भारत सरकार यदि मुझे और मेरे बच्चों को भारत की नागरिक सुविधाएं नहीं दे पा रही है, तो मेरे पिता और पूरे परिवार को यहां से चीन भेज दिया जाए। एसडीएम ने मुझसे कहा कि सीएम हेल्पलाइन से अपनी शिकायत वापस ले लो। ये आपबीती है चीनी सैनिक वांग ची के बेटे विष्णु की। वांग ची 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान भटकते-भटकते भारतीय सीमा में आ गए थे। उन्हें युद्धबंदी बनाकर 7 साल तक जेल में रखा गया। वर्ष 1969 में कोर्ट के आदेश पर इस शर्त के साथ रिहा किया गया कि उन्हें चीन वापस नहीं भेजा जाएगा और शेष जीवन भारत में ही बिताना होगा। विष्णु का कहना है- भारत पितृप्रधान देश है, इसलिए यहां पिता के दस्तावेज ही मान्य होंगे। लेकिन मेरा सवाल है कि मैं तो यहीं पैदा हुआ हूं। मेरे सारे दस्तावेज भारत के हैं, फिर मेरे बच्चों के दस्तावेज क्यों नहीं बन रहे?” 64 साल से भारत में लड़ रहे चीनी सैनिक की कहानी…
चंडीगढ़, भोपाल और बालाघाट की जेलों में सात साल बिताने के बाद सरकार ने वांग ची को बालाघाट से करीब 80 किलोमीटर दूर तिरोड़ी में रहने की अनुमति दी। यहां तिरोड़ी के सेठ इंदरचंद जैन ने अपनी आटा चक्की में उन्हें नौकरी दी। वांग ची हिंदी नहीं जानते थे, लेकिन अपने व्यवहार से उन्होंने गांव के लोगों का दिल जीत लिया। गांव वालों ने ही उनकी शादी तिरोड़ी निवासी सुशीला से करा दी। सुशीला कुनबी (ओबीसी) समाज से थीं। वांग ची और सुशीला के चार बच्चे हुए। सभी बच्चों के नाम के आगे सरनेम के रूप में वांग लिखा गया। अब तीसरी पीढ़ी के सामने पहचान का संकट विष्णु बताते हैं कि उनके पिता को कई वर्षों तक 100 रुपए प्रतिमाह पेंशन भी मिलती रही, लेकिन शादी के बाद वह बंद कर दी गई। विष्णु साइंस ग्रेजुएट हैं। उनका कहना है कि उनके सभी प्रमाण पत्र मां की जाति के आधार पर बने थे, लेकिन अब उनके बेटे प्रणीत और बेटी कनक के जाति प्रमाण पत्र नहीं बन रहे हैं। बेटी कनक अब नौवीं कक्षा में पहुंच गई है। उसे सांदीपनि विद्यालय में प्रवेश के लिए जाति प्रमाण पत्र की आवश्यकता है। इस संबंध में उन्होंने सीएम हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराई थी। विष्णु ने बताया कि बेटा प्रणीत अभी दूसरी कक्षा में पढ़ता है। उसे इस समस्या की गंभीरता का अंदाजा नहीं है, लेकिन बेटी कनक को चिंता है कि यदि जाति प्रमाण पत्र नहीं बना तो उसे सांदीपनि विद्यालय में प्रवेश नहीं मिल पाएगा। इंदिरा गांधी और मोरारजी देसाई को भी पत्र लिख चुके वांग जिन्हें तिरोड़ी के सेठ इंदरचंद जैन ने अपनी आटा चक्की में नौकरी के साथ नया नाम भी दिया था राज बहादुर, वो पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और मोरारजी देसाई को भी पत्र लिख चुके हैं। उन्होंने 1984 में राष्ट्रपति को भी पत्र लिखा था। पत्र में कहा था कि मैं विधानसभा और लोकसभा चुनावों में वोट दे चुका हूं, लेकिन मुझे अब तक भारत की नागरिकता नहीं मिली है। मानव के दु:खों और उसकी भावनाओं की ओर ध्यान देने की कृपा की जाए। वांग बोले-पत्नी और जवान बेटे को खोने का दु:ख अब भी अब 88 वर्ष के हो चुके वांग ची टूटी-फूटी हिंदी में उस दौर को याद करते हैं। वे बताते हैं कि युद्ध समाप्त होने के बाद वे अरुणाचल प्रदेश के तवांग क्षेत्र में पहुंच गए थे। वहां रेडक्रॉस की टीम ने उन्हें पकड़ लिया। इसके बाद सात साल तक वे जेल में रहे। वांग कहते हैं कि तिरोड़ी आने के बाद शुरुआती वर्षों में स्थानीय पुलिस उन्हें काफी परेशान करती थी। कई बार उनके साथ मारपीट भी हुई। वे अपने शरीर के अंदरूनी हिस्सों में आई चोटों का जिक्र करते हुए कहते हैं कि पुलिस उन्हें चीन का जासूस बताती थी। जब भी वे काम करते, पुलिस उनसे पैसे मांगती थी। पैसे नहीं देने पर मारपीट करती थी। वांग भावुक होकर बताते हैं कि वर्ष 2017 में उनकी पत्नी की उचित इलाज नहीं मिलने से मौत हो गई। वांग ने कहा- मैंने डॉक्टरों से कहा था कि चाहे जितना पैसा लगे, मेरी पत्नी को बचा लो, लेकिन वह नहीं बच सकी। मेरे जवान बेटे की भी इलाज के अभाव में मौत हो गई। आज भी मुझे उन दोनों की बहुत याद आती है। 55 साल बाद पहली बार पहुंचे थे अपने वतन विष्णु वांग बताते हैं कि वर्षों की कोशिशों के बाद 2017 में उनके पिता को पहली बार चीन जाने की अनुमति मिली। वे पूरे परिवार के साथ चीन गए और करीब दो महीने वहां रहे। विष्णु बताते हैं कि वहां उनके पिता का स्वागत किसी सेलिब्रिटी की तरह हुआ। एयरपोर्ट से लेकर गांव तक मीडिया साथ रही। विष्णु कहते हैं कि उनके पिता अपनी मां से बहुत प्रेम करते थे। चीन पहुंचने पर उन्हें पता चला कि उनकी मां अब इस दुनिया में नहीं हैं। जब वे उनकी समाधि पर पहुंचे तो करीब दो घंटे तक फूट-फूटकर रोते रहे। उसी दौरान भारत में उनकी पत्नी सुशीला की तबीयत बिगड़ गई। परिवार तत्काल भारत लौट आया। कई दिनों तक इलाज चला, लेकिन उनकी जान नहीं बच सकी। पत्नी के निधन से वांग ची गहरे सदमे में चले गए। मिरगी की बीमारी से पीड़ित छोटे बेटे श्याम का भी निधन हो गया। विष्णु कहते हैं कि इन दोनों घटनाओं ने उनके पिता को भीतर तक तोड़ दिया। परिवार की दोनों बेटियां, अनिता और आश शादीशुदा हैं और अपने-अपने परिवार के साथ खुशहाल जीवन बिता रही हैं। अपर कलेक्टर बोले- शासन से परामर्श कर समाधान निकालेंगे बालाघाट के अपर कलेक्टर जीएस धुर्वे का कहना है कि वर्तमान नियमों के अनुसार जाति का निर्धारण पिता के दस्तावेजों के आधार पर किया जाता है। हालांकि यदि मामला युद्धबंदी से जुड़ा है, तो शासन से परामर्श लेकर समाधान निकालने का प्रयास किया जाएगा। इस खबर पर आप अपनी राय दे सकते हैं…
