सतना जिले के चित्रकूट में 5 दिनों में 3 बार आई बाढ़ के पीछे अतिक्रमण, अव्यवस्थित विकास और प्रशासनिक लापरवाही पर सवाल उठ रहे हैं। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने 12 साल पहले मंदाकिनी के किनारे अतिक्रमण के सर्वे के निर्देश दिए थे, लेकिन कार्रवाई प्रभावी रूप से आगे नहीं बढ़ी। दूसरी ओर आरोप ये भी है कि नदी संरक्षण के लिए बने रिवर फ्रंट कॉरिडोर की वजह से भी प्राकृतिक बहाव प्रभावित हुआ है। 29 अगस्त की बाढ़ से चित्रकूट में 500 करोड़ रुपए से अधिक के नुकसान का अनुमान है, जबकि घरों और दुकानों में करीब 1 हजार करोड़ लीटर पानी घुसने का दावा किया गया है। अब कलेक्टर ने नदी के बहाव में बाधा बने अतिक्रमण चिह्नित करने के लिए 5 सदस्यीय टीम बनाई है। भास्कर ने विशेषज्ञों से बात कर समझा कि अतिक्रमण से मंदाकिनी का बहाव कैसे प्रभावित हुआ, एनजीटी के निर्देश क्या थे और इतने वर्षों में प्रशासन ने क्या कार्रवाई की। कैसे घरों में घुसा 1000 करोड़ लीटर पानी? समझिए इसका वैज्ञानिक गणित पर्यावरणविद और प्रोफेसर घनश्यामदास गुप्ता ने दैनिक भास्कर को इसका वैज्ञानिक आकलन समझाया। उनके मुताबिक चित्रकूट में मंदाकिनी की लंबाई करीब 5 किलोमीटर (5000 मीटर) है और दोनों किनारों पर कम से कम 100-100 मीटर के दायरे में अवैध निर्माण व अतिक्रमण है। यदि अतिक्रमण वाले दोनों किनारों की लंबाई 5 किलोमीटर और चौड़ाई 100-100 मीटर मानें, तो कुल क्षेत्रफल 10 लाख वर्ग मीटर बनता है। 10 मीटर ऊंचाई मानने पर यह 1 करोड़ क्यूबिक मीटर यानी 1,000 करोड़ लीटर के बराबर होगा। विशेषज्ञ के इस आकलन के मुताबिक, यदि यह जगह उपलब्ध होती तो इतना पानी वहां समा सकता था। अतिक्रमण और निर्माण के कारण पानी के फैलाव की जगह कम होने से बाढ़ का असर बढ़ा। 12 साल से एनजीटी के आदेश पर कार्रवाई का इंतजार यह स्थिति अचानक नहीं बनी। मंदाकिनी किनारे अतिक्रमण को लेकर जबलपुर हाईकोर्ट के एडवोकेट नित्यानंद मिश्रा याचिका दायर कर चुके हैं। मिश्रा के मुताबिक, एनजीटी ने 2014, 2016 और 2018 में जिला प्रशासन को सरयू और मंदाकिनी के किनारे 100 मीटर के दायरे में बने भवनों का सर्वे करने के निर्देश दिए थे। उनके अनुसार, 1980 के बाद के निर्माणों को ग्रीन बेल्ट के उल्लंघन के तौर पर चिह्नित कर हटाने के निर्देश भी दिए गए थे। मिश्रा का कहना है कि शुरुआती दौर में कुछ भवन हटाए गए, लेकिन बाद में कार्रवाई धीमी पड़ गई। दो नदियां लुप्त हो चुकीं, क्या अब मंदाकिनी भी खतरे में है? चित्रकूट की समस्या सिर्फ मंदाकिनी तक सीमित नहीं है। यहां कभी मंदाकिनी, पयस्वनी और सरयू का संगम माना जाता था। स्थानीय दावों के मुताबिक पयस्वनी और सरयू अब अपने पुराने स्वरूप में नहीं हैं। बढ़ते निर्माण और प्रदूषण ने इन जलधाराओं को प्रभावित किया है। राघवप्रयाग घाट, जहां धार्मिक परंपरा के अनुसार श्रीराम ने अपने पिता दशरथ का पिंडदान किया था, वहां आज होटल और रेस्टोरेंट के नालों से निकलने वाला पानी मंदाकिनी में पहुंचने की बात कही जाती है। ₹24.62 करोड़ के रिवर फ्रंट प्रोजेक्ट पर भी उठे सवाल मंदाकिनी संरक्षण के लिए चित्रकूट में ₹24.62 करोड़ का रिवर फ्रंट प्रोजेक्ट शुरू किया गया था। इसके तहत आरोग्यधाम के पास 600 मीटर लंबी और 7 मीटर ऊंची प्रोटेक्शन वॉल बनाई गई। वरिष्ठ पत्रकार राकेश शर्मा का आरोप है कि दीवार का उद्देश्य नदी संरक्षण के बजाय डीआरआई और आरोग्यधाम को बाढ़ से बचाना था। उनका दावा है कि इससे मंदाकिनी के प्राकृतिक बहाव पर असर पड़ा। शर्मा ने आरोग्यधाम परिसर में व्यावसायिक गतिविधियों को लेकर भी सवाल उठाए हैं। दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने नदी के रास्ते में अतिक्रमण पर जताई चिंता बाढ़ के बाद मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों ने नदी के प्राकृतिक प्रवाह में बाधा और अतिक्रमण पर चिंता जताई। 29 अगस्त को बाढ़ प्रभावितों से मिलने पहुंचे सीएम डॉ. मोहन यादव ने नदी किनारे के अतिक्रमण का रिकॉर्ड तैयार कराने की बात कही। वहीं, हवाई और भौतिक सर्वेक्षण के बाद यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा कि नदी को उसके स्वाभाविक प्रवाह के लिए पर्याप्त जगह देनी होगी। “मंदाकिनी अब सिर्फ मैला ढोने वाली गाड़ी बन चुकी है” समाजसेवी और ‘नदी मित्र’ दुष्यंत सिंह ने मंदाकिनी की स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि 2003 की बाढ़ के बाद भी नदी किनारे निर्माण बढ़ता गया। उन्होंने कहा कि सरयू और पयस्वनी की स्थिति खराब होने के बाद अब मंदाकिनी पर भी दबाव बढ़ रहा है। श्री कामदगिरि पीठम के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. मदन गोपाल दास जी महाराज ने कहा कि प्रकृति को सीमित नहीं किया जा सकता और विकास कार्यों के लिए मास्टर प्लान जरूरी है। नदी मित्र अभिमन्यु सिंह ने कहा कि मंदाकिनी के संरक्षण के लिए मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सरकारों को मिलकर काम करना चाहिए। अतिक्रमण हटाने 5 सदस्यीय टीम कलेक्टर डॉ. सतीश कुमार एस ने मंदाकिनी नदी के तटीय क्षेत्रों में हुए निर्माण कार्यों की जांच के लिए मझगवां एसडीएम के नेतृत्व में 5 सदस्यीय टीम गठित की है। टीम सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की गाइडलाइन के आधार पर नदी किनारे के निर्माणों का परीक्षण कर आवश्यक वैधानिक कार्रवाई करेगी। जांच टीम में चित्रकूट नगर परिषद के सीएमओ, नायब तहसीलदार, पीडब्ल्यूडी और जल संसाधन विभाग के एसडीओ तथा नगर परिषद के सब इंजीनियर को शामिल किया गया है। टीम नदी के प्राकृतिक प्रवाह में बाधक सरकारी और निजी निर्माणों को चिन्हित करेगी। हाई फ्लड लेवल भी होगा तय
जांच के दौरान मंदाकिनी नदी के हाई फ्लड लेवल को भी चिन्हित किया जाएगा। बता दें कि 28-29 अगस्त की रात आई बाढ़ के दौरान आरोग्यधाम में नदी का जलस्तर तय हाई फ्लड लेवल 139.60 मीटर से काफी ऊपर पहुंच गया था। प्रशासन के अनुसार जलस्तर करीब 145.76 मीटर तक पहुंचने से चित्रकूट में बड़े पैमाने पर तबाही हुई।
