सरकारी फाइलों और सड़क किनारे लगे बड़े-बड़े बोर्ड पर लिखा है यह ‘सतपुड़ा-मेलघाट टाइगर कॉरिडोर’ है। बोर्ड पर चेतावनी भी लिखी है कि यहां बाघ और वन्यजीव विचरण करते हैं। लेकिन इसी सरकारी रिकॉर्ड को धत्ता बताते हुए स्थानीय वन विभाग ने उसी रास्ते पर बाघों के लिए ‘कंटीली बेड़ियां’ डाल दी हैं। बैतूल से रानीपुर मार्ग पर चिखलार से आगे लगभग 5 से 6 किमी के दायरे में सड़क की कभी दाईं तो कभी बाईं ओर लोहे के तीखे और नुकीले तारों की फेंसिंग खड़ी कर दी गई है। हद तो यह है कि वन्यजीवों के सड़क पार करने और पानी पीने के कुछ प्राकृतिक नालों के मुहाने पर भी ये कटीले तार तान दिए गए हैं। जानकारी के मुताबिक वन विभाग ने इस क्षेत्र को ‘एससीआई पुनरुत्पादन कूप’ के तहत उपचार कार्य योजना में शामिल किया है। यहाँ सागौन के नए पौधे लगाए गए हैं। विभाग की दलील है कि पौधों को बचाने के लिए फेंसिंग की गई है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब विभाग के पास ऑन-रिकॉर्ड दर्ज है कि यह टाइगर कॉरिडोर है, तो फिर राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के नियमों को ताक पर रखकर कटीली फेंसिंग क्यों चुनी गई? नियमों के मुताबिक कॉरिडोर में किसी भी तरह की कटीली या चेन-लिंक फेंसिंग लगाना पूरी तरह गैर-कानूनी है। सतपुड़ा से मेलघाट तक 250 किमी का टाइगर कॉरिडोर सतपुड़ा टाइगर रिजर्व से मेलघाट तक करीब 250 किमी का वन क्षेत्र बाघों की आवाजाही के लिए महत्वपूर्ण है। यह मार्ग केसला-सुखतवा, हरदा की रेहटगांव रेंज, बैतूल के शाहपुर, भौंरा, बरेठा घाट, रानीपुर और आठनेर से होते हुए महाराष्ट्र के मेलघाट तक फैला है। वर्ष 2022 में रेडियो-कॉलर वाली बाघिन के सतपुड़ा से मेलघाट पहुंचने का रिकॉर्ड है। शाहपुर और आठनेर में शावकों के जन्म के प्रमाण भी मिले हैं। अभी सारनी में बाघिन के होने के साक्ष्य मिले हैं। क्या कहता है कानून : वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (धारा 38-O) एनटीसीए की अनुमति के बिना कॉरिडोर या बफर ज़ोन में किसी भी प्रकार की अवरोधक गतिविधि पूरी तरह प्रतिबंधित है। धारा 29 व 35 मुख्य वन्यजीव वार्डन की अनुमति के बिना वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास या मार्ग में रुकावट डालना संज्ञेय अपराध है। धारा 51 के तहत कॉरिडोर में गैर-कानूनी अवरोध या फेंसिंग लगाने पर सजा व जुर्माना हो सकता है। 250 किमी का कॉरिडोर बाघों की लाइफलाइन सतपुड़ा टाइगर रिजर्व को मेलघाट टाइगर रिजर्व (महाराष्ट्र) से जोड़ने वाला यह 250 किमी लंबा कॉरीडोर बाघों के आनुवंशिक विकास के लिए लाइफलाइन है। इस रूट पर एनएच-46 और रेलवे लाइन के निर्माण के दौरान राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड ने सख्त निर्देश दिए हैं कि बाघों का रास्ता बाधित न हो और करोड़ों खर्च कर अंडरपास बनाए जाएं। एक तरफ राष्ट्रीय एजेंसियों पर सख्ती बरती जा रही है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय वन विभाग ज़मीन पर कटीले तार लगाकर खुद ही कॉरीडोर के नियमों की धज्जियां उड़ा रहा है।
भास्कर इनसाइट खुद के ही बोर्ड से घिरा वन विभाग सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज: सड़क किनारे लगे वन विभाग के चेतावनी बोर्ड। खुद साबित करते हैं कि यह आधिकारिक टाइगर कॉरिडोर है।
कटीली फेंसिंग बैन: एनटीसीए की गाइडलाइन के अनुसार कॉरिडोर में वन्यजीवों के मार्ग पर नुकीले तार लगाना प्रतिबंधित है।
एक तरफ सख्ती, दूसरी तरफ लापरवाही: एनएच-46 पर बाघों के रास्ते के कारण यहां 19 किलोमीटर रोड का निर्माण कार्य रुका है, लेकिन खुद विभाग यहां रास्ते बंद कर रहा है। फेंसिंग लगाना गैर-कानूनी टाइगर कॉरिडोर में किसी भी प्रकार की कटीली या नुकीली फेंसिंग लगाना पूरी तरह गैर-कानूनी है। एनटीसीए के नियम स्पष्ट करते हैं कि कॉरिडोर में वन्यजीवों की प्राकृतिक आवाजाही को बाधित नहीं किया जा सकता।’
– विजय श्रीवास्तव, वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट चिखलार-रानीपुर मार्ग पर की गई तार फेंसिंग के मामले को हम तुरंत चेक करवाएंगे। यदि यह फेंसिंग वन्यजीवों की आवाजाही और टाइगर कॉरिडोर के नियमों के विपरीत पाई जाती है, तो इसे निकलवा देंगे।’ – मधु वी राज, मुख्य वन संरक्षक, बैतूल वन मंडल
