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यजुर्वेद के पांच मंत्रों से अर्पित होती है भस्म आरती:महाकाल के भोग के लिए आज भी मांगी जाती है भिक्षा, जानिए क्या है भस्म आरती का रहस्य

भगवान शिव को प्रिय सावन माह की शुरुआत हो गई है। देशभर से भक्तों का भगवान महाकाल के दर्शन और आशीर्वाद के लिए उज्जैन पहुंचना शुरू हो गया है। महाकाल मंदिर आने वाले अधिकांश श्रद्धालुओं की सबसे बड़ी इच्छा तड़के होने वाली भस्म आरती के दर्शन करने की होती है। भस्म आरती से जुड़ी कई ऐसी परंपराएं हैं, जिनकी जानकारी आम लोगों को नहीं होती। भगवान महाकाल को जगाने से लेकर शयन आरती तक हर प्रक्रिया तय नियमों और पवित्र परंपराओं के अनुसार संपन्न होती है। सावन में हर सोमवार को भगवान महाकाल को रात 2:30 बजे तथा मंगलवार से रविवार तक तड़के 3 बजे जगाया जाता है। महाकाल मंदिर में तड़के होने वाली आरती का वास्तविक नाम मंगला आरती है, लेकिन भस्म अर्पित किए जाने के कारण यह वर्षों पहले भस्म आरती के नाम से प्रसिद्ध हो गई। उज्जैन में भगवान महाकाल की पूजा राजा के रूप में होती है। भस्म आरती केवल 16 अधिकृत पुजारी या उनके परिवार के सदस्य ही कर सकते हैं। हर छह माह में भस्म आरती करने वाले पुजारियों का क्रम बदलता है। सबसे पहले देखिए भगवान महाकाल की नगरी से ताजा तस्वीरें… निराकार से साकार रूप में होते हैं भगवान के दर्शन मान्यता है कि भगवान महाकाल अनेक रूपों में भक्तों को दर्शन देते हैं। मंदिर के पट खुलने से लेकर भस्म रमाने तक भगवान निराकार स्वरूप में रहते हैं। इसके बाद उनका राजसी शृंगार किया जाता है। भस्म अर्पित होने के बाद भगवान महाकाल को आभूषण, रुद्राक्ष माला, मुंडमाला, बेलपत्र, शेषनाग का रजत मुकुट तथा फल-मिष्ठान का भोग अर्पित कर साकार स्वरूप में सजाया जाता है। महाकाल के लिए एक दिन पहले मांगी जाती है भिक्षा महाकाल मंदिर के पुजारी महेश शर्मा के अनुसार भस्म आरती की तैयारी एक दिन पहले ही शुरू हो जाती है। भस्म के लिए पांच कंडों पर कपूर रखकर धूनी प्रज्ज्वलित की जाती है। यह प्रक्रिया ओंकारेश्वर मंदिर के पीछे स्थित भस्म कक्ष में होती है। इसी दिन वर्षों पुरानी परंपरा के अनुसार भगवान महाकाल के भोग के लिए भिक्षा भी मांगी जाती है। पुजारी परिवार की ओर से नियुक्त व्यक्ति शाम करीब 4 बजे पीतल की बड़ी थाली लेकर शहर की 20 से अधिक दुकानों पर प्रसाद, फूल, दूध, मिठाई, फल, पान और अन्य सामग्री एकत्र करता है। इसे ‘भगवान का कंड्या’ कहा जाता है। इसी भिक्षा से एकत्र प्रसाद का भोग भस्म आरती के दौरान भगवान महाकाल को अर्पित किया जाता है। भस्म अर्पित करते समय महिलाएं करती हैं घूंघट भस्म आरती के दौरान भगवान महाकाल दिगंबर स्वरूप में रहते हैं। इसी कारण परंपरा के अनुसार महिलाओं को भस्म अर्पित होने तक घूंघट की आड़ लेने के लिए कहा जाता है। भस्म अर्पित होने के बाद भगवान का शृंगार किया जाता है और उनके साकार स्वरूप के दर्शन कराए जाते हैं। इसके बाद महिलाएं घूंघट हटा सकती हैं। आज्ञा लेकर ही खुलते हैं महाकाल मंदिर के पट भस्म आरती के लिए पुजारी सुबह स्नान कर मंदिर पहुंचते हैं। सबसे पहले कोटि तीर्थ के जल से स्वयं को शुद्ध करते हैं। इसके बाद घंटी बजाकर भगवान महाकाल से मंदिर में प्रवेश की आज्ञा ली जाती है। वीरभद्र का स्नान कराने के बाद मुख्य द्वार का शुद्धिकरण किया जाता है। भगवान गणेश, माता पार्वती और कार्तिकेय का पूजन-अभिषेक होता है। मंदिर में वर्षों से प्रज्ज्वलित दोनों दीपकों की सफाई की जाती है। दूसरी बार घंटी बजने के बाद ही भक्तों को भस्म आरती के लिए प्रवेश दिया जाता है। 16 मंत्रों के साथ होता है अभिषेक पूजन के दौरान ध्यान मंत्र, आह्वान मंत्र, आसन मंत्र, पाद्य मंत्र, अर्घ्य मंत्र, आचमन मंत्र सहित कुल 16 मंत्रों का उच्चारण किया जाता है। इसके साथ दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से बने पंचामृत से अभिषेक किया जाता है। इत्र, भांग, गन्ने का रस और सप्त नदियों का स्मरण कर जल अर्पित किया जाता है। इसके बाद रुद्री पाठ के साथ स्नान प्रक्रिया पूरी होती है और जलाभिषेक बंद कर दिया जाता है। नंदी का अभिषेक, फिर दिव्य शृंगार भगवान महाकाल के जलाभिषेक के बाद नंदी महाराज का अभिषेक किया जाता है। इसके बाद भगवान का भांग, चंदन और ड्रायफ्रूट से शृंगार होता है। पूरी प्रक्रिया में लगभग दो से ढाई घंटे का समय लगता है। शृंगार पूर्ण होने के बाद श्री पंचायती महानिर्वाणी अखाड़े के महंत भगवान महाकाल को भस्म अर्पित करते हैं। भस्म आरती में सभी के लिए विशेष ड्रेस कोड भस्म आरती के दौरान गर्भगृह में पुजारी, सेवक तथा परंपरा से जुड़े श्रद्धालु उपस्थित रहते हैं। इस दौरान महिलाओं के लिए साड़ी और पुरुषों के लिए सोला धोती पहनना अनिवार्य होता है। सुबह दो बार लगता है भोग निर्धारित pH वैल्यू का जल अर्पित किया जाता है भगवान महाकाल के जलाभिषेक के लिए मंदिर परिसर स्थित कोटि तीर्थ कुंड का जल उपयोग में लिया जाता है। ज्योतिर्लिंग का क्षरण न हो, इसलिए अर्पित की जाने वाली सामग्री की pH वैल्यू जांची जाती है। शिवलिंग पर केवल pH 7 से 9 के बीच का अल्कलाइन जल ही चढ़ाया जाता है। 16 मंत्रों के साथ जलाभिषेक पूर्ण होने के बाद ‘हरिओम’ उच्चारण के साथ अर्पित जल को हरिओम जल कहा जाता है, जिसे बाद में भक्तों में वितरित किया जाता है। सावन में भगवान भी रखते हैं उपवास श्रावण माह के प्रत्येक सोमवार को लाखों श्रद्धालुओं की तरह भगवान महाकाल भी उपवास रखते हैं। सोमवार को सुबह नैवेद्य नहीं लगाया जाता। शाम को सवारी से लौटने के बाद ही भगवान को नैवेद्य अर्पित किया जाता है। चढ़ाए गए फूलों से बनती है धूप बत्ती, अगरबत्ती महाकाल मंदिर में सुबह पट खुलने से लेकर रात शयन आरती तक देश भर के भक्त रोजाना करीब चार टन से अधिक पुष्प अर्पित करते हैं। ये संख्या पर्व के दिनों में और अधिक बढ़ जाती है। रोजाना बड़ी मात्रा में निकलने वाले पुष्प मंगलनाथ के पास एक अगरबत्ती बनाने की यूनिट में भेज दिए जाते हैं। जिसके बाद अर्पित किये हुए पुष्प से धूप बत्ती, अगरबत्ती, हवन कप और अष्ट गंध बनाई जाती है। ये खबरें भी पढ़ें… महाकाल मंदिर में पहली बार दक्षिण भारतीय प्रसाद महाकाल मंदिर के अन्नक्षेत्र में अब दक्षिण भारतीय भोजन भी परोसा जा रहा है। मंगलवार से इसकी शुरुआत कर दी गई है। मंदिर प्रशासन ने कहा है कि अब हर मंगलवार और शुक्रवार को यहां आने वाले श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में साउथ इंडियन डिशेज दी जाएंगी। पढ़ें पूरी खबर…

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