में देवी प्रतिमा, द्वार-गणपति, मंदिर के शिखर का स्थापत्य खंड, परमार कालीन चौड़ी ईंटें तथा विभिन्न प्राचीन अवशेष मिले हैं। मंदिर के स्थानीय संरक्षक दिनेश पंड्या की मदद से इन पुरावशेषों को सुरक्षित रखा गया है। पूर्व में भी यहां से चतुर्भुज शिव, त्रिशूल पाणि शिव, उमा-महेश्वर और गणपति की प्रतिमाएं मिलने के संदर्भ रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार क्षेत्र में पाई गई कुछ जलाधारियों और नंदी की मूर्तियों के गुप्त कालीन होने के संकेत हैं, जिसकी प्रामाणिक पुष्टि विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन के बाद हो सकेगी। गुप्त कालीन अवशेष और ताम्र पाषाण संस्कृति की संभावना सामानेरा में मिलीं कई जलाधारियों और नंदी महाराज की प्रतिमाओं की बनावट व शिल्पकला को देखकर विशेषज्ञों ने इनके गुप्त कालीन होने की प्रबल संभावना जताई है। कालीसिंध नदी का यह तटीय क्षेत्र प्राचीन काल से ही व्यापारिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध माना जाता रहा है। पुरातत्वविदों का मानना है कि स्थल पर विस्तृत उत्खनन और वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाए तो यहां ताम्र पाषाण कालीन मानव बस्तियों के ऐतिहासिक प्रमाण भी सामने आ सकते हैं। स्थानीय भवानी मंदिर परिसर से मिले शिखर खंड, द्वार-गणपति और विशेष प्रकार की प्राचीन ईंटें यह स्पष्ट करती हैं कि परमार और गुप्त काल में सामानेरा में भव्य एवं स्थापत्य कला से समृद्ध मंदिरों का निर्माण किया गया था, जो समय के साथ विलुप्त हो गए।
