हम बचपन से देखते आए हैं कि हमारा समाज अनुसूचित जाति (SC) में है। हमारे पिता और पूर्वज भी यही बताते थे। हमारे सभी जाति प्रमाण-पत्र SC श्रेणी के बने हैं। इसी आधार पर मेरे पिता कई बार गांव के सरपंच और प्रधान भी रह चुके हैं। यह कहना है अमदरी गांव के उपसरपंच प्रदीप बागरी का, जो मंत्री प्रतिमा बागरी के ससुराल पक्ष से हैं। दरअसल, मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री प्रतिमा बागरी रैगांव विधानसभा सीट से अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित सीट पर विधायक हैं। हालांकि, उनके SC होने को लेकर विवाद खड़ा हो गया है और मामला जबलपुर हाईकोर्ट में विचाराधीन है। हाल ही में हाईकोर्ट ने जिला प्रशासन को निर्देश दिया कि मंत्री से जुड़े गांवों में मुनादी कराकर उनके जाति संबंधी दावों पर आपत्तियां आमंत्रित की जाएं। इसी आदेश के बाद प्रतिमा बागरी के पुश्तैनी गांव बसुधा-गोपालपुर, ससुराल अमदरी और हरदुआ मझोल (जहां उनके पिता की जमीन है) में मुनादी कराई जा रही है। इसी विवाद की पड़ताल के लिए दैनिक भास्कर की टीम इन गांवों में पहुंची और लोगों से बातचीत कर यह जानने की कोशिश की कि सतना जिले में रहने वाला बागरी समाज खुद को किस श्रेणी का मानता है। अमदरी: मायके के लोग बोले- एससी में है हमारा समाज सबसे पहले भास्कर टीम सतना से करीब 20 किलोमीटर दूर नागौद विधानसभा क्षेत्र के अमदरी गांव पहुंची। यही मंत्री प्रतिमा बागरी का ससुराल है, जहां बागरी समाज के करीब 300 लोग रहते हैं। गांव में 74 वर्षीय वाल्मीकि पटेल मिले। उन्होंने कहा, “मेरा जन्म इसी गांव में हुआ है। माता-पिता और पूर्वज भी यहीं के रहने वाले थे। बचपन से हमने बागरी समाज को अनुसूचित जाति के रूप में ही देखा है और लोग उसी श्रेणी का लाभ भी लेते हैं।” उन्होंने बताया कि कुछ इलाकों में बागरी समाज के लोग खुद को राजपूत भी लिखते हैं, लेकिन उनके क्षेत्र में लोग केवल ‘बागरी’ लिखते हैं। हम एससी हैं, लेकिन सुविधाओं से वंचित गांव के कई परिवार आर्थिक रूप से संपन्न हैं। किसी के पास 50 एकड़ तो किसी के पास 100 एकड़ तक जमीन है। दूसरी ओर, अमदरी में ही रामआश्रय कोल मिले। उन्होंने गांव के विकास और सरकारी योजनाओं को मुद्दा बनाया। उन्होंने बताया कि वे स्वयं अनुसूचित जाति से हैं, लेकिन आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है। उनके पास न पर्याप्त जमीन है और न ही सरकारी सुविधाओं का पूरा लाभ मिल पा रहा है। बसुधा: ससुराल में लोग बोले- हमारे पास सर्टिफिकेट इसके बाद टीम बसुधा गांव पहुंची, जो पूर्व मंत्री जुगल किशोर बागरी का पुश्तैनी गांव और मंत्री प्रतिमा बागरी का मायका है। जुगल किशोर बागरी, प्रतिमा बागरी के रिश्ते में पिता के चाचा लगते थे।
यहां जुगल किशोर बागरी के घर पर गांव के मंदिर के पुजारी गोविंदलाल शुक्ला मिले। उन्होंने कहा, कि मैं 65 साल का हूं। जब से होश संभाला है, तब से बागरी समाज को एसी के रूप में ही देखा और सुना है।
गांव के चौक पर देशराज बागरी भी मिले। उन्होंने कहा कि हम खेती-किसानी और मजदूरी करके जीवन चलाते हैं। हमारे समाज के लोगों के अनुसूचित जाति के सर्टिफिकेट बने हुए हैं। इसी आधार पर लोग सरकारी नौकरियां भी कर रहे हैं।
देशराज का कहना है कि प्रतिमा बागरी को लेकर चल रहा विवाद राजनीतिक ज्यादा लगता है। बसुधा गांव में बागरी समाज के करीब 400 से 500 लोग रहते हैं। रिश्तेदारियां भी आसपास के बागरी समाज में ही होती हैं। राजपूत समाज से न बेटी दी जाती है और न बहू लाई जाती है। जानिए इस जाति विवाद की शुरूआत कैसे हुई…? प्रतिमा बागरी की जाति को लेकर कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेशाध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने जबलपुर हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। याचिका के अनुसार, वर्ष 2003 में हाईकोर्ट ने माना था कि संबंधित व्यक्ति के पास बागरी जाति का वैध जाति प्रमाण-पत्र है और बागरी जाति मध्य प्रदेश की अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल है। इसलिए अदालत स्वयं उस प्रमाण-पत्र को रद्द नहीं कर सकती। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा था कि यदि सरकार का मानना है कि बघेलखंड, बुंदेलखंड और महाकौशल के राजपूत बागड़ी समुदाय को अनुसूचित जाति की सूची में नहीं होना चाहिए, तो इसके लिए संविधान सम्मत प्रक्रिया अपनाकर राष्ट्रपति की मंजूरी के साथ अधिसूचना जारी करनी होगी। याचिकाकर्ता ने 2007 के गजट का दिया हवाला प्रदीप अहिरवार का दावा है कि 2007 में भारत सरकार के राजपत्र में संशोधन प्रकाशित किया गया। उनके अनुसार, इसमें स्पष्ट किया गया कि राजपूत/ठाकुर उपजाति से संबंधित बागड़ी समुदाय को छोड़कर अन्य बागरी समुदाय के लोगों के ही अनुसूचित जाति प्रमाण-पत्र बनाए जाएं। याचिकाकर्ता की मांग-मंत्री को एससी का लाभ नहीं मिले अहिरवार का आरोप है कि प्रतिमा बागरी जिस समाज से आती हैं, वह राजपूत बागरी समाज है, जबकि अनुसूचित जाति में शामिल बागरी समुदाय अलग है। याचिका में यह भी दावा किया गया है कि 1961 और 1971 की जनगणना के दौरान प्रतिमा बागरी के परिवार ने स्वयं को अनुसूचित जाति के रूप में दर्ज नहीं कराया था। बाद में जब क्षेत्रीय प्रतिबंध समाप्त हुए और मध्य भारत की अनुसूचित जाति बागरी पूरे मध्य प्रदेश की सूची में शामिल हुई, तब महाकौशल, बघेलखंड और बुंदेलखंड के कुछ बागरी परिवारों ने एसी का लाभ लेना शुरू किया। याचिकाकर्ता का कहना है कि शासन के कई आदेशों, जांच समितियों की रिपोर्टों और 2007 के राजपत्र में भी यह उल्लेख किया गया है कि इन क्षेत्रों के राजपूत बागड़ी समुदाय को अनुसूचित जाति का लाभ नहीं मिलना चाहिए। मंत्री को मूल दस्तावेज दिखाने होंगे हाईकोर्ट के आदेश के बाद राज्य स्तरीय छानबीन समिति ने उन्हें नोटिस जारी कर 6 जुलाई को मूल दस्तावेजों के साथ उपस्थित होकर अपना पक्ष रखने को कहा है। यानी उनका आधिकारिक पक्ष समिति के सामने रखा जाना है। हालांकि उनके समर्थन में अब तक विभिन्न स्थानों पर बागरी समाज के संगठनों ने ज्ञापन दिए हैं और आरोपों को गलत बताया है। मेरे पास सारे दस्तावेज, समिति को दूंगी मंत्री प्रतिमा बागरी ने दैनिक भास्कर से कहा, “हमारे पास सभी जरूरी दस्तावेज हैं, जिन्हें हम छानबीन समिति के सामने प्रस्तुत करेंगे। उसके बाद दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। हम जहां रह रहे हैं, वहीं कई पीढ़ियों से हमारा परिवार निवास कर रहा है। मुझे स्वयं चार-पांच पीढ़ियों तक की जानकारी है। हम कहीं बाहर से आकर नहीं बसे, बल्कि उसी गांव के मूल निवासी हैं। हां, हमारा रहन-सहन पहले की तुलना में बेहतर हुआ है। शायद इसी वजह से कुछ लोगों को लगता है कि हम इस समुदाय से नहीं हैं। लेकिन अच्छी नौकरी या पद मिलने पर किसी भी परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति बेहतर हो जाती है, बच्चों का पालन-पोषण भी बेहतर होता है। गांव में हमारे समाज को लेकर किसी तरह का विरोधाभास नहीं है। अब मैं छानबीन समिति के सामने सभी दस्तावेज पेश करूंगी। ये खबर भी पढ़ें… मंत्री प्रतिमा बागरी बोलीं- कांग्रेस से भी बागरी विधायक रहे कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने मंत्री के जाति प्रमाण पत्र को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। विवाद पर नगरीय प्रशासन राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी से दैनिक भास्कर ने सवाल पूछा। मंत्री ने इसे पब्लिसिटी स्टंट बताया। पढ़ें पूरी खबर…
