राजगढ़ के ब्यावरा में भीषण गर्मी में एक महंत जलते कंडों के बीच बैठकर हठयोग कर रहे हैं। दोपहर में तीन घंटे नाथ संप्रदाय के महंत हरिनाथ का धुआं और आग की लपटों के बीच बैठकर हठयोग चलता है। 19 अप्रैल से शुरू होकर 9 मई को आखिरी दिन है। दैनिक भास्कर की टीम ब्यावरा से 25 किलोमीटर दूर मोठबड़ली इलाके में पहाड़ी पर बने मंदिर के पास पहुंची। तीन घंटे तक यहां रहकर देखा। पढ़िए रिपोर्ट… पहले तीन तस्वीरें देखिए… एक एकड़ के खेत में 101 धूने के बीच लपटें दोपहर के 12 बजने में 15 मिनट बाकी हैं। गर्मी बहुत तेज है। मोबाइल में तो तापमान 44.8 डिग्री शो हो रहा है। महंत का हठयोग भी अलग तरह का है। इसके लिए करीब एक एकड़ का खेत तैयार किया गया है। इसमें हर दिन 101 धूना जलाए जाते हैं। जब धूनों में आग की लपटें उठती हैं, उसी वक्त महंत हरिनाथ आते हैं। तपती धूप में तीन घंटे इन धूनों बीच हठ योग करते हैं। जब ये धूने जलते हैं, तो ड्रोन से ऐसे नजर आते हैं, जैसे किसी चक्र में से आग और धुआं निकल रहा है। अब 12 बजने में तीन मिनट ही बचे हैं, उधर महाराज की कुटिया के सामने डमरू, मंजीरे और झांझर बजने लगे हैं, तभी महंत अपनी कुटिया से बाहर आते हैं। हाथ में कुछ लिए हैं। शिष्य उन्हें घेरे के बीच में ले लेते हैं। छोटी से कद-काठी के महंत हरिनाथ बहुत कम कपड़ों में 101 धूनों की तरफ जा रहे हैं। श्रद्धालु जयकारे लगा रहे हैं। धूनों के अंदर महंतजी को छोड़कर सभी वापस आ गए। धूनों से उठ रहा धुआं इतना तेज है कि महंत दिखाई नहीं दे रहे। यानी महंतजी का हठ योग शुरू हो गया है। तीन घंटे के बाद जब धूनों की अग्नि शांत हो जाएगी, तभी वे बाहर आएंगे। इधर, महंतजी का धूनों के बीच जाने के बाद से ही छोटे से टेंट में बैठी महिलाएं भजन-कीर्तन शुरू कर देती हैं। दूर-दराज के गांवों से आ रहे लोग इन धूनों का परिक्रमा कर रहे हैं। एक परिक्रमा में ही करीब 10 से 15 मिनट लग रहे हैं। महंतजी से बात करनी थी, लेकिन वे तो अब तीन घंटे की तपस्या के बाद ही बाहर आएंगे। धूनों से उठ रहे धूने में यहां खड़ा होना भी मुश्किल हो रहा है। मैं शामियाने में आ गया। यहां वे लोग मौजूद हैं, जो व्यवस्थाएं देख रहे हैं। 101 धूनों के बीच नहीं हुआ गर्मी का अहसास महंत हरिनाथ का ये चौथा हठयोग है। व्यवस्था देख रहे जितेंद्र सौंधिया कहते हैं- तापमान 44-45 डिग्री के आसपास है। तप स्थल पर इतनी अग्नि है। महंतजी 101 धूनों के बीच में बैठ तप कर रहे हैं। तापमान आठ-दस डिग्री तो ज्यादा होगा ही। लेकिन, एक बार मैं अंदर गया था। वहां मुझे जरा सी भी गर्मी महसूस नहीं हुई। दूर-दूर से लोग आ रहे हैं। यहां यज्ञ भी हो रहा है। मंदिर में देव प्रतिमाओं की स्थापना भी होनी हैं। 9 मई को आखिरी दिन भंडारा भी होगा। सुबह 4 बजे से होती है धूनों की तैयारी ग्रामीण नारायण सिंह कहते हैं कि यहां 50 गांवों के लोग आ रहे हैं। महंत हरिनाथ के हठ योग में 21 दिन में 84 हजार कंडों का उपयोग होगा। हमने पहले से ही गांव-गांव खबर भेज दी थी। गांवों से लोग जब आते हैं, अपने साथ ट्राॅलियों और बैल गाड़ियों में कंडे भरकर लाते हैं। नारायण कहते हैं कि हर दिन 101 धूने जलते हैं। इनकी तैयारी सुबह 4 बज से शुरू हो जाती है। पहले जल चुके कंडों की भस्म को एक सा करना फिर उनके ऊपर नए सिरे से गिन-गिनकर कंडे लगाए जाते हैं। सैकड़ों लोग रोज आ रहे हैं। किसी को कोई परेशानी न हो इसका भी ध्यान रखना पड़ता है। सेवा के लिए लोग हर दिन सुबह 4 बजे से पहले यहां आ जाते हैं। तपस्थली पर सेवा दे रहे रघु सौंधिया कहते हैं कि सुबह 10 बजे तक तप की पूरी तैयारी हो जाती है। इसके बाद 11 बजे से 10 सेवादार एक-एक धूने को प्रज्जवलित करते हैं। पूरे समय ये भी ध्यान रखा जाता है कि हर धूने में पूरे तीन घंटे अग्नि रहे। 9 तारीख यानी शुक्रवार को हठयोग पूरा हो जाएगा। इसके बाद धूना की भस्म को नर्मदा में विसर्जित करने जाएंगे। धूने के लिए हर दिन बढ़ते हैं कंडे महंत हरिनाथ के शिष्य देवनाथ बचपन से उनके साथ हैं। वे कहते हैं कि 101 धूनों में रोजाना अलग-अलग संख्या में कंडे लगाए जाते हैं। पहले दिन यानी शुरुआत हर धूने में 5-5 कंडे से हुई थी। इसके बाद प्रतिदिन हर धूने में 2-2 कंडे बढ़ाए जा रहे हैं। बुधवार को कुल 3939 कंडों का धूना जलाया गया। पहले दिन 505 कंडों से शुरू हुई यह साधना धीरे-धीरे अपने चरम की ओर बढ़ रही है। अंतिम दिन तक 84 हजार से अधिक कंडों का उपयोग हो जाएगा। भजन गाते धूना के पास आई महिलाएं अब दोपहर के 2.30 बज गए हैं। महंत हरिनाथ धूने से बाहर आने में आधा घंटा और लगेगा। इस बीच, यहां श्रद्धालुओं की भीड़ लग गई है। महिलाएं भी भजन गाते-गाते धूना के पास आ गई हैं। धूना से धुआं उठना भी कम हो गया है, तभी महंत जी के शिष्यों ने डमरू और झांझर बजाना शुरू कर दिए। लोग गोरखनाथ महाराज और हर-हर महादेव के जयकारे लगा रहे हैं। थोड़ी देर बाद महंत हरिनाथ आहिस्ता-आहिस्ता धूनों के बीच से बाहर आ जाते हैं। श्रद्धालु और शिष्य दंडवत होकर प्रणाम करते हैं। वे बिना किसी से बात किए सीधे करीब 200 फीट दूर बनी कुटिया में चले जाते हैं। आधे घंटे बाद उनके शिष्य देवनाथ बाहर आते हैं। मुझे अंदर बुलाते हैं। महंत बोले- धुआं और अग्नि हमारे कवच महंत हरिनाथ से पूछा कि गर्मी में इतनी आग के बीच तप क्यों रहे हैं? वे कहते हैं, अग्नि, गर्मी और धुआं तप करने वाले के लिए आध्यात्मिक कवच की तरह हैं। तप के दौरान मुझे इनका एहसास ही नहीं हुआ। मुझे इस तरह के तप करने की प्रेरणा गुरु महंत सोमनाथ जी से मिली था। गोरखनाथ संप्रदाय के 18वें महंत थे। हम तो गुरु परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। हमारे संप्रदाय के महंत गौ रक्षा और विश्व शांति के लिए हठयोग करते आए हैं। आगे भी करते रहेंगे। हठयोग के माध्यम से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, विश्व कल्याण की भावना मजबूत होती है।
