एक बौद्ध मठ का पता… और उसी एक पते पर 40 से ज्यादा भारतीय पासपोर्ट। STF के मुताबिक, बांग्लादेश से आए लोगों को फर्जी दस्तावेजों से भारतीय पहचान दिलाई गई और उन्हीं कागजों के आधार पर पासपोर्ट हासिल किए गए। इतने आवेदन पुलिस वेरिफिकेशन से निकल कैसे गए? एक ही गवाह 20 से ज्यादा आवेदनों में कैसे आया, फर्जी पहचान की पूरी चेन कैसे बनी और पासपोर्ट लेकर ये लोग विदेश तक क्यों गए? मध्य प्रदेश एक्सप्लेनर में पूरी कहानी… सवाल 1: भोपाल का मठ और बांग्लादेशियों को भारतीय पासपोर्ट, मामला क्या है? जवाब: जांच की शुरुआत डबरा के सिमरिया टेकरी स्थित बौद्ध विहार के एक पते से हुई। सवाल 2: बांग्लादेश से आए लोग मध्य प्रदेश के आश्रमों तक पहुंचे कैसे? जवाब: STF की जांच के मुताबिक- बांग्लादेश से आने के बाद ये लोग सबसे पहले असम के गुवाहाटी पहुंचे। सवाल 3: एक ही पते से इतने पासपोर्ट बने कैसे- वेरिफिकेशन में चूक थी या मिलीभगत? जवाब: अभी STF की जांच पूरी नहीं हुई है, इसलिए इसे सीधे मिलीभगत कहना जल्दबाजी होगी। STF के मुताबिक इन आवेदनों में पुलिस वेरिफिकेशन हुआ था। इसके बावजूद एक ही पते और एक जैसे पैटर्न वाले इतने आवेदन सिस्टम की पकड़ में नहीं आए। वेरिफिकेशन की चार कड़ियां अब सवालों के घेरे में हैं…. 1. पते की जांच कितनी गहराई से हुई?
STF को यह पता लगाना होगा कि आवेदकों ने मठ का पता कैसे दिया और वेरिफिकेशन के दौरान उनके वहां रहने की पुष्टि किस आधार पर हुई। भास्कर की टीम जब अशोक बुद्ध विहार पहुंची, तो मौजूदा भंते कश्यप आनंद ने कहा कि उन्हें फर्जी पासपोर्ट की कोई जानकारी नहीं है और उनकी मौजूदगी में पुलिस या STF की टीम वेरिफिकेशन के लिए नहीं आई। वे खुद सिर्फ दो दिन पहले मठ में आए हैं। 2. एक ही गवाह का नाम बार-बार कैसे आया?
डबरा के करीब 20 पासपोर्ट आवेदनों में गवाह के तौर पर रियाल चौधरी का नाम सामने आया है। उसके अपने नाम से भी चार पासपोर्ट मिले हैं। इतने आवेदनों में एक ही गवाह होने के बावजूद यह पैटर्न वेरिफिकेशन के दौरान क्यों नहीं पकड़ा गया, यह STF की जांच का अहम हिस्सा है। 3. अलग-अलग आवेदनों का आपस में क्रॉस-चेक क्यों नहीं हुआ?
एक ही पता, एक ही गवाह या समान दस्तावेजों से जुड़े कई आवेदन सामने आने पर क्या उनका आपस में मिलान किया गया था, यह भी जांच का सवाल है। अगर ऐसा क्रॉस-चेक हुआ था, तो इतने आवेदन एक साथ आगे कैसे बढ़े? यह भी देखा जा रहा है। 4. भोपाल पुलिस की जांच में मामला आगे क्यों नहीं बढ़ा?
गोविंदपुरा पुलिस मई 2025 से मामले की जांच कर रही थी। इसके बावजूद मामला STF तक पहुंचा। अब यह भी जांच का हिस्सा है कि शुरुआती जांच में मामला कहां अटका और किस स्तर पर चूक हुई। जवाब जानने के लिए गोविंदपुरा थाना प्रभारी से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं मिला। इसके अलावा STF की जांच में पुलिस वेरिफिकेशन के लिए प्रति पासपोर्ट करीब 1 हजार रुपए दिए जाने की बात भी सामने आई है। सवाल 4: फर्जी पासपोर्ट लेकर ये लोग कहां-कहां गए? जवाब: अभी तक की जांच में नेटवर्क के मध्यप्रदेश से बाहर तक फैले होने के संकेत मिले हैं, जबकि अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन की पुष्टि होना बाकी है। सवाल 5: तो क्या बांग्लादेशी अब भारत के नागरिक बन गए? जवाब: नहीं। पासपोर्ट और नागरिकता एक ही चीज नहीं हैं। इसके बाद तीन काम होते हैं…
पहला- पासपोर्ट जब्त या रद्द, साथ ही जालसाजी और अवैध रूप से रहने से जुड़े कानूनों के तहत कार्रवाई।
दूसरा- असली नागरिकता की पुष्टि, जिसके लिए अक्सर UIDAI जैसी एजेंसियों से रिकॉर्ड मंगाने पड़ते हैं।
तीसरा- निर्वासन यानी डीपोर्ट, जिसमें संबंधित देश का सहयोग भी जरूरी होता है, इसलिए हर मामला तुरंत खत्म नहीं होता। इसका एक उलटा खतरा भी है। सितंबर 2025 में कलकत्ता हाईकोर्ट के सामने बीरभूम के 6 भारतीय नागरिकों का मामला आया था, जिन्हें दस्तावेजों की कमी और बांग्ला बोलने के आधार पर बांग्लादेश भेज दिया गया था। मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया और मई 2026 के आदेश के बाद सभी 6 लोग भारत लौटे। यानी पहचान की जांच जितनी जरूरी है, उतनी ही सावधानी असली भारतीय नागरिकों को गलती से बाहर भेज देने से बचने में भी बरतनी होगी। मध्य प्रदेश एक्सप्लेनर का ये एपिसोड भी पढ़िए… उज्जैन के खड़े हनुमान हिल क्यों नहीं रहे:शिला के नीचे ऐसा क्या है? उज्जैन के खड़े हनुमान मंदिर का पूरा ढांचा तोड़ा जा चुका है, लेकिन अंदर खड़ी प्रतिमा हिली तक नहीं । चार बार कोशिश हुई, हाइड्रोलिक क्रेन तक लगाई गई, फिर भी नाकामी हाथ लगी। अब प्रशासन ने कार्रवाई रोक दी है। पूरा एक्सप्लेनर पढ़िए…
