Homeमध्यप्रदेशग्वालियर में 38 लाख की ठगी के आरोपी बरी:कोर्ट बोला- अग्रिम विवेचना...

ग्वालियर में 38 लाख की ठगी के आरोपी बरी:कोर्ट बोला- अग्रिम विवेचना के नाम पर देरी से न्याय की हानि, SSP से मांगी ‘एक्शन टेकन रिपोर्ट’

ग्वालियर में फर्जी सीबीआई अफसर बनकर डॉ. सुजाता बापट से 38 लाख रुपए ठगने के हाई-प्रोफाइल मामले में कोर्ट ने पुलिस की सुस्त और घोर लापरवाही पूर्णं जांच पर सख्त रुख अपनाया है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विवेक कुमार ने ग्वालियर SSP को आदेश दिया है कि विवेचना में हुई लेट-लतीफी पर जांच अधिकारी से स्पष्टीकरण लेकर 15 दिन के भीतर ‘एक्शन टेकन रिपोर्ट’ (ATR) पेश की जाए। पुलिस की कमजोर चार्जशीट और मुख्य साजिशकर्ताओं तक न पहुंच पाने का फायदा तीनों आरोपियों को मिला। इसी वजह से तीनों आरोपी हरीश चौधरी, अनिल नायक और ओमप्रकाश नायक, धोखाधड़ी (धारा-420), जालसाजी (धारा-467, 468) और आईटी एक्ट की गंभीर धाराओं से बरी हो गए। हालांकि, ठगी की रकम खातों में घुमाने और साजिश में शामिल होने के चलते कोर्ट ने तीनों को साजिश का हिस्सा मानते हुए एक-एक साल का कारावास व अर्थदंड सजा दी है। क्यों बरी हुए गंभीर धाराओं से? समझें कानूनी पेंच पीड़िता डॉ. सुजाता बापट ने अपनी गवाही में स्पष्ट किया कि उन्होंने सामने मौजूद आरोपियों से सीधे बात नहीं की थी और न ही वे उन्हें पहचानती हैं। फर्जी वारंट बनाने, वीडियो कॉल करने और ठगी की शुरुआत के सीधे सबूत पुलिस पेश नहीं कर सकी। ​जिस कारण पकड़े गए तीनों आरोपी सीधे तौर पर साइबर ठगी के केस में कमजोर विवेचना व साक्ष्य आभाव में बरी हो गए। लेकिन बैंक रिकॉर्ड और सीडीआर (कॉल डिटेल रिकॉर्ड) की जांच से यह साबित हो गया कि ठगी के 35 लाख रुपये आरोपी हरीश चौधरी की फर्म ‘चौधरी कंस्ट्रक्शन’ के खाते में आए थे। इसके बाद अनिल और ओमप्रकाश नायक ने उस रकम को तुरंत 13-14 अन्य खातों में ट्रांसफर कर ठिकाने लगाया। तीनों आपस में लगातार संपर्क में थे। कोर्ट ने माना कि यह जानते हुए भी कि यह अपराध का पैसा है, आरोपियों ने इसे ठिकाने लगाया, इसलिए उन्हें 411 और 120-बी के तहत दोषी ठहराया गया और एक-एक साल का कारावास और अर्थदंड की सजा दी गई। ‘अनंतकाल तक जांच लटकाना स्वीकार्य नहीं’ मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पुलिस कार्यशैली पर तीखे सवाल उठाए हैं। साथ ही कहा है कि अनंतकाल तक जांच लटकाना स्वीकार्य नहीं है। साथ ही कुछ कमियों को उजागर किया है। जो इस प्रकार हैं। फाइनल डेस्टिनेशन की जांच नहीं साइबर ठगी में सिर्फ पैसे का ट्रांसफर देखना काफी नहीं है, बल्कि पैसा कहां गया और मुख्य मास्टरमाइंड कौन है, इसका पता लगाना जरूरी था। जिससे अपराध और अपराधी की तह तक पहुंचा जा सके। अग्रिम विवेचना का बहाना अग्रिम विवेचना के नाम पर केस को लंबे समय तक लटकाए रखने से साक्ष्यों का अभाव हुआ, जिससे आरोपियों को फायदा मिला। यह सीधे तौर पर न्याय की हानि है। यह किसी भी तरह स्वीकार्य नहीं होगी। अधिकारी की मौत के बाद ठप हुई जांच इस मामले में साइबर ठगी की जांच करने वाले मुख्य विवेचक की मृत्यु के बाद किसी अन्य पुलिस अधिकारी का आगे की जांच न बढ़ाना पुलिस की गंभीर लापरवाही को दर्शाता है। ऐसा होने से प्रतीत होता है कि पुलिस में विवेचना स्तर पर बहुत कमी है।

Stay Connected
16,985FansLike
2,458FollowersFollow
61,453SubscribersSubscribe
Must Read
Related News

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here